एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 4: दरकती ज़मीन

 अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 3: नई आदत पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 4: दरकती ज़मीन 

बिखरती साख

गाँव की गलियां अब पहचानने लगी हैं  कि कुछ बदला है। कभी फावड़ा उठाकर सबसे पहले खेत पहुँच जाने वाला मोहनलाल अब घर की चौखट पर अधिक दिखने लगा है । उसकी आंखों के नीचे काले घेरे, दाढ़ी की बढ़ती परत और नजरें चुराने की आदत—यह सब कुछ कह रहा है  कि भीतर कोई तूफ़ान है,जो अब उसकी देह से होकर बाहर आने लगा है।

गाँव का मौसम भी  इन दिनों बदला हुआ है । सरसों के चटक पीले फूलों में चमक तो है  लेकिन हवाओं में एक अनकही फुसफुसाहट भी है। अब जब मोहनलाल खेतों में दिखाई नहीं देता है  और रमा अकेली कुदाल चलाते दिखती, तो लोगों की ज़ुबानें भी चलने लगतीं।

“क्या हुआ मोहनलाल को? अब तो पूरा दिन घर में बैठा रहता है।”

“रमा बेचारी तो मर्दों का काम भी कर रही है।”

“कहते हैं बेटा पढ़ रहा  है... पर पेट तो खेत से ही भरता है।  ”

लोग बातें करने लगे हैं, जो पहले फुसफुसाहट थीं, अब खुली चर्चा बन गई हैं —

"सुना है ,मोहनलाल ने खेतों से मुँह मोड़ लिया है…"

"अरे, रमा को देखो…अकेली दिनभर धूप में खेत जोतती है!"

"और वो बेटा अफसर बनने चला है… हाय राम! पढ़ाई पेट भरती है क्या? करना तो उसे भी खेती ही है। ”

चौपाल पर भी चर्चा में मोहनलाल की बातें की जाती। कुछ सहानुभूति से, कुछ तंज से...  गाँव की नजरें सीधी नहीं रही.... अब रह रहकर चुभने लगी ।

रमा इन बातों से वाक़िफ़ है। पर अब उसे आदत सी हो गई है —नज़रों को झेलने की, अकेले खेत जोतने की, बैलों के साथ अपने भीतर की ताक़त आज़माने की। वो कुछ न कहती। बस अपनी साड़ी का पल्लू कसकर बाँधती और खेत की ओर चल पड़ती। उसके क़दमों में थकान होती  मगर चाल में अब भी हौसला है।

रमा अकेली ही नहीं खेत संभाल रही है, वो परिवार की रीढ़ बन चुकी है। 

विक्रम को स्कूल की ओर से छात्रवृत्ति मिल गई थी—जो उसके लिए सौभाग्य की बात है और परिवार के लिए सहारा। विक्रम की स्कूल फीस तो किसी तरह उसकी मेधावी छात्रवृत्ति से चल रही है  लेकिन घर का चूल्हा अब मोहल्ले की  दुकानों के उधार पर चलने लगा है।  घर में दो गाय हैं दूध का प्रबंध उनसे हो जाता है बाकि मिश्रीलाल की दुकान से दाल-चावल या मसाले उधार आते। किराने वाले मिश्रीलाल ने भी अब ‘कल’ को ‘कभी नहीं’ समझना शुरू कर दिया है।

रमा हर बार हाथ जोड़ती, “भैया, इस बार दे दो… अगली बार ज़रूर चुका दूँगी।”

और मिश्रीलाल, अपना गल्ला बंद करते हुए कहता, “बहन, जब तक पिछला उधार नहीं चुकता, अब आगे कुछ नहीं मिलेगा।”

फिर शायद तरस खाकर मिश्रीलाल कहता, "अगली बार पहले का हिसाब चुका देना इस बार दे देता हूँ। "

रमा के चेहरे पर हल्की सी लाचारी की परत आ जाती जो वो घर लौटते वक्त पोंछ देती।

रमा को एक-एक पैसा जोड़कर घर चलाना होता। मौली को नया जोड़ा चाहिए होता मगर रमा पुरानी धोती को काटकर कुछ सी देती।

एक शाम रमा थककर लौट रही है। हाथ में कुदाल  है पसीने से लथपथ शरीर और धूल भरा आँचल। आँगन में घुसते ही उसने चुपचाप चूल्हा जलाया। लकड़ियाँ गीली होने के कारण  धुआँ उसकी आँखों में जा घुसा। मगर आंसू सिर्फ धुएँ से नहीं आए...  रमा ने चुपचाप खाना बनाया, मौली को दूध पिलाया और फिर जाकर आँगन की कोठरी में बैठ गई। वो कोठरी, जहाँ पहले सीजन की बोरियाँ भरकर रखी जाती है —अब वहीं उसका आँचल भीग रहा था। वो स्त्री जो खेतों में मर्दों के समान  कंधा सीधा रखकर काम करती है —उस वक्त एक टूटी हुई माँ बन गई। उसने सिर घुटनों में छुपा लिया, आँचल से चेहरा ढँका और रो पड़ी। धीरे, बहुत धीरे… ताकि कोई सुन न ले। रमा धीरे-धीरे सिसकने लगी । न तेज़, न ज़ोर से—बस उतना ही ज़ोर से कि उसकी सिसकियाँ उसकी हिम्मत को ना डिगा दें।

मगर कोई सुन चुका है.... 

विक्रम, जो होमवर्क करते-करते पानी लेने आया है , ठिठक गया। कोने में, अधमँदी रोशनी में माँ अपने आँचल से आँखें पोंछ रही है। विक्रम वहीं थम गया। आवाज़ देना चाहता है  पर कुछ रुक गया। उसके पैर वहीं जम गए।

माँ को इस तरह बिलखते कभी नहीं देखा था। उसके भीतर कुछ बिखर गया। वह वहीं खड़ा रह गया—ना पास गया, ना कुछ पूछा। उस दिन विक्रम पहली बार जान गया कि माँ की चुप्पी में कितने घाव छिपे हैं  पर वह किसी को  दिखाती नहीं है। 

रात को माँ ने जब विक्रम से पूछा, “खाना खा लिया?”

तो विक्रम ने सिर हिलाकर कहा, “हाँ माँ… बस थोड़ा पढ़ लूँ।”

उस रात किताबें खुली हुई लेकिन अक्षर धुँधले पड़ने लगे। विक्रम की आँखों के सामने माँ का रोता चेहरा आने लगा।

अगले दिन स्कूल में मास्टरजी ने क्लास के बाद विक्रम को पास बुलाया।

“क्या बात है विक्रम? आजकल खोए-खोए से रहते हो। इन दिनों ध्यान कम लग रहा है पढ़ाई में तुम्हारा।”

विक्रम ने धीरे से कहा, “कुछ नहीं सर… बस घर में थोड़ा तनाव है।”

“बेटा, ज़िंदगी जब आगे बढ़ती है, तो कई बार अपने पीछे की दीवारें दरकने लगती हैं मगर इसका मतलब ये नहीं कि हम उन दीवारों को छोड़ दें। हमें आगे भी बढ़ना है और पीछे की ईंटें भी सम्हालनी हैं।”

विक्रम सुन रहा है —हर शब्द जैसे दिल में उतर रहा है।

“हर बड़ा सपना एक बड़ी क़ीमत माँगता है। कभी रिश्तों से, कभी संयम से। तुम्हारे जैसे लड़के जब आगे बढ़ते हैं तो उनके पीछे पूरा गाँव देखता है। हार मानोगे तो सिर्फ तुम नहीं हारोगे—तुम्हारी माँ की तपस्या, तुम्हारे पिता की मेहनत और तुम्हारी बहन की मासूम उम्मीदें भी टूट जाएंगी।”

विक्रम ने सिर झुकाया।

मास्टरजी ने उसकी पीठ पर हाथ रखा, “तू समझदार लड़का है लेकिन समझदार बनने के साथ एक बात याद रख—सपनों की राह कभी सीधी नहीं होती। कभी यह राह काँटों से भरी होती है कभी अपनों के आँसू से। तुम सोचते हो कि माँ-बाबा के हाल देखकर हार मान लो?”

विक्रम ने आँखें उठाईं, गले में कुछ अटका।

“सिर्फ मेहनत ही नहीं, सहनशक्ति भी ज़रूरी है। जब हालात दरकें तब इंसान का हौसला कसौटी पर होता है। तू अगर रुक गया तो फिर इन सबकी तपस्या व्यर्थ हो जाएगी।”

विक्रम की आँखें भर आईं, लेकिन इस बार दर्द नहीं—कुछ कर गुजरने की आग धधक उठी। 

“मैं नहीं रुकूँगा मास्टरजी। मैं माँ को फिर हँसते देखना चाहता हूँ।”

विक्रम ने मास्टरजी की बातों को अपने भीतर उतार लिया। उसे अब समझ में आ रहा था कि उसका संघर्ष केवल किताबों तक सीमित नहीं है —बल्कि वह अपने परिवार की उम्मीद का प्रतिनिधि बन चुका है।

फिसलती ज़मीन…

रात का वक्त है  मौली सो चुकी है , विक्रम अपनी किताबों में डूबा है। रमा ने चूल्हा बुझाया और आँगन में आकर बैठ गई।

मोहनलाल वहीं कोने में चुप बैठा था—कई दिन हो गए वह खुद से बात भी नहीं करता है...  ऐसा लगता मानो  अपनेआप से भाग रहा हो। 

अचानक उसने कहा, “रमा… एक बात करनी है।”

थकी हुई रमा ने चौंककर कहा,“हाँ बोलो।”

“सोच रहा हूँ… अपना खेत है ना … उसे गिरवी रख देते हैं। थोड़े दिन की बात है… हालात संभल जाएँगे तो छुड़ा लेंगे।”

रमा को लगा जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे की ज़मीन खींच ली हो। उसकी साँसें थम गईं।

“क्या कहा तुमने?”

“हाँ… पैसों की ज़रूरत है। खेत बेच नहीं रहा… बस गिरवी…”

रमा ने बात काटी, “गिरवी भी क्यों? क्यों हर बार हमारी नींव को ही उखाड़ने की बात करते हो?”

“हाँ… बस थोड़े दिन के लिए। पैसे की ज़रूरत है। हालात ऐसे हैं… मैं नहीं देख पा रहा…”

“तुम नहीं देख पा रहे?” रमा की आवाज़ काँपी, “या देखना नहीं चाहते? कुछ करना नहीं चाहते हो?”

मोहनलाल चुप। लेकिन रमा के सब्र का बाँध टूट चुका है ।

“जिस ज़मीन पर हमारे बच्चों ने पहला कदम रखा… जो तुम्हारे बाप-दादा ने अपनी मेहनत से सींची… उसे गिरवी रख दोगे?”

मोहनलाल सिर झुकाए बैठा रहा।रमा ने उसकी ओर देखा—अब वह आदमी नहीं रहा था जो कभी सीना तानकर गाँव से लड़ता था, अब वह एक टूटा हुआ आदमी नज़र आ रहा है... 

रमा की आँखों से आँसू नहीं निकले, लेकिन उसकी आवाज़ में आँधी थी।

“मैंने सब सहा—तुम्हारी चुप्पी, तुम्हारी आदतें, लोगों की बातें। लेकिन ज़मीन? नहीं... ऐसा नहीं कर सकते तुम।”

कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा।

दूर बैठा विक्रम चुपचाप सब सुन रहा है...  और इस बार उसने अपनी किताब बंद नहीं की—बल्कि कलम उठाई, और एक नई ज़िंदगी लिखने की तैयारी शुरू कर दी।

आज उसने फैसला कर लिया है —

“वो पढ़ेगा भी, कमाएगा भी… और माँ को फिर कभी अकेले आँसू नहीं बहाने देगा।”

क्रमशः 

“एक एकड़ से शिखर तक” का चौथा अध्याय “दरकती ज़मीन” एक ऐसे मोड़ पर है,जहाँ आत्म-संघर्ष, पारिवारिक असंतुलन और एक बेटे की चुपचाप परिपक्व होती सोच एक साथ उभरकर आती है।
क्या मोहनलाल ज़मीन गिरवी रखेगा या रमा उसे रोक पाएगी?
क्या विक्रम की पढ़ाई में भी कोई नई चुनौती आएगी?
क्या विक्रम अब कुछ  करने का बीड़ा उठाएगा?
क्या कभी घर की रसोई फिर से उधार से आज़ाद होगी?
अगले भाग में घर के हालात हताशा में बदलते हुए देखिये —एक नई सुबह, एक नए मोड़ और एक नए संघर्ष के साथ। भाग 5:  जड़ें और जद्दोजहद पढ़ें
👉 पूरी कहानी एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ - एक एकड़ से शिखर तक

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