अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 36 : रिश्तों की दीवारों में गूँजता जीवन पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 37: धुंधली तस्वीरें, गहराता रहस्य
मौन में दबे शब्द
आकाश में बादल छाए हुए हैं । अपने रूम में बैठे विक्रम के हाथों में मौली की नोटबुक अब भी है उसके पन्नों की खुशबू जैसे बीते समय की चीख पुकार हो।
वो पन्ना...
"भैया, मुझे डर लगता है… पड़ोस के वो अंकल कुछ अजीब करते हैं…"
विक्रम उस वाक्य को बार-बार पढ़ रहा है । शब्द नहीं थे वो.... ज़हर की बूंदें हैं जो हर बार उसकी आत्मा में रिसती चली जातीं।
वो नोटबुक को धीरे से बंद करता है। आँखें मूँदता है और माँ की कही बात याद आती है,
“मौली बहुत चुप रहने लगी थी आखिरी कुछ दिनों में… और जब पूछो तो कहे, सब ठीक है।”
एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड में आज की सुबह शायद आम नहीं है। विक्रम के विशाल केबिन में सिर्फ लैपटॉप की नीली रौशनी फैली हुई है । आस्था, आकाश और प्रिया उसके साथ बैठे हैं। रूम के डोर पर 'डोंट डिस्टर्ब ' का साइन ऑन है।
“इस मेल का टोन... डराने वाला नहीं है, बल्कि जैसे कोई मदद करना चाहता है। ” प्रिया धीमे स्वर में कहती है
विक्रम ने मेल फिर से खोला।
Subject: “I know what happened to your sister.”
Sender: [unknown@securemail.zone]
"Meet me on the border - Rajasthan border Jaisalmer."
(मेल का विषय- मैं जानता हूँ तुम्हारी बहन के साथ क्या हुआ था
भेजने वाला एड्रेस - अज्ञात सुरक्षित ईमेल से भेजा गया
मेल मे बस एक लाइन लिखी गई थी
"मुझे बार्डर पर मिलो- राजस्थान बार्डर जैसलमेर ")
अभी यह मेल पढ़ ही रहे थे कि तभी मेलबॉक्स में इनकमिंग मेल का नोटिफिकेशन ब्लिंक हुआ। विक्रम ने मेलबॉक्स खोला कि एक और मेल उसी अनजान सेन्डर से दिखाई दिया उसी मेल के क्रम में सेकंड मेल आया है -
मेल का विषय वही है पर मेल बॉडी में एक लाइन लिखी है -
“It wasn’t an accident. She knew something she shouldn’t have.”
(यह एक एक्सीडेंट नहीं था वह कुछ ऐसा जानती थी जो उसे नहीं जानना चाहिए था। )
नीचे सिर्फ वही वाक्य … “Meet me on the border.”
(मुझसे बॉर्डर पर आकर मिलो)
अबकी बार जैसलमेर की एक लोकेशन का एड्रेस दिया गया है।
आस्था की आँखों में सवाल था - “अगर ये जाल हो तो?”
विक्रम शांत स्वर में बोला - “अगर मौली किसी रहस्य को जानती थी, तो अब उसे जानना मेरा फर्ज़ है। चाहे जो भी कीमत हो।”
प्रिया ने आकाश को देखा - “स्रोत ट्रेस हो सकता है?”
आकाश ने सिर हिलाया - “हाँ, लेकिन थोड़ा वक़्त लगेगा। और…”
ऐसा कहकर वो चारों अपने अपने काम में व्यस्त हो गए।
उसी रात सिक्योरिटी का फ़ोन विक्रम के पास आया। विक्रम उसी वक़्त ऑफिस पहुँचा। पहुंचकर देखा कि उसके केबिन की खिड़की का काँच टूटा हुआ है। उसकी टेबल पर कागज़ बिखरे पड़े हैं कुछ फाइलें गायब हैं।
सुबह जब आस्था और प्रिया ऑफिस पहुंचे तो उन्हें इस घटना के बारे में पता चला।
“किसी ने अंदर घुसने की कोशिश की…” आस्था ने फटी आँखों से कहा।
“और उन्हें पता है हम क्या ढूंढ़ रहे हैं…” विक्रम ने बिखरी फाइलों को समेटते हुए कहा, उसकी आँखों में अब डर नहीं, जिद है।
उसी दिन बहुत समय बाद आभासी मीटिंग में रीमा मैम जुड़ीं। स्क्रीन पर उनका चेहरा थका हुआ है लेकिन आँखों में कोई ठहराव है ।
सभी कुछ सुनने के बाद उन्होंने कहा -
“विक्रम, ये रास्ता आसान नहीं होगा। ”
“जो सच्चाई छुपाई गई हो, वो यूँ ही सामने नहीं आती। लेकिन याद रखो... सच की तलाश में इंसान कभी अकेला नहीं होता।”
विक्रम ने एक क्षण को चुपचाप देखा… और फिर सिर झुका लिया मानो अपनी आत्मा से वादा कर रहा हो।
"मैं डर से नहीं भागूंगा। जो उसे चुप कराना चाहते थे, उनकी आवाज़ अब गूंजेगी।"
ट्रेसिंग द ट्रुथ
शाम के समय आकाश की आवाज़ आई - “मेल का लोकेशन ट्रेस हुआ है…लोकेशन मिली है - जैसलमेर के पास एक पुराना साइबर कैफे।”
विक्रम दौड़ता हुआ कंप्यूटर के पास आता है। स्क्रीन पर एक नक्शा खुला था - राजस्थान की जैसलमेर सीमा के पास एक पुराना नाम, एक खो चुका साइबर कैफे।
विक्रम ने कहा, “जो सच दबा हो, वो अक्सर सबसे ऊँची चीख बनकर लौटता है।”
विक्रम चौंका, "जैसलमेर से आगे कोई गांव ?"
आस्था बोली, "गांव से इतनी दूर… वहाँ कौन होगा?"
CCTV फुटेज की रिक्वेस्ट भेजी गई। जब वीडियो आया, उसमें एक धुंधली-सी आकृति दिखी मूँछों वाला एक दुबला आदमी, आँखों में कुछ बेचैनी, और हाथ में एक पुरानी फाइल।
प्रिया ने फोटो ज़ूम की, "ये चेहरा मुझे जाना-पहचाना लग रहा है।"
विक्रम की नज़र ठहर गई।
आस्था ने धीमे स्वर में कहा, “गाँव के एक पुराने फ़ोटो में ये आदमी मौली के साथ एक बालिका शिक्षा कैंप में दिखा था।”
विक्रम ने चेहरा पहचानने के लिए अपने एआई (AI) सिस्टम की मदद ली। आकाश ने प्रोसेसिंग करवाई और रिपोर्ट सामने आई।
नाम: राहुल सेन
पहचान: एक एनजीओ का वॉलंटियर, जिसने मौली के गाँव में शिक्षा अभियान के दौरान काम किया था।
विक्रम का सिर चकरा गया।
“ये एनजीओ वहीं था जहाँ मौली ने वॉलंटियर किया था,” उसने फुसफुसाते हुए कहा।
“क्या ये वही आदमी है जिससे मौली डरती थी?”
शाम का आसमान सुर्ख हो चला लेकिन विक्रम के मन में गहराता अंधेरा और घना हो चला है । मौली की डायरी में वो शब्द।, "भैया, मुझे डर लगता है..." ... अब उसकी नींदों में उतर आए हैं । डर, बेचैनी और ग़ुस्से का घमासान मंथन उसके भीतर हर पल चलता रहता। ऑफिस में उस रात विक्रम की नज़रें लैपटॉप की स्क्रीन पर टिके हुए है । पीछे की खिड़की से हल्की-सी हवा के साथ दूर कहीं से खेतों की मिट्टी की सोंधी खुशबू उस कमरे में भर रही है पर उसका ध्यान सिर्फ एक चीज़ पर है - मौली की डायरी का वो पन्ना:
“भैया, मुझे डर लगता है… पड़ोस के वो अंकल कुछ अजीब करते हैं…”
उसकी उंगलियाँ काँप रही है । वो सोच भी नहीं पाया था कि मौली ने कभी इस तरह कुछ लिखा होगा, वो भी उसी के लिए।
पन्नों को पलटते हुए, मौली की लेखनी जैसे जीवित हो उठी - उसके डर, उसकी उम्मीदें, कुछ गहरे संकेत जो अब जाकर मायने रख रहे थे। आस्था ने पास आकर हल्के स्वर में कहा,
“विक्रम, ये कोई सामान्य बात नहीं है। मौली कुछ कहना चाह रही थी… पर शायद डर के कारण नहीं कह पाई।”
विक्रम की आँखों में नमी है।
“और शायद मैं उसका डर समझ नहीं पाया।”
क्रमशः
आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग...
क्रमशः
waiting for the next part....nice part.
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