एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 31 - एकांश — एक सपना ज़मीन पर
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 30: अधूरा रीयूनियन पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 31 - एकांश — एक सपना ज़मीन पर
पासआउट होने के तीन साल बाद
अधूरी रीयूनियन के दो साल बाद और आज से दो साल पहले
पुणे की सुबह हल्की धूप में भीगी हुई है । ऑफिस के शीशे से ढके एक ऊँचे फ्लोर पर, विक्रम एक खामोश कोने में बैठा हुआ है। सामने लैपटॉप स्क्रीन खुली हुई है लेकिन उसकी निगाहें कहीं और हैं।
आज उसके नौकरी के तीन साल पूरे हो चुके हैं - एडूवर्स ग्लोबल में। ये तीन साल काम, सीख और संघर्ष के रहे हैं। टेक्नोलॉजी, डैशबोर्ड, सीएसआर मीटिंग्स, नीति निर्धारण - उसने हर पहलू देखा, हर परत को समझा। लेकिन एक बात अब भी अधूरी है और वो है उसका सपना।
आज विक्रम ने अपने जॉब से इस्तीफ़ा दे दिया।
उसने सबसे पहले जिस इंसान से बात की वह है आस्था 22 साल की ऊर्जावान, स्पष्ट सोच वाली युवती, इंजीनियरिंग कॉलेज की जूनियर , नीति विश्लेषक और एक गहरी समझ रखने वाली दोस्त, जो उससे दो साल बाद के बैच की थी और अभी एक साल से एक प्रोजेक्ट के तहत बिहार के एक ज़िले में शिक्षा नीति पर काम कर रही है। छोटे कस्बे से निकलकर वह अपने जोश, अनुशासन और समाधान-केन्द्रित सोच के लिए पहचानी जाती है।
उस दिन दो चीज़ें तय हो गईं - एकांश का सपना और आस्था की साझेदारी... काम में ही नहीं शायद ज़िन्दगी में भी.... ये आगे चलकर पता चलेगा
एकांश — एक सपना ज़मीन पर
क्रमशः
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