एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 38: एक मुलाक़ात और उजाले की झलक

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 37: धुंधली तस्वीरें, गहराता रहस्य पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 38: एक मुलाक़ात और उजाले की झलक

"कभी-कभी एक अनजान मुलाक़ात, अंधेरे में डूबी राहों पर उम्मीद की एक रेखा खींच जाती है जैसे वर्षों से जमी धूल के पीछे छुपा कोई सच पहली बार झिलमिलाता हो।"

विक्रम और आकाश जैसलमेर के पास उस लोकेशन पर पहुंचे। विक्रम ने राहुल को ढूँढ निकाला। उस छोटे शहर की एनजीओ शाखा में काम कर रहा है वो शाखा इंचार्ज के पद पर कार्यरत है - पहले जैसा तेज़-तर्रार नहीं, पर आँखों में कोई बोझ ज़रूर पाले हुए दिखा। वो एनजीओ उस इलाके में जल और शिक्षा के प्रोजेक्ट्स पर काम करती है।

“मैं विक्रम चौधरी हूँ... मौली का भाई।”
राहुल हड़बड़ा गया।
“मुझे पता था... आप मुझसे मिलने ज़रूर आएंगे ”
राहुल की आँखें भर आईं।
“उस दिन पुल के पास मैं था...मैंने कुछ देखा था... पर तब मुझे लगा, वो मेरा भ्रम था। लेकिन अब... अब लगता है, मैंने मौली के साथ ग़लती की।”
राहुल ने बताया - उस शाम वो गाँव के पुल के पास से गुज़र रहा था। वहाँ मौली किसी से बहस कर रही थी। कोई पुरुष था, गाड़ी में। मौली पुल पर  खड़ी हुई थी। 
वो व्यक्ति ग़ुस्से में कुछ कह रहा था,
“अगर किसी और को बताया, तो अंजाम बुरा होगा।”
राहुल के डर ने उसे रोका, लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ने से पहले ही वो गाड़ी तेज़ी से निकल गई… और मौली वहीं अकेली खड़ी रह गई।
“और अगली सुबह मौली लापता थी,” राहुल की आवाज़ काँप रही थी।
विक्रम की मुट्ठियाँ कस गईं।
"तुमने कुछ किया क्यों नहीं?"
“तो बताओ, क्या हुआ था मौली के साथ?”
"क्योंकि जो आदमी उसे डरा रहा था... वो अकेला नहीं था.... और वो कोई आम आदमी  नहीं था।"
विक्रम ने जोश में आकर राहुल का कॉलर पकड़ लिया। " कौन था वो आदमी? नाम बताओ मुझे?"
आकाश ने उसके हाथ से राहुल का कॉलर छुटाया और कहा," हमें उस आदमी का नाम बता दो। "
"पर मुझे कुछ होगा तो नहीं ?" राहुल कांपते हुए बोला 
"हम वादा करते हैं की इन सबमे तुम्हारा नाम कहीं नहीं आएगा बस तुम उस आदमी का नाम बता दो। " आकाश ने उसके कंधे पकड़कर उसकी आँखों में झांकते हुए कहा 
"राजेंद्र मल्होत्रा .... ", राहुल ने लड़खड़ाती ज़ुबान से बताया 
"राजेंद्र  मल्होत्रा !"विक्रम ने आश्चर्य  से कहा 
"हाँ राजेंद्र मल्होत्रा ! मल्होत्रा इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के मालिक।"
"अच्छा वो गांव में कैसे थे उस वक़्त?" विक्रम ने पूछा 
"तुम भूल गए विक्रम गांव में नदी पर एक डैम बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ था और यही वो कंपनी थी जिसे ये प्रोजेक्ट दिया गया था।"

विक्रम को याद आया - गाँव के पास नदी पर हाल ही में एक प्राइवेट डैमिंग प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। कुछ स्थानीय विरोध भी हुआ था, पर धीरे-धीरे सब चुप हो गए थे। 
उसे याद आया कि मल्होत्रा इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को ही ये  प्रोजेक्ट आवंटित हुआ था। 
विक्रम की आँखों में एक ठंडी चमक आई।

आकाश ने तुरंत कहा, "ये नाम जाना-पहचाना लगता है। राजेंद्र मल्होत्रा — वही नाम… जो कहीं सुना था। पर कहाँ सुना था मैंने ? मैं तो तुम्हारे गांव का भी नहीं हूँ फिर मुझे राजेंद्र मल्होत्रा क्यों जाना पहचाना नाम लग रहा है ?"

विक्रम और आकाश सोच में पड़ गए। राहुल अवाक् उन दोनों को ताकता रहा। 

और तभी स्मृति कौंधी - रॉनी मल्होत्रा, उन लोगों  के कॉलेज का बैचमेट। जो हर वक़्त विक्रम से चिढ़ता रहता था क्योंकि विक्रम हमेशा टॉपर रहता। और ये राजेंद्र? वही है रॉनी का पिता।

एक साथ ही विक्रम और आकाश बोल पड़े, 
"रॉनी मल्होत्रा - हमारा बैचमेट था इंजीनियरिंग कॉलेज में सेम ब्रांच में - ईसीई में।"

आकाश बोला, "तुझसे चिढ़ता था क्योंकि तू उससे बेहतर करता था। तू टॉपर था हमारे बैच का और वो तुझसे जलता था तेरी कॉपी करने की कोशिश करता रहता था और कभी तेरे आसपास भी फटक नहीं पाया था क्योंकि उसमे ओरिजिनल  कुछ नहीं था बस नकलीपन था। केवल  अपने  पापा की पैसों की धौंस जमाता रहता था कि मेरे पापा की बहुत बड़ी कंपनी है - डैम और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स बनाते हैं तभी बताया था कंपनी का नाम और  उसके पिता का नाम भी बताया था उसने - राजेंद्र मल्होत्रा।"

"हाँ खासतौर से सेकंड ईयर के बाद से मुझसे खार खाए रहता था। "विक्रम सोचते हुए बोला 
"अरे! सेकंड ईयर के बाद ही तो मौली गायब हुई थी। "
विक्रम दीवार से टिककर खड़ा हो गया,
“तो क्या ये सब... कॉलेज की जलन से कहीं ज़्यादा बड़ा कुछ था?”
विक्रम की आँखों  में खून उतर आया। 

आकाश ने तुरंत लैपटॉप पर नाम सर्च किया, "राजेंद्र मल्होत्रा, एक बिज़नेसमैन। कई राज्यों में प्राइवेट डैमिंग और माइक्रो-हाईड्रो प्रोजेक्ट्स चलाते हैं। विवादित भी रहे हैं।"

विक्रम ने राहुल सेन से पूछा," तुम और क्या जानते हो इस बारे में? या राजेंद्र मल्होत्रा के बारे में?"

राहुल ने बताया, "मैंने उस दिन भी एक कॉल करने की कोशिश की थी जिस दिन मौली नदी में गायब हो गयी थी पर कोई फायदा नहीं हुआ उसका क्योंकि मैं डर  गया था और बता नहीं पाया था।  मैंने इसके बाद अपनी पोस्टिंग दूरदराज़ के एक गांव में  करवा ली थी ।  इसके बाद अभी थोड़े दिन पहले मुझे सोहन गुरु जी का फ़ोन आया था और उन्होंने विक्रम के बारे में , एकांश डिजिटल रीजनल सेंटर और मौली लर्निंग हब के बारे में सारी  जानकारी दी।  तब मुझे लगा कि अब सही वक़्त आ गया है कि मैं जो भी  जानता हूँ वो विक्रम को बता दूँ क्योंकि विक्रम अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है तो इन बड़े लोगों से लोहा ले सकता है। मैंने मौली लर्निंग हब वाले दिन भी कॉल की थी तुम्हारे ऑफिस में पर कॉल पिक नहीं हुई।  सेफ्टी के लिए मैंने इंटरनेट कॉल का सहारा लिया था ताकि मुझे कोई ट्रेस ना कर सके। इसके बाद मैंने तुम्हें सिक्योर ईमेल किये और तुम्हे यहाँ मिलने के लिए बुलाया।"

राहुल ठहरकर बोला, "बस मेरा नाम इन सबमे नहीं आना चाइये वो बहुत बड़े लोग हैं और मैं ठहरा बाल-बच्चेदार आदमी. मेरी पत्नी, बच्चे और माँ सभी मुझ पर निर्भर हैं।  मुझे कुछ हुआ तो वे सब जीतेजी मर जायेंगे।"

"तुम चिंता मत करो तुम्हारा नाम कहीं नहीं आएगा बस ये बता दो कि कुछ और भी मालूम है तुम्हे क्या?"

"नहीं इससे ज्यादा मैं नहीं जानता पर मौली कुछ तो जान गई थी राजेंद्र  मल्होत्रा के बारे में... जिसे उसे नहीं जानना चाहिए था और जिसकी वजा से वो लापता हुई वरना फूल तो वो रोज़ाना ही वहां से तोड़ती थी एकदम से उसका गायब होना इसी बात की ओर इशारा करता है कि वो  किसी बहुत गहरे षड़यंत्र की शिकार हुई है।"

"तुम सही कह रहे हो गांव में उस वक़्त क्या गलत हो रहा था हमें मालूम करना ही होगा। क्या मौली ने कुछ देख लिया था? क्या वो किसी निर्माण में हो रहे गैरकानूनी काम या भ्रष्टाचार की गवाह बन गई थी? या कहानी इससे बिलकुल अलग ही थी ? खोजना होगा ही!" विक्रम ने कहा 

विक्रम और आकाश ने राहुल  सेन का धन्यवाद किया और वे दोनों उसी समय वापस पुणे के लिए निकल पड़े।  अब आगे की स्ट्रेटेजी पुणे में आस्था और प्रिया के साथ मिलकर बनानी है। 

क्रमशः 
आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 39 : नदी किनारे मौन चीख़ें
👉 “एक एकड़ से शिखर तक” के सभी भाग यहाँ पढ़ें

टिप्पणियाँ