एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 36 : रिश्तों की दीवारों में गूँजता जीवन

 अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 35: गांव की चुप्पी और एक लिंक का राज़ पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 36 : रिश्तों की दीवारों में गूँजता जीवन 

एकांश डिजिटल रीजनल  सेंटर और मौली लर्निंग हब का कार्य अपने स्टाफ को समझाकर और सेंटर अध्यक्ष सोहन गुरु जी एवं अन्य शिक्षकों से मिलकर अगले दिन विक्रम और आस्था मुंबई के लिए रवाना  हो गए।  

एयरपोर्ट से ही आस्था अपने घर चली गई और विक्रम अपनी  कार  की ओर चल दिया उसकी कार में ड्राइवर उसका वेट कर रहा है। विक्रम ने आस्था को उसके घर छोड़ने की पेशकश की जिसे उसने मना कर दिया कारण वाज़िब है उसका घर और  विक्रम का घर एकदम विपरीत दिशा में हैं। आस्था कैब लेकर चली गई। 

विक्रम का घर - एक ख़ामोश कहानी, रिश्तों की दीवारों में गूँजता जीवन

मुंबई की एक नई पॉश कॉलोनी में विक्रम का बंगला दूर से ही अपनी सादगी भरी भव्यता से ध्यान खींचता है। यह एक आधुनिक वास्तुकला की मिसाल है - बड़ी कांच की खिड़कियाँ, लॉन में बांस के झाड़ और गुलमोहर का एक पेड़, जिसके नीचे एक रस्सियों से बंधा झूला लटक रहा है । यह झूला अब भी माँ की सबसे प्रिय जगह है। यह बंगला बाहर से जितना भव्य दिखता है  भीतर से उतना ही शांत और संजीदा। पूर्णत: आधुनिक यह घर ना  तो ज़रूरत से ज़्यादा शानो-शौकत दिखाता है यह तो  बस सादगी में आत्मा को छुपाता है । यह घर एक ऐसे परिवार की गवाही देता है  जहाँ प्यार, दुःख, जिम्मेदारी और एक अधूरी कहानी, सब कुछ साथ-साथ रहते हैं ।

लकड़ी के भारी मुख्य द्वार को खोलते ही एक सजी-संवरी लॉबी दिखाई देती है  जहाँ पर नीले और सफ़ेद रंगों की संयमित थीम है। फ़र्श पर बिछा हुआ ईरानी कालीन हर कदम पर नर्मी का अहसास कराता। दीवारों पर आधुनिक कला की पेंटिंग्स हैं - कुछ इंटरनेशनल आर्ट फेयर से खरीदी गईं,  कुछ दोस्तों से उपहार में मिली हुई हैं और एक पेंटिंग सबसे कीमती है...  वो पेंटिंग  मौली ने उसके इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों में पहले वर्ष में बनाई थी, जिसे उसने फ्रेम करवा कर दिल से सहेजा है। ऊपर की चढ़ती सीढ़ी की दीवारों पर कुछ पारिवारिक चित्रों की गैलरी है। 

सीढ़ियों के किनारे लगे हल्के पीले रोशनी वाले लैंप घर को एक रहस्यमयी गर्माहट देते हैं । वो लैंप रात के समय पूरे घर को किसी पुराने संगीत की तरह शांत और उदास रोशनी में नहलाते हैं। 

लिविंग रूम में ऑफवाइट  रंग का एक आलीशान सोफ़ा है जिसके सामने एक बड़ा-सा ग्लास टेबल है , उसके ऊपर एक डिजिटल असिस्टेंट, कुछ किताबें और एक फोटो फ्रेम जिसमें उसकी माँ, बाबा ,मौली और वह खुद गांव की पृष्ठभूमि में मुस्कुराते नज़र आते हैं। उस पुरानी तस्वीर को वो हर सुबह देखता है  जैसे वो मुस्कुराहट उसे हर दिन की शुरुआत के लिए एक आशीर्वाद दे रही हो। यह तस्वीर हर सुबह विक्रम के लिए किसी प्रार्थना से कम नहीं है।

लॉबी से ही एक गैलरी एक छोटे से मंदिर में खुलती है । हर सुबह माँ वहीं दीप जलाती है, ईश्वर की पूजा अर्चना करती है और वही एक कोने में रखी मौली की तस्वीर के आगे फूल रखती हैं। उस स्थान पर मौन में भी एक आस्था की आवाज़ सुनाई देती है।

लिविंग रूम से ही लगा हुआ डाइनिंग हॉल है - डाइनिंग टेबल बारह कुर्सियों वाली एक शानदार टेबल है  लेकिन वहां अक्सर सिर्फ़ तीन लोग बैठते हैं - माँ, बाबा और विक्रम। फिर भी, एक चौथी प्लेट हमेशा मौली के लिए सजाई जाती है । खाने की मेज़ पर मौली की पसंदीदा नमकीन आज भी रखी जाती है जैसे वो कभी भी वापस आ सकती है। माँ हर बार कहती, "आज नमकीन मत भूलना, मौली को पसंद थी।" और उनकी आवाज़ में एक सूखी हँसी के नीचे दबी हुई टीस होती।

माँ और बाबा का कमरा - घर का असली हृदय

ग्राउंड फ्लोर पर सीढ़ियों के बाएं  तरफ एक आरामदायक कमरा है - माँ और बाबा का। वहाँ की दीवारें हल्के नीले रंग से रंगी है और एक खिड़की सीधे गुलमोहर के पेड़ की तरफ खुलती है । बाबा के पढ़ने की कुर्सी अब भी खिड़की के पास है जहाँ  वे सुबह की चाय के साथ अख़बार पढ़ा करते हैं । दोनों के कपडे वा अन्य ज़रूरत के सामान रखने के लिए लिए दो अलमारियां हैं ,एक छोटी-सी मेज़ पर रखी रामचरितमानस और ड्रेसिंग टेबल पर माँ की सिंदूर की डिबिया इस कमरे में जीवन की सादगी को समेटे हुए है। कमरे के बाएं  कोने में एक अलमारी है जिसमें माँ अब भी मौली के बचपन के कपड़े, खिलौने और राखियाँ सहेज कर रखे हुए हैं। डबलबेड के सामने की दिवार पर एक बड़ा एलईडी टीवी  लगा हुआ है जिसपर माँ और बाबा  अपने मनपसंद चैनल देखते हैं। 

विक्रम का कमरा - बचपन और वर्तमान के बीच की पुलिया

ऊपर की मंज़िल पर विक्रम का कमरा है जहां आधुनिकता और भावनाओं का सुंदर मिश्रण है। उसका कमरा एकदम व्यवस्थित, एक सॉफ्ट बेज रंग की थीम में - बड़ा डबलबेड, एक किनारे एक बड़ी सी अलमारी, डिजिटल वर्क स्टेशन, स्मार्ट लाइटिंग, सोफ़ा , सेंटर टेबल,  बड़ा एलईडी स्मार्ट टीवी और दीवार पर लगी मौली की तस्वीरें, यह सब उसे उसकी ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ उसकी जड़ों की याद भी दिलाते हैं। दीवार पर एक सफेद बोर्ड था जिस पर नए प्रोजेक्ट्स की योजनाएँ और लक्ष्य लिखे होते हैं। 

उस आधुनिक सेटअप में  कमरे की एक दीवार एक पुराना चॉकबोर्ड भी टंगा हुआ है।  उस पर आज भी चॉक से लिखा है  - “जैसे आप पढ़ते हो वैसे ही मुझे भी पढ़ाना  ” ...कुछ कुछ मौली की लिखावट में लिखा हुआ 

दीवार पर मौली की एक और पेंटिंग है - एक नदी के किनारे बैठे दो बच्चे, जिनमें से एक बड़ा भाई अपनी बहन को कुछ सिखा रहा है । यह तस्वीर अब प्रतीक बन गई है... उनकी अधूरी कहानी का।

विक्रम के पास में ही एक बेडरूम मौली का भी है जिसमें बेबी पिंक कलर से सभी साज सज़्ज़ा की गई हुई है।  बड़ा सा सागवान का नेचुरल टीक वुड शेड  में गोल डबल बेड, बेबी पिंक और फ्रोजेन ब्लू शेड  की ड्रेसिंग टेबल , अलमारी , सॉफ्ट लेदर सोफ़ा चेयर्स और कुछेक तस्वीरें छोटी सी मौली की। यह रूम भी रोज़ाना बाकी सभी रूम्स की तरह क्लीनिंग स्टाफ के द्वारा साफ़ किया जाता है जैसे हरदम इस रूम को किसी के आने की प्रतीक्षा बनी हुई है। 

इसी के साथ तीन गेस्ट बेडरूम  भी ऊपरी मंज़िल पर बने जो भली भांति फर्नीचर से सुसज्जित हैं। सभी बैडरूम के साथ बालकनी भी हैं।  सेकंड फ्लोर पर खूबसूरत रूफ टेरेस है जहां काफी बढ़िया पार्टी ऑर्गनाइज़  की जाती हैं। 

हालाँकि इस एक हज़ार वर्ग गज़ में बने घर में तकनीक और सुविधा की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी, जब मौली का नाम आता, तो दीवारों पर एक ख़ामोशी उतर आती। माँ की आँखों में नमी, बाबा की चुप्पी, और विक्रम की बेचैन निगाहें… यह सब दर्शाता है कि इस घर के हर कोने में एक अधूरी सांस अटकी है। घर बड़ा है  लेकिन मौली के बिना अधूरा लगता है।

आज जब विक्रम मुंबई लौटा तो एयरपोर्ट से सीधा गाड़ी उसके बंगले तक पहुँची। लेकिन जितनी तेज़ उसकी गाड़ी थी, उतनी ही धीमी उसकी चाल हो गई जब उसने गेट खोला । हर चीज़ वहीं हैं - लॉन में कटी हुई घास, दरवाज़े पर तुलसी का पौधा और पेड़ पर  झूला, लेकिन सबमें एक गहरा सन्नाटा छा गया है। 
घर के भीतर कदम रखते ही उसे हल्की अगरबत्ती की खुशबू आई - माँ ने पूजा की है। वह धीमे कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ा और अपने कमरे में पहुँचा। कोट उतारकर हैंगर पर टाँगा, जूते सलीके से रखे, लेकिन नज़रों में एक बेचैनी तैर रही है। 
पने कमरे में पहुँचकर उसने मौली की नोटबुक उठाई। एक और पन्ना खोला -
“भैया, मैं जब डरती हूँ ना, तो आपकी तस्वीर देखती हूँ… और फिर सब ठीक लगने लगता है।”
उसके होठ काँपे, लेकिन आँखें स्थिर रहीं। उसकी नज़र चॉकबोर्ड पर गई... और फिर उसकी हथेली ने हरकत की और हाथ ने एक नई लाइन लिख दी -
“अब डरने का वक़्त नहीं है। अब सच सामने लाना है।”

क्रमशः 
आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 37: धुंधली तस्वीरें, गहराता रहस्य
👉 इस कहानी के सभी एपिसोड देखने के लिए यहाँ क्लिक करें - एक एकड़ से शिखर तक

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें