एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 41 : सपना, संघर्ष और संकल्प
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 40: एक उत्तर, कई प्रश्न पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 41 : सपना, संघर्ष और संकल्प
यह कोई साधारण स्टार्टअप नहीं था। यह भारत की ग्रामीण आत्मा को तकनीक से जोड़ने की कोशिश थी - एक एजुकेशन-टेक कंपनी जो गाँवों के बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़कर उन्हें आधुनिकता से परिचित कराए। इसके बाद से विक्रम, वो महज़ एक नाम नहीं रहा, एक मिसाल बन चुका है। एक ऐसा नाम जो भारत की ग्रामीण शिक्षा क्रांति का पर्याय है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने मजबूत इरादों से एकांश टेक्नोलॉजी की नींव रखी - एक अग्रणी एजुकेशन-टेक फर्म, जो डिजिटल साधनों के ज़रिए उन बच्चों तक शिक्षा पहुँचा रही है, जिनके गाँवों में आज भी मोबाइल सिग्नल बमुश्किल पहुँचते हैं।
विक्रम का सपना था कि हर गाँव में एक डिजिटल सेंटर हो, जिसे "मौली लर्निंग हब" कहा जाए। जहाँ पढ़ाई स्थानीय भाषा में हो, पाठ्यक्रम जीवन से जुड़ा हो, और डिजिटल माध्यम हर बच्चे तक पहुंचे चाहें वह शहर में हो या खेतों के बीच।
पर अब…आज वही बोर्डरूम वीरान है। कुर्सियाँ खाली पड़ी हैं। प्रोजेक्टर की स्क्रीन धूल से ढँकी हुई है। टेबल पर रखा कॉफी मग ठंडा हो चुका है ।उस ठहरे हुए कमरे में बस एक शख्स बैठा हुआ है - विक्रम। वही विक्रम, जो कभी इस रूम में खड़ा होकर दुनिया बदलने की बातें करता था, आज अकेले बैठा अपनी ही सोच से सवाल कर रहा है।
को-फाउंडर का साथ छोड़ना
"विक्रम, तुम्हारी सोच नेक है… लेकिन मार्केट में आदर्श नहीं चलता, प्रॉफिट चलता है।"
ये शब्द थे आदित्य के, जो इस कंपनी का को-फाउंडर था। वही आदित्य, जिसने हर इन्वेस्टर पिच में विक्रम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया था, हर संभव प्रयासों में विक्रम के साथ खड़ा रहा था, एकांश के निर्माण के दिन से वह विक्रम का दायां हाथ के रूप में काम कर रहा था, आज एक प्रेस नोट जारी कर अलग हो गया -
"I hereby resign from all active roles in Ekansh Technology Private Limited due to differences in vision. I wish Vikram all the best."
(मैं एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड में अपनी सभी सक्रिय भूमिकाओं से इस्तीफ़ा देता हूँ क्योंकि हमारी दृष्टिकोण में अंतर है। मैं विक्रम को भविष्य के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ।)
क्या वाकई शिक्षा और तकनीक का सपना इतना कठिन था कि दो साथी भी उसे एक नजरिए से नहीं देख सकते हैं? क्या शिक्षा का बाज़ारीकरण आवश्यक है ? कुछ मौलिक नीति सम्बन्धी विषयों पर सहमति मायने नहीं राखी जा सकती है ? मुनाफ़ा काम हो और संतोष अधिक , क्या इस फॉर्मूले का क्रियान्वयन इतना मुश्किल है कि पुराने लोग साथ छोड़ जाते हैं ?
आदित्य के जाने के बाद, निवेशकों ने भी अपनी दिलचस्पी कम कर दी।
"Team stability is a concern."
(टीम की स्थिरता एक चिंता का विषय है।)
"Revenue model isn't scalable."
(राजस्व /आय मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू करना संभव नहीं है।)
"Why rural, when urban is booming?"
(जब शहरी बाज़ार फल-फूल रहा है, तो ग्रामीण क्षेत्र क्यों?)
इन प्रश्नों ने विक्रम के आत्मविश्वास को चुनौती दी लेकिन उसके इरादे को नहीं। उसके हौंसले अभी भी बुलंद हैं। हर सुबह वह नए स्कूलों से वीडियो कॉल करता, गाँव के शिक्षकों से बात करता। उसकी कंपनी की गिरती साख के चलते बहुत लोगों ने एकांश को छोड़ दिया। मुंबई में विक्रम का टीम साइज कम हो गया। ये तो अच्छा है कि गांवों में उसकी कम्पनी के जो कर्मचारी तैनात हैं वे लोग पूरी जिम्मेदारी से अपना अपना कार्य संभल रहे हैं। विक्रम छोटी-सी ही भली पर अपनी टीम को प्रेरित करता।
आस्था और प्रिया जी तोड़ कोशिश कर रही हैं कंपनी की गिरती साख को बचने के लिए लागतार अख़बारों और सोशल मीडिया में एकांश टेक के विज्ञापन दे रही हैं और ब्लॉग पोस्ट्स को प्रमोट कर रही हैं, नए नए कैंपेन चला रही हैं। ताकि लोगों का विश्वास उनकी कंपनी पर बना रहे। आकाश भी अपनी एनजीओ की मदद से एकांश के इस मुश्किल वक़्त में उसके साथ आ खड़ा हुआ है। सुपर-9 के अन्य सभी सदस्य विक्रम की इस कठिन घड़ी में उसके साथ शारीरिक रूप से मौजूद भले ही ना हों परंतु हर पल बात करते हैं, समाधान खोजते हैं और विक्रम के साथ होने का भरोसा दिलाया करते हैं।
उलझन और विकल्प
रात के सन्नाटे में ऑफिस की पीली रोशनी में, विक्रम अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर देख रहा है - कंपनी के खातों में बस तीन महीने की सैलरी बची है।
उसके सामने दो रास्ते हैं:
किसी बड़ी कंपनी को एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड का अधिग्रहण करने देना,
या घाटे में रहकर भी अपने सिद्धांतों पर टिके रहना।
"आदर्श या अस्तित्व?" - यही सवाल अब उसकी हर साँस में गूँजता है।
उसी क्षण फोन बजा - रीमा मैम का कॉल आया है। रीमा मैम, एडूवर्स ग्लोबल में उसकी सीनियर, सलाहकार और पुरानी मित्र।
“विक्रम , तुम्हारे आइडिया का कोई जवाब नहीं।तुम्हारा विचार बेजोड़ है।लेकिन अगर तुम थोड़ी पॉलिसी बदलो, अगर तुम थोड़े नीतिगत बदलाव कर लो, जैसे- B2B tie-ups (बीटूबी टाई-अप्स) या शहरी मॉडल भी जोड़ो, तो इन्वेस्टर्स वापस आ सकते हैं, कम्पनी के निवेशक लौट सकते हैं।”
विक्रम थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला,
“मैं बदलाव के खिलाफ नहीं हूँ… लेकिन शिक्षा मेरे लिए व्यापार नहीं हो सकती। ये मेरे लिए मौली है… और मेरी मौली ज़िंदा है। मैं देर सबेर उसे ढूंढ लूंगा और एकांश को भी उसके उसूलों पर ही रखूंगा। यह मेरा संकल्प है।”
तूफ़ान की आहट
अगली सुबह ऑफिस पहुँचे विक्रम की तरफ रिसेप्शनिस्ट ने एक अख़बार बढ़ाया।
"RonnieCorp enters EduTech space with ₹100 Cr project"
"New AI-based rural learning centers to be launched pan-India"
(RonnieCorp (रॉनी कॉर्प ) 100 करोड़ की योजना के साथ एजु-टेक में प्रवेश कर रही है। देशभर में AI (एआई )आधारित ग्रामीण शिक्षा केंद्र शुरू किए जाएंगे।)
विक्रम की आँखें एक पल के लिए रुक गईं। रॉनी कॉर्प - वही कंपनी जिसने कुछ साल पहले गाँवों की ज़मीनों के लिए विक्रम के प्रयासों में बाधा डाली थी। वही कॉर्पोरेट जिसने कुछ साल पहले गाँवों के ज़मीन सौदों में विक्रम के खिलाफ मोर्चा खोला था।
अब वही कंपनी गाँवों की शिक्षा में हाथ डाल रही है? अब उसी मैदान में उतर रही है।
“अब ये सिर्फ एक स्टार्टअप की नहीं, सोच की लड़ाई है,” विक्रम ने मन में सोचा
क्रमशः
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