एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 40: एक उत्तर, कई प्रश्न
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 39: नदी किनारे मौन चीख़ें पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 40: एक उत्तर, कई प्रश्न
जवाब की एक चिट्ठी – जो सवाल बन गई
पुणे की सुबह उस दिन कुछ ज़्यादा ही चुप है। बादलों से ढका आसमान जैसे भीतर की बेचैनी को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहा है। हवा में हल्की सी सीलन है शायद किसी पुराने डर की जो लौटकर आ गया है।
“DNA ANALYSIS REPORT – केस सं. 716/Mouli Missing”
विक्रम का दिल धड़कने लगा - तेज़, बेकाबू और बेतरतीब ढंग से ।
उसके हाथ काँपने लगे। माँ ने उसके हाथों से लिफाफ़ा लिया, पर खोला नहीं। बस चुपचाप उसकी तरफ देखा जैसे कोई अनहोनी की आहट पहचान चुकी हों। बाबा निढाल से सोफे पर बैठ गए।
ड्राइंग रूम के कोने में पड़ी मौली की तस्वीर… गुलाबी दुपट्टे वाली हँसी… आज किसी ब्लैक एंड वाइट फ्रेम में बंध गई थी।
रिपोर्ट के अंदर तीन पन्ने थे - पर सबसे जरूरी शब्द पहले ही पन्ने के बीच में थे:
“Due to advanced skeletal degradation, mitochondrial and nuclear DNA could not be preserved. Sample could not be matched with provided reference. No conclusive identity possible.”
(“ कंकाल की अत्यधिक क्षति के कारण माइटोकॉन्ड्रियल और न्यूक्लियर डीएनए सुरक्षित नहीं रह सका यानी कंकाल में अत्यधिक क्षरण होने के कारण डीएनए संरक्षित नहीं रह सका। इसलिए दिए गए नमूने से कोई मेल स्थापित नहीं हो सका। पहचान की पुष्टि नहीं की जा सकती। किसी निष्कर्षात्मक पहचान की संभावना नहीं है।”)
विक्रम को लगा जैसे किसी ने ज़ोर से उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो। विक्रम ने आँखें बंद कर लीं, फिर धीरे से कहा ,
“माँ बाबा … ये पता नहीं चला कि वो मौली थी या नहीं। कोई पुष्टि नहीं हो पाई…”
रिपोर्ट हाथ में लिए विक्रम कुछ देर चुप खड़ा रहा।
माँ की आँखों में सवाल हैं पर होठों पर सन्नाटा।
धीरे से उन्होंने पूछा, “बिलकुल नहीं पहचान पाए क्या…?”
विक्रम ने गहरी सांस ली, “माँ… शरीर इतनी बुरी हालत में मिला कि पहचानना मुश्किल था। न्यूक्लियर डीएनए - जो हमारे माँ-पापा दोनों से आता है... वो भी पूरी तरह टूट चुका था। और…”
वो रुका, जैसे कुछ शब्द भीतर अटक गए हों।
“और?” माँ की आँखें अब भर आई थीं।
“और जो माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए होता है… जो सिर्फ माँ से आता है… वो भी सुरक्षित नहीं रहा।”
माँ कुछ समझ नहीं पाईं।
माँ की आवाज़ काँपी, “तो… इसका मतलब…?”
“इसका मतलब है, हम न तो हाँ कह सकते हैं, न ना। ये मौली हो भी सकती है… और नहीं भी।
रिपोर्ट कहती है - 'कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका।'"
माँ और बाबा की आँखों में उम्मीद की हलकी से किरण उभरी और लुप्त हो गई।
माँ की आँखें उस पर टिकी थीं। उन्होंने धड़कते दिल से पूछा,
विक्रम का गला भर आया। बाबा की आँखों का सूनापन और गहरा गया।
“क्या मतलब?”
विक्रम ने धीरे से समझाया,
“माँ, जब शरीर बहुत समय तक खुले में पड़ा रहता है, पानी या कीड़ों के संपर्क में आता है तो डीएनए धीरे-धीरे गलने लगता है। न्यूक्लियर डीएनए सबसे पहले नष्ट होता है। उम्मीद माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए से रहती है क्योंकि वो थोड़ा मजबूत होता है… पर इस बार वो भी नहीं बचा।”
विक्रम की आँखें किसी अँधेरे को चीरती सी दूर देख रही थीं,
“अब… अब उम्मीद ही एकमात्र रास्ता है माँ… और मैं उसे छोड़ने वाला नहीं हूँ।”
माँ का सिर झुक गया। एक ठंडी सांस उनके होठों से निकली, लेकिन आँखें अब भी सूखी थीं।
“तो… वो ज़िंदा हो सकती है?” उनकी आवाज़ टूटी, पर उसमें एक टूटे हुए विश्वास की झलक भी है।
विक्रम ने उनका हाथ थाम लिया, उसका गला भर आया।
“हाँ माँ… अब उम्मीद है कि शायद मौली कहीं है… ज़िंदा। और मैं उसे ढूढूँगा… जब तक सांस है।”
पुणे से गांव तक
ये खबर आग की तरह फैली कि डीएनए रिपोर्ट से कुछ साफ़ नहीं हुआ।
कुछ ने कहा -
“मालूम होता है, पुल के नीचे कुछ और छिपा था…”
और कुछ की आँखों में शक का धुंधला साया और गहराने लगा। मौली का रहस्य अब और उलझ गया है।
“शरीर को इस हाल में किसने छोड़ा?”
“क्या किसी ने सच छुपाने के लिए ये सब किया?”
रिपोर्ट के शून्य नतीजे या असमंजस वाले नतीजे ने ना केवल मौली की पहचान को धुंधला कर दिया, बल्कि उन सारे धागों को भी जिन्हें विक्रम पिछले महीनों से जोड़ने की कोशिश कर रहा था।
घर की खामोशियाँ
पुणे में विक्रम का घर, कभी तेज़ आवाज़ों, मीटिंग कॉल्स और प्रेजेंटेशन की तैयारी से भरा रहता था। अब हर कोने में एक प्रतीक्षा की चुप्पी है।
माँ अक्सर मौली की तस्वीर के सामने बैठी रहतीं, उसके बालों की लट को हल्के से सहलाती हुई... जैसे वो तस्वीर में नहीं, सामने बैठी हो।
माँ-बाबा का कमरा अब अक्सर बंद रहता। रात में विक्रम उनकी दरवाज़े की दरार से झाँकता - बाबा रेडियो पर पुराने गीत सुनते और माँ, मौली की तस्वीर को निहारती रहतीं।
विक्रम रात में जब हल्के पाँवों से उस तरफ़ जाता तो दरवाज़े की दरार से बाबा को रेडियो पर पुराने गाने सुनते देखता।
एक बार उसने सुना ‘तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा…’ बज रहा था।
“तो क्या वो ज़िंदा हो सकती है?”
विक्रम उन्हें थाम लेता -
“मैं वादा करता हूँ माँ, अगर मेरी बहन ज़िंदा है तो मैं उसे ढूँढ कर ही सांस लूँगा।”
विक्रम का कमरा… अब दो हिस्सों में बँटा है -
एक तरफ़ लैपटॉप, प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स, वीडियो कॉल्स, टाइम मैनेजमेंट ग्राफ्स - कॉर्पोरेट सीईओ की दुनिया।
दूसरी तरफ़ - वो छोटा सा बक्सा जिसमें उनकी बचपन की यादें हैं... मौली की नोटबुक, मौली की डायरी, एक राखी जो उसने विक्रम को पहले साल जब वो इंजीनियरिंग कॉलेज में गया था तब साथ में दी थी और वो शुभ यात्रा कार्ड, मौली का बनाया हुआ जिसमे अंग बिरंगे फूलों के बीच मौली ने लिखा था -
"जैसे आप पढ़ते हो , वैसे ही मुझे भी पढ़ाना। "
उसने रिपोर्ट को मोड़ा और अपने पास रखे बक्से में सावधानी से रखा। फिर मौली की डायरी खोली।
एक पन्ना फिर से उसकी आंखों में तैर गया -
“भैया, मुझे डर लगता है…”
विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
“मौली कहाँ है तू ? मैं तुझे ढूँढ़कर रहूँगा।”
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें