जब पेट की भूख जीत जाती है | हिंदी कविता
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| जब पेट की भूख सामने होती है, तब सपनों की उड़ान भी रुक जाती है… यही है मजदूर जीवन की सच्चाई। |
मज़दूर दिवस विशेष: पेट की भूख
मज़दूर दिवस पर लिखी यह भावनात्मक हिंदी कविता “पेट की भूख” हमारे समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहाँ भूख और शिक्षा के बीच संघर्ष साफ़ दिखाई देता है।
जब एक तरफ बच्चों का भविष्य होता है और दूसरी तरफ उनके पेट की आग तब मजबूर माता-पिता को मजदूरी का रास्ता चुनना पड़ता है।
क्या केवल शिक्षा की बातें करना पर्याप्त है जब बुनियादी जरूरतें ही पूरी न हो पा रही हों?
हिंदी कविता
मुक्तक
शिक्षा मौलिक अधिकार भी है,
हर बच्चे के सपनों को
उसके भविष्य को संवारती है।
पर ज़रा ठहर कर सोचिएगा,
जब घर के कोनों में
खाली लुढ़कते बर्तन-डिब्बे
सन्न खामोशी से चीखते हैं,
जब आटा, दाल, सब्ज़ी, अन्न
रसोई से मानो रूठ जाते हैं…
जब चूल्हा ठंडा पड़ा रहता है,
और धुएँ की जगह
सन्नाटा उठता है,
जब बच्चों के पिचकते पेट
हर पल एक सवाल बन जाते हैं,
और उनकी मासूम आँखों की आस
धीरे-धीरे बुझने लगती है…
जब सूखे मुरझाए होंठ
पानी की एक-एक बूंद
को तरसा करते हैं,
और नन्हे हाथ, भूखा तन
किताबों की जगह
रोटी का टुकड़ा ढूँढने लगते हैं…
माता-पिता मजदूरी करने,
अपने सपनों को
किसी कोने में छोड़कर,
अपने बच्चों की भूख के लिए
खुद को श्रम में झोंक देने।
उनके लिए उस वक्त
ना कोई अधिकार मायने रखता है,
ना कोई भाषण, ना कोई कानून
बस एक ही सच्चाई होती है…
पेट की भूख!
उन्हें अधूरी लगती हैं,
और जो लोग कहते हैं,
“बच्चों को स्कूल भेजो”,
उन्हें वे कुछ अजीब निगाहों से देखते हैं…
क्योंकि उनके लिए
हर दिन एक जंग है,
जहाँ “आज कमाया, आज खाया”
ही जीवन का सत्य है।
वहाँ ये बड़ी-बड़ी बातें,
ये ऊँचे आदर्श,
कागज़ों में तो अच्छे लगते हैं,
पर हकीकत की ज़मीन पर
अक्सर बिखर जाते हैं…
अगर ज़िंदगी रही,
अगर साँसें चलती रहीं,
तो शायद किसी दिन
उनके बच्चे भी पढ़ पाएंगे…
पर आज…
आज तो बस इतना ज़रूरी है
कि उनके बच्चे
भूखे पेट सोए नहीं।
यही है उनका सच,
और यही है उस समाज का आईना
जो अब भी
भूख और शिक्षा के बीच
झूल रहा है…
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