एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 39: नदी किनारे मौन चीख़ें

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 38: एक मुलाक़ात और उजाले की झलक पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 39: नदी किनारे मौन चीख़ें

मूसलाधार बरसात की एक रात बीती है । सुबह की पहली धूप धीरे-धीरे नदी के किनारे उतर रही है । पत्तों पर ठहरी हुई बूंदें और मिट्टी की सोंधी गंध... सबमें एक अजीब सी खामोशी है लेकिन इस बार यह खामोशी सिर्फ मौसम की नहीं थी… यह आने वाले तूफान की भूमिका है।

गांव से आई एक खबर

जैसलमेर में राहुल से मिलकर विक्रम और आकाश पुणे लौट चुके हैं । माँ बाबा को विक्रम ने राजेंद्र मल्होत्रा और उसकी मौली से उस दिन हुई बहस के बारे में बताया जिसके अगले दिन से वो नदी में बहकर गायब हो गई थी।  

माँ  ने वो ही सब  दोहराया, " मौली कुछ दिनों से कुछ गुमसुम रहती थी और पूछने पर 'कुछ बात नहीं है' कहा करती थी।  जिस दिन सुबह वो गायब हुई उसके पहले दिन वो शाम को लौटकर आई थी तब भी उसने कुछ नहीं कहा था।  हाँ, अब लगता है कि शायद वो डरी  हुई थी। " 

रमा और बाबा उदास हो गए कि मौली के साथ कुछ तो बात हुई थी और उसने उन्हें नहीं बताया कभी ज़िक्र भी नहीं किया।

मौली के बारे में जो बातें राहुल ने बताईं, वो अब सिर्फ शक नहीं रहे थे बल्कि कुछ ठोस शक्ल लेने लगे हैं । विक्रम ने जैसे ही अपने ऑफिस में प्रवेश किया, हाँ आस्था और प्रिया उनका इंतज़ार कर रही थीं। दोनों ने उनकी आँखों में गहराई से देखा... जहाँ एक थकान तो है ही लेकिन साथ ही कुछ टूटने की दस्तक भी।

बैठक शुरू हुई, आकाश ने पूरा घटनाक्रम शांत स्वर में साझा किया। आस्था का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ता जा रहा है। 
वह बोली,"छोटी सी मौली ! वो ऐसा क्या जान गई थी कि उसके साथ ऐसा हुआ?"
प्रिया ने बस कहा—"तो, अब सच सामने है। पर रास्ता लंबा होगा।"
उसी वक़्त फोन की घंटी बजी, गांव से कॉल आया।
“विक्रम भैया... कुएँ के पास, नदी की ओर कुछ मिला है। शायद मौली की चप्पल ... और कुछ हड्डियाँ भी…”

टूटा सन्नाटा, टूटी उम्मीद

गांव  की नदी जो हमेशा एक शांत प्रवाह में रहती थी, उस दिन अलग ही अपनी धुन में तेज तेज उछाल मार रही है । पंचायत से थोड़ी दूर कुछ बच्चे खेलते हुए नदी किनारे पहुँचे। नदी किनारे बच्चे खेल रहे थे  कि उनमें से एक लड़के की नज़र मिट्टी के बीच झाँकते सफेद ढांचे पर पड़ी। वो चीखा, बाकी सब दौड़े। चीखते हुए वो घर की ओर भागा।

जल्दी ही गाँव में खबर फैल गई - “नदी किनारे कुछ हड्डियाँ मिली हैं।”
शोर मचा - “हड्डियाँ मिली हैं… किसी इंसान की!”

थाने में खबर पहुँची। जल्द ही पुलिस आई तब तक कुछ ग्रामीण वहाँ इकट्ठा हो गए । चारों ओर लाल फीते लगाए गए, जगह घेर ली गई। एक-एक हड्डी संभालकर निकाली गई। 
थोड़ी देर में ही फोरेंसिक की टीम भी आ पहुंची। 
फोरेंसिक की टीम ने प्राइमरी जांच के बाद कहा, “ये हड्डियाँ किसी किशोरी की हैं - उम्र लगभग 12  से 16 वर्ष।”

माँ और बाबा से बताकर विक्रम ने उसी शाम की फ्लाइट बुक की। हताश माँ बाबा बस ईश्वर से प्रार्थना कर सच का पता चल जाए ऐसा मन में विचार करने लगे। 

विक्रम, आकाश और प्रिया अगले ही दिन गाँव पहुँचे। विक्रम को नदी का किनारा  वैसा ही लगा, जैसा बचपन में देखा था, पर उस दिन वहाँ सिर्फ एक रंग व्याप्त है... गहरी खामोशी का।

विक्रम वहाँ खड़ा हुआ और जैसे उसकी आँखों में मौली की छवि तैर गई - रंग-बिरंगे क्लिप्स लगाए, स्केचबुक थामे हुए, जो हमेशा किसी न किसी नई कहानी को जन्म दे रही होती थी। मौली आज से सात साल पहले लापता हुई थी तब वह बारह वर्ष की थी और विक्रम उन्नीस वर्ष का था।  विक्रम और मौली में सात वर्ष की छोटाई-बड़ाई है।  विक्रम का मौली बहुत आदर सम्मान करती थी।  बचपन में मौली बहुत चुलबुली थी परन्तु विक्रम जब इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई करने गया तब मात्र दस वर्ष की मौली देखते ही देखते मानो बड़ी हो गई थी।  वह स्वभाव से शांत, पढ़ाई में दिमाग लगाने वाली बच्ची बन गई थी और तो और विक्रम की तरह अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाने में उसे भी मज़ा आता था। वह अपनी नोटबुक में अपने मन की बात लिखा करती थी कभी कविताओं के रूप में कभी विचार या लेख के रूप में।  बहुत बार मौली की कहानी अखबार के 'बच्चों का कोना' काॅलम में प्रकाशित भी हुई थी। 

गांव पहुंचकर पता चला कि पुलिस ने हड्डियां डीएनए जाँच के लिए शहर भेज दी। पुणे में उसकी माँ बाबा के डीएनए सैंपल लेने के लिए फोरेंसिक टीम विक्रम के घर के लिए निकल चुकी है। विक्रम ने आस्था को सब कुछ बताकर माँ के पास रहने को कहा। 

माँ की प्रतिक्रिया – मौन की चीख

मुंबई में उस वक़्त माँ मंदिर के तुलसी चौरे के पास बैठी हैं  जब आस्था ने उनके पास जाकर धीरे से उनका हाथ थामा।
माँ ने बिना पूछे ही समझ लिया, “बोल दे बिटिया… मेरी मौली अब कभी नहीं लौटेगी, है ना?”
आस्था ने बस उनकी गोद में सिर रख दिया और रो पड़ी।
माँ की आँखें पथरा गईं। वो ना चीखी, ना चिल्लाई। बस एक बात कही,  “अब सच चाहिए, बेटा। झूठ और इन अधूरे जवाबों ने बहुत सताया है।” 
माँ की आँखें एक पल को सूनी हो गईं, फिर उन्होंने सिर आसमान की ओर उठाया, “हे देवता… अब सच चाहिए। अधूरे जवाबों की यातना अब सहन नहीं होती।”
आस्था बस रोती रही।

विक्रम ने मौली की वो नोटबुक का पन्ना माँ को भी  दिखाया था , “भैया, मुझे डर लगता है… पड़ोस के वो अंकल कुछ अजीब करते हैं…”
माँ ने कांपते हाथों से वो पन्ना थमा और बस एक वाक्य बोलीं, “मैंने क्यूँ नहीं पढ़ी ये बातें उस वक़्त? क्यों  नहीं महसूस किया उसकी बेचैनी?” 
उनकी आँखें अब आँसुओं से नहीं, पछतावे से भरी हुई हैं। 

इधर फोरेंसिक टीम ने माँ बाबा के सैंपल कलेक्ट कर लिए। 

गांव की चुप्पी

विक्रम उस दोपहर गाँव में चुपचाप घूमता रहा। हर मोड़ पर बचपन की यादें हैं लेकिन आज हर गली, हर चेहरा अजनबी उसे लगा।
कुछ लोग घरों से झाँक रहे हैं परन्तु उनकी आँखों में सहानुभूति नहीं, भय है।  
किसी ने कहा भी,“बिटिया होशियार थी… कुछ ज़्यादा ही।”

विक्रम सुनता रहा। उसका खून खौलता रहा लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वो जानता है  कि ग़ुस्सा उसे मौली तक नहीं ले जाएगा, लेकिन सच्चाई ले जाएगी।

डीएनए  रिपोर्ट आने में समय है लेकिन विक्रम अब रुकने वालों में से नहीं है । उसने गाँव के सरकारी रिकॉर्ड खंगाले। एक पुरानी आरटीआई (RTI ) रिपोर्ट में वो नाम मिला - मल्होत्रा इंफ्रास्ट्रक्चर, वही जो उस नदी पर प्राइवेट डैमिंग प्रोजेक्ट चला रही थी।

विक्रम के रोंगटे खड़े हो गए। राजेंद्र मल्होत्रा - रॉनी का पिता। वही रॉनी, जो कॉलेज में हमेशा उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता था, जो जलता था उसकी प्रतिभा से और अपने अमीर पिता के रुतबे का दम भरता था।

उसे याद आता है राहुल सेन का बयान, “वो सिर्फ डूब नहीं गई थी... कुछ लोग उसके पीछे थे।”

अब सब कुछ कड़ियों में जुड़ने लगा है।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अनुसार, मौली के गायब होने से कुछ ही दिन पहले उस इलाके में सर्वे हुआ था। मौली वहाँ जाती थी- "पक्षी देखने और क्रिएटिव लेखन के लिए (Bird Watching और Creative Writing के लिए)" जैसा उसने एक बार अपने पेज पर लिखा था।

मौली ने एक बार अपनी डायरी में लिखा था, “मैं नदी किनारे रोज़ जाती हूँ… वहाँ परिंदों का संगीत और कुछ शांतिपूर्ण पल मिलते हैं।” 
लेकिन शायद वहाँ कोई गहरी साजिश भी दबी थी, जो मौली ने देख ली थी। 
क्या उसने कुछ ऐसा देख लिया था, जो देखना नहीं चाहिए था?

विक्रम की आँखें भर आईं। उसकी बहन एक बच्ची नहीं थी - वो एक सच्चाई की खोजी, एक निर्भीक आत्मा थी।

थाने से कहा जाता है कि पुलिस उनसे संपर्क कर लेगी वो लोग मुंबई  जा सकते हैं।  विक्रम, आकाश और प्रिया गांव से वापस मुंबई लौट आते हैं। 

मुंबई  में माँ एक कोने में बैठीं रहती हैं... अब वो रोती नहीं हैं बस देखती रहती हैं जैसे सबकुछ बाहर से नहीं भीतर से महसूस कर रही हों।

कुछ दिन बाद पुलिस स्टेशन से फोन आता है। माँ बाबा और विक्रम वहीं मौज़ूद हैं।
विक्रम फोन स्पीकर पर कर देता है।
इंस्पेक्टर बताते  हैं,  “डीएनए सैंपल भेज दिए गए हैं। रिपोर्ट आने में समय लगेगा… लेकिन प्राथमिक जाँच में…”
माँ पास बैठी हैं, विक्रम का हाथ थामे।
इंस्पेक्टर का स्वर भारी हो जाता है,
“…प्राथमिक अनुमान यही है कि ये कंकाल मौली का हो सकता है। लेकिन पुष्टि बाकी है।”
एक पल को जैसे समय रुक जाता है।
माँ की आँखें भर आती हैं लेकिन अब चीख नहीं निकलती, सिर्फ एक सवाल तैरता है, “किसने किया ये?”
विक्रम की सांसे जैसे थम गईं।
विक्रम ने फोन पकड़े-पकड़े आसमान की ओर देखा। हवा में हल्की ठंडक है पर उसके भीतर आग धधक रही है।

“अब मैं रुकूँगा नहीं... मेरी मौली को न्याय मिलेगा।”

क्रमशः 
आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 40: एक उत्तर, कई प्रश्न
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