एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 3: नई आदत
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 2: इनाम और इम्तहान पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 3: नई आदत
गहराती रात और भीतर की हलचल
रात गहराती जा रही है । बाहर पीपल की शाखें चाँदनी में बिना हिले डुले जगह जगह भयावह परछाइयां बना रही है। हवा बिलकुल बंद पड़ी है मानो हवा भी किसी सोच में डूबी बैठी हो।आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं , लेकिन रमा की आँखों में चिंता की छाँह थी। घर के भीतर रमा खिड़की के पास बैठी थी—उसकी आँखें बाहर के अंधेरे को नहीं, भीतर के अंधेरों को देख रही हैं। बिलकुल चुप वह जैसे कुछ सोच नहीं रही, सिर्फ महसूस कर रही हो। पास ही विक्रम किताबों में डूबा था। कक्षा में होने वाले प्रश्नों की तैयारी कर रहा था, लेकिन उसके मन के किसी कोने में भी हलचल थी—शायद पिता का यूँ देर से आना, लड़खड़ाकर लौटना, माँ की चुप्पी—इन सबका असर अब उसकी चेतना में घर करने लगा था।
चूल्हे की आँच बहुत देर हुए बुझ चुकी थी, लेकिन घर में खामोशी की तपिश अब भी बाकी है।
मोहनलाल खटिया पर लेटा है —नींद उससे कोसों दूर है । सिर के नीचे तकिया था लेकिन मन के नीचे पछतावे की गठरी है। नशे की बोझिलता में भी एक पछतावे से भीगा पड़ा है। रमा ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी ओर एक नज़र डाली—न गुस्से से, न उपेक्षा से, बस एक थकी हुई नज़रों से… जैसे वो सब समझती हो, पर बोलना नहीं चाहती।बहुत कुछ कहने को है, लेकिन शब्द थक चुके हैं। एक स्त्री का मौन कई बार सबसे तीखी आवाज़ होता है—मोहनलाल जानता है।
रात देर तक यूँ ही बीत गई—तीनों अपने-अपने मौन में बंद। केवल घड़ी की टिक-टिक थी जो इस टूटते संतुलन की गवाही दे रही थी। बस एक मौली है निश्चिंतता से सो रही है। धीरे धीरे सभी की आँखें भारी होने लगी और नींद विचारों से ऊपर हो शरीर पर हावी हो गई।
शर्मिंदगी की सुबह
अगली सुबह मोहनलाल कुछ देर से उठा। रात की बातें दिमाग में हथोड़े की तरह बज रही हैं , शर्मिंदगी से झुका हुआ मोहनलाल रमा से आँखें नहीं मिला पा रहा है। घर में शांति है पर वो शांति सुकून की नहीं बल्कि ग्लानि से उपजे संकोच की देन है।
सूरज की पहली किरणें जैसे ही आँगन में आईं, रमा ने देखा—मोहनलाल बिना कुछ कहे, बिना किसी से नज़र मिलाए, चुपचाप दरवाज़ा खोलकर बाहर चला गया। । वो खेत की ओर जा रहा है । रमा खड़ी रही पर मुँह से कुछ नहीं बोली। वो समझती है कि यह चुप्पी अपनेआप से चल रही लड़ाई की दें है जो मोहनलाल के अंदर चल रही है। इतने बरसों का साथ है जानती है कि पति को पछतावा हो रहा है।
थोड़ी देर बाद विक्रम ने माँ से पूछा, “बाबा नाराज़ हैं?”
रमा ने हल्के से सिर हिलाया, “नहीं बेटा… वो खुद से नाराज़ हैं।”
विक्रम कुछ पल चुप रहा, फिर धीमे से बोला, “माँ, क्या मैं सच में खेत से दूर जा रहा हूँ?”
रमा मुस्कुराई, उसके बालों में हाथ फेरा और बोली, “नहीं बेटा, तुम खेत को साथ लेकर ही आगे बढ़ोगे और यही तो तुम्हारी जीत होगी।”
विक्रम कुछ नहीं बोला, पर उसकी आँखों में एक चमक आई—जैसे किसी किसान की आँखों में पहली फसल की उम्मीद।
दोपहर हुई... खेत पर पूरा परिवार साथ है पर मोहनलाल की रमा से आँख मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही है । रमा ने जैसे कुछ कहने की कोशिश की, फिर चुप रह गई। उसने थाली में रोटियाँ रखीं और धीरे से सामने रख दीं। मोहनलाल ने देखा, कुछ कहने के लिए होंठ खुले, फिर बन्द हो गए। सभी ने चुपचाप खाना खाया बस मौली ही बालसुलभ हरकतों और बातों से अपना ध्यान आकर्षित करती रही।
अगले कुछ दिनों तक सबकुछ सामान्य रहा पर फिर धीरे-धीरे खेत का काम ढीला पड़ने लगा। मोहनलाल हर सुबह खेत जरूर जाता लेकिन देर से जाता और उसके काम में कोताही साफ दिखाई देने लगी। । कभी बैल की रस्सी ढीली बंधी रह जाती, कभी नाली में पानी रुक जाता। रमा ने संभालने की कोशिश की—खुद कुएँ से पानी खींचना, बैलों को तैयार करना, बीज बोना—वो सब करती रही, लेकिन कुछ न कुछ रह ही जाता।
दिन यूँ ही बीतते गए। खेत में अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही। किसी किसी दिन मोहनलाल पुरे दिन घर में ही गुजर देता। मोहनलाल बाहर जाने से कतराता रहा और काम का बोझ धीरे-धीरे रमा पर आता गया। वो अकेले ही बैलों को खोलती, खेत के किनारे पानी देती और खाली बोरियों में सपने भरने की कोशिश करती।
एक दिन मौली स्कूल से लौटते ही सीधे रमा के पास आई।
“माँ, भैया ने मास्टरजी से दो सवाल पूछे आज क्लास में। सब बच्चे देख रहे थे! सब कहते हैं भैया अफसर बनेगा!” उसकी आँखों में चमक है।
थकी हुई रमा के होठों पर मुस्कान आ गई, “हाँ, वो जरूर बनेगा पर उससे पहले बहुत कुछ सँभालना होगा…” कहते-कहते उसका स्वर धीमा पड़ गया पर उसमें दृढ़ता की स्पष्ट झलक दिखाई दी।
विक्रम यह सब देख रहा था। वो समझता था कि कुछ बदल रहा है, पर माँ कुछ नहीं कहती। और शायद इसी चुप्पी से वो और ज़्यादा गंभीर हो गया था। अब वो स्कूल से लौटकर पहले माँ के पास जाता, फिर किताब खोलता।
एक दिन मौली स्कूल से लौटकर सीधा विक्रम के पास आई, जो बाहर बैठा पढ़ रहा है।
“भैया,” मौली ने धीरे से पूछा, “आप सच में अफ़सर बन जाओगे ना?”
विक्रम ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, “तू क्यों पूछ रही है ये बात?”
“क्लास में सब कहते हैं कि तू अफसर बन जाएगा, शहर चला जाएगा… फिर हमें भूल जाएगा।”मौली की बात में एक मासूम सी प्रार्थना है —कि कुछ चीज़ें कभी न बदलें।
वो मासूम नहीं जानती है समय और हालात कभी किसी की बात नहीं मानते।
विक्रम ने किताब बंद कर दी और उसे पास बिठाकर बोला, “मैं कहीं भी रहूँ, तू मेरी छोटी बहन रहेगी। और बाबा और माँ जो सपना देख रहे हैं , वो तेरे बिना पूरा नहीं होगा।”
मौली उसकी गोद में सिर रखकर मुस्कुराई, “माँ कहती हैं तू सूरज बन जाएगा… और सूरज कभी खेतों से मुँह नहीं मोड़ता।”
विक्रम ने मौली को सीने से लगा लिया। उसे अब समझ में आ रहा है कि उसका सफर अकेले का नहीं है—ये तो पूरे परिवार की यात्रा है।
आदत की वापसी और एक नई गिरावट
आज मोहनलाल बहुत दिनों के बाद खेत गया है। शाम को खेत से लौटकर कुछ देर घर में बैठा रहा, फिर बिना कुछ कहे बाहर निकल गया। रमा ने देखा पर कुछ नहीं कहा। दिल में एक अनजानी शंका भर गई , वो मन ही मन चाहती है कि शायद वो मंदिर जा रहा हो या पंचायत की बैठक में। मन को समझा रही है कि हे भगवान ! जो मेरा मन सोच रहा है वो सच ना हो जाए...
रमा की आँखें दूर तक उसका पीछा करती रहीं। मन ने फिर वही डर जताया… और डर सही साबित हुआ।
मोहनलाल सीधा उसी पुलिया की ओर गया, जहाँ दिनेश, प्रकाश और कैलाश ताश फैला चुके हैं।
“अरे मोहन! आज तू खुद आया है? क्या बात है!” कैलाश उसे देखकर खुश हो गया
मोहनलाल ने बगैर मुस्कुराए कहा, “ऐसे ही बस… कुछ चाहिए मुझे।”
प्रकाश ने गिलास आगे बढ़ाते हुए पूछा, “क्या बात! आज खुद माँग रहा है?”
“हाँ… बस आज रहा नहीं गया। ज्यादा कुछ नहीं…” मोहनलाल ने गिलास हाथ में लेते हुए कहा,
कहते हुए उसने पहला घूँट लिया, फिर दूसरा....
बातों का सिलसिला चला—खेती की शिकायतें, सरकार की नीतियाँ, बेटे के सपने और अपनी हताशा।
रात फिर वही है —मिट्टी की दीवारें, बिखरे पत्ते और धीरे-धीरे डूबता हुआ आत्मसम्मान।
कहीं न कहीं, कोई रिश्ता एक बार फिर दरकने लगा है।
रात धीरे धीरे गहराने लगी। घर में रमा रात के खाने की थाली लगाए बैठी है। विक्रम फिर किताबों में खोया है लेकिन अब वो पहले जैसी तन्मयता नहीं रही। उसके मन में कुछ खटकने लगा है —कुछ ऐसा जो शब्दों में नहीं है पर वातावरण में उतर आया है ...
मौली रसोई में माँ के पास अपने गुड्डे से खेल रही है थोड़ी-थोड़ी देर में दरवाज़े की ओर देखती—“बाबा आ गए क्या?”
और तभी दरवाज़ा फिर चरमराया…
क्रमश:
क्या मोहनलाल इस डगमगाते रास्ते से खुद को निकाल पाएगा?
क्या विक्रम के सपनों की ज़मीन फिर डगमगाएगी या और मज़बूत होगी?
क्या रमा अकेले इस घर की नींव सँभाल पाएगी?
अगला भाग लेकर आएगा एक नया मोड़ — भाग 4: दरकती ज़मीन पढ़ें
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बहुत सुंदर कहानी है 👌👍
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया 🙏🙏
हटाएंnicely written story
जवाब देंहटाएंThank you so much for your valuable feedback🙏🙏
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