एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 42: प्रतिशोध की नींव, मक़सद की लड़ाई

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 41 : सपना, संघर्ष और संकल्प पढ़कर शुरुआत करें।

भाग  42: प्रतिशोध की नींव, मक़सद की लड़ाई

 अतीत की हार, वर्तमान की प्रतिशोध

मुंबई की चमचमाती गगनचुम्बी  इमारतों के बीच, एक ऑफिस है - रॉनी कॉर्प (Ronnie Corp) का हेडक्वार्टर। हाई-क्लास बिज़नेस सूट में रॉनी मल्होत्रा, अपनी ऑफिस चेयर पर बैठे हुए सामने लगी विशाल स्क्रीन को एकटक घूर रहा है। स्क्रीन पर दिख रहा है  - “एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड – Rural EdTech Reinvented”।

उसने होंठों के कोने से एक कटाक्ष भरी मुस्कान उगली।
“विक्रम चौधरी … इस बार मैं तुम्हारा सपना नहीं, तुम्हारा अस्तित्व छीनूंगा।”
वहाँ बैठी उसकी असिस्टेंट तान्या सकुचाकर बोली, “सर, यह वही विक्रम है न जो… कॉलेज के टाइम…”
"यही है वो लड़का..." रॉनी मल्होत्रा की आँखों में एक पुराना ज्वाला फूट पड़ा
रॉनी ने नफरत से गर्दन झटक दी, “वही जो उस डिबेट में मुझे हरा कर 'यूथ आइकन अवॉर्ड' ले गया था। सब मुझे ही जीतने वाला मान रहे थे, पर वो गाँव का लौंडा सब पर भारी पड़ गया। उस दिन की वो हार मैं आज तक नहीं भूला।”

एक वक़्त था जब रॉनी और विक्रम एक ही स्टार्टअप प्रतियोगिता में आमने-सामने खड़े थे। दोनों की सोच अलग थी - रॉनी का नज़रिया शुद्ध मुनाफा था, वहीं विक्रम का सपना था - शिक्षा और तकनीक को गांव की मिट्टी से जोड़ना। उस दिन हारते समय रॉनी की आँखों में सिर्फ़ एक बात थी - बदला।

अब वो वक़्त आ चुका है । रॉनी मल्होत्रा, जो अब रॉनी कॉर्प का सीईओ है , भारत के सबसे आक्रामक बिज़नेस टाइकून में गिना जाता है । 
उसने स्क्रीन पर प्रोजेक्ट स्लाइड्स पलटते हुए कहा,
"अब उसे मिट्टी में मिलाने की बारी मेरी है।”

विक्रम की जंग अकेलेपन से

दूसरी तरफ, अब विक्रम चौधरी के लिए चीज़ें आसान नहीं रह गई हैं । एकांश टेक्नोलॉजी को फंडिंग नहीं मिल रही थी।
उसके को-फाउंडर ने ये कहकर कंपनी छोड़ दी कि “ग्रामीण शिक्षा कोई स्केलेबल मॉडल नहीं है।”

विक्रम अब पूरी कंपनी को आस्था और प्रिया के साथ मिलकर  संभाल रहा है । आकाश जितना हो सकता है फंडिंग के वास्ते एकांश के लिए बाजार में ज़ोर लगा रहा है।  विक्रम  दिन-रात एकांश डिजिटल सेंटर्स और मौली लर्निंग हब के डेटा, इम्पैक्ट रिपोर्ट्स और पिच डेक्स को सुधारने में लगा हुआ है । 
मगर हर वेंचर कैपिटल मीटिंग में वही जवाब - "It’s emotional, but not investable."
("यह भावनात्मक है, लेकिन निवेश योग्य नहीं है।") 

मगर विक्रम को पता है अगर वो थक कर बैठ गया तो शायद मौली का सपना वो पूरा नहीं कर पाएगा साथ ही मौली की तलाश भी वहीं थम जाएगी। उसके लिए एकांश सिर्फ़ कंपनी नहीं, एक वादा था - माँ से, मौली से, गांव से… और खुद से।

चालों का जाल

रॉनी को पता है  कि वो सिर्फ़ एक प्रोडक्ट से नहीं, एक सोच से लड़ रहा है। उसने अपने मार्केटिंग हेड्स को बुलाया,
“मुझे एक लिस्ट चाहिए - एकांश के सभी क्लाइंट्स, सप्लायर्स और उन स्कूलों की जो उनसे जुड़े हैं।”

अगले ही हफ्ते रॉनी कॉर्प की घोषणा छप गई -
"Ronnie Corp enters EduTech with ₹100 Cr fund for Rural Digital Learning Centers."
("रॉनी कॉर्प ने ग्रामीण डिजिटल लर्निंग सेंटरों के लिए ₹100 करोड़ के फंड के साथ एडुटेक में प्रवेश किया।")

इसी के साथ रॉनी कॉर्प ने "EduCore"(एडुकोर) नाम से एक नया प्रोजेक्ट अनाउंस किया -  ₹100 करोड़ की लागत से ग्रामीण भारत में डिजिटल लर्निंग सेंटर खोलने का ऐलान।

रॉनी ने वही सब्ज़बाग दिखाए जो विक्रम ने कभी दिल से बोए थे पर उसके पीछे मुनाफे की चाल है । उसके लोग एकांश से जुड़े स्कूलों और संस्थाओं से संपर्क करने लगे, सस्ते ऑफर और बड़े वादों के साथ।
पर सच्चाई?
यह प्रोजेक्ट एक हथियार था।

रॉनी ने अपनी सेल्स टीम को निर्देश दिया -
“मुझे एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के हर क्लाइंट की पूरी लिस्ट चाहिए - सरकारी विभाग से लेकर सीएसआर (CSR) पार्टनर तक। जो उनकी वेबसाइट पर दिखे, उससे कहीं ज़्यादा अंदर की जानकारी चाहिए। हर कॉन्ट्रैक्ट, हर एमओयू  (MOU) को टारगेट करो। आज से वे हमारे संभावित क्लाइंट हैं।”
वह जानता है  कि विक्रम का स्टार्टअप अभी फाइनेंशियली कमज़ोर पड़ चुका है  और उसका इमोशनल डिस्ट्रैक्शन - मौली की खोज, उसे अस्थिर कर चुका है।

कॉर्पोरेट का मनोविज्ञान

एकांश के एक प्रमुख क्लाइंट ने विक्रम को मेल किया -
“We are exploring options. Ronnie Corp’s offer is hard to ignore.”
( "हम अन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। रॉनी कॉर्प के प्रस्ताव को नज़र अंदाज़ करना मुश्किल है।")

विक्रम चुपचाप लैपटॉप स्क्रीन को देखता रहा। ये वो चुनौती है  जिसका सामना वो बिना तलवार, बिना ढाल कर रहा है - सिर्फ़ अपने इरादों से।

एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड का ऑफिस की  दीवारों पर बच्चों की ड्रॉइंग्स और गाँव के स्कूलों की तस्वीरें टंगी थीं। यह जगह एक मिशन जैसी लगती है ना  कि सिर्फ़ व्यापार। एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड विक्रम के लिए केवल एक कंपनी नहीं, बल्कि एक आंदोलन है जो यह मानता है कि आने वाली पीढ़ी को इंसान बनाने की जरूरत है।  

पर अब वहाँ भी तनाव की गंध घुल चुकी है । ऑफिस के माहौल में टेंशन के तार खिंच रहे हैं सभी एम्प्लॉईज़ की आँखों में परेशानी साफ़ दिखाई देने लगी है।  सभी कंपनी के भविष्य  के प्रति चिंतित हो उठे हैं। 

विक्रम के लैपटॉप पर एक अन्य  ईमेल खुला है :
Subject: Termination of MOU – Project ShikshaConnect
"We regret to inform you that EduCore by RonnieCorp aligns better with our current CSR objectives..."
(विषय: एमओयू (समझौता ज्ञापन) की समाप्ति - परियोजना शिक्षा कनेक्ट
"हमें आपको यह बताते हुए खेद हो रहा है कि रॉनी कॉर्प द्वारा एडुकोर हमारे वर्तमान सीएसआर उद्देश्यों के साथ बेहतर ढंग से मेल खाता है...")

विक्रम ने चुपचाप स्क्रीन बंद कर दी। 
उसने दीवार की ओर देखा और वहां लगी मौली की तस्वीर से मन ही मन कहा -
“अब ये सिर्फ़ मेरी लड़ाई नहीं है, मौली… ये तुम्हारे नाम को जिंदा रखने की जंग है।”

उसी शाम को ऑफिस मीटिंग में विक्रम ने टीम को बुलाया। उसके साथ अब कुछ पुराने जुनूनी लोग बचे थे, जिनमें आस्था, प्रिया ,एक सीनियर डेवलपर भावना और एक कंटेंट हेड नीरज थे।
विक्रम ने बोर्ड पर लिखा - “हम क्यों कर रहे हैं ये सब?”
टीम चुप रही।
“क्योंकि,” उसने खुद ही जवाब दिया, “ये सिर्फ़ शिक्षा नहीं है। ये उस बच्चे का भविष्य है, जो मिट्टी के घर से निकलकर मिसाइल साइंटिस्ट बनना चाहता है। ये उस बच्ची का आत्मविश्वास है जो पहली बार फोन उठाकर माँ से वीडियो कॉल पर कहती है - ‘बेटा, आज मैंने पढ़ना सीखा।’”
भावना बोली, “पर सर, रॉनी का रिसोर्स पावर बहुत ज्यादा है। हमारे क्लाइंट्स को वो लॉजिक और लॉस दिखा रहा है। भावना से कोई मार्केट नहीं जीतता।”
विक्रम ने सिर हिलाया, “हां, पर आत्मा से लड़ाई जीतना आसान नहीं होता। अब वक्त है कि हम भी एक जवाब दें - डेटा से, डिलीवरी से और डिज़ाइन से।”

क्रमशः 

आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 43 : मक़सद बनाम मुनाफ़ा
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