एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 51 – मानपुर: एक सुबह, एक शुरुआत

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 50 : स्क्रीन से चौपाल तक से पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 51 – मानपुर: एक सुबह, एक शुरुआत

सुबह के सात बजे का समय है। मानपुर की हवा में हल्की-सी ठंडक अब भी बाकी है, मानो रात की आख़िरी सांसें अभी पूरी तरह से खत्म न हुई हों। लेकिन पूरब से झांकता सूरज अपने सुनहरी किरणों  से शहर की छतों, पेड़ों की डालियों और टीन की छपरियों पर रोशनी बिखेरना शुरू कर चुका है। गली-कूचों की दीवारें उस सुनहरी आभा में नहाकर और भी जीवंत लगने लगी हैं।

मानपुर - एक छोटा-सा, लेकिन बेहद अपना-सा शहर है। नदी किनारे बसा यह कस्बा हर सुबह अपने आप में एक खास लय के साथ जागता है। यहां की सुबह में कोई जल्दबाज़ी नहीं, बल्कि एक धीमा-सा अपनापन भरा राग होता है। सबसे पहले सड़क किनारे चाय के ठेले सजते हैं - पीतल/स्टील /एल्युमीनियम  की केतली से उठती भाप, चाय पत्तियों और अदरक की महक हवा में घुल जाती है। वहीं पास के लकड़ी के बेंचों पर बैठे कुछ बुज़ुर्ग अखबार के पन्ने पलटते हुए देश-दुनिया की ख़बरों पर चर्चा शुरू कर देते हैं।

इसी बीच पक्की सड़कों पर स्कूली बच्चों का मेला लगने लगता है - कंधे पर बैग, हाथ में पानी की बोतल और चेहरों पर आधी नींद, आधी हंसी और कभी कभी तकरार भी । गलियों से साइकिलों की घंटियां टन-टन करती निकलती हैं। दूर कहीं किसी आंगन से आती सब्ज़ीवालों की पुकार, “टमाटर ले लो… ताज़ा टमाटर…”, “ताजी सब्जियां ले लो...आलू प्याज़ ले लो....” सुबह की इस लय में अपना एक अलग ही सुर जोड़ देती है।

और इस सबके बीच नदी के पार से आती मंदिर की घंटियों की आवाज़ - धीमी, लंबी गूंज वाली टन-टन-टन मानो पूरे शहर के लिए यह दिन का औपचारिक स्वागत हो। नदी के ऊपर हल्की-सी धुंध अब भी तैर रही है जैसे रात और सुबह के बीच कोई अधूरा संवाद बचा हो जो धीरे-धीरे हवा में घुलकर खत्म हो जाएगा।

रोज़ाना की भांति आज की सुबह की ठंडी हवा में मानपुर की गलियों से हल्की-हल्की चाय की महक वातावरण में तैर रही है । दूर कहीं मंदिर की घंटियों की टन-टन, पास के मोहल्ले में दूधवाले की साइकिल की घंटी और गली के मोड़ पर सब्ज़ीवालों की पुकार, सब मिलकर शहर को नींद से धीरे-धीरे जगा रहे हैं।

मानपुर के पुराने मोहल्ले की एक संकरी गली में, दो मंज़िला मकान के ऊपरी हिस्से में, सावी अपने छोटे-से कमरे में खड़ी आईने के सामने बाल संवार रही है। खिड़की से आती हल्की सुनहरी धूप उसके चेहरे पर पड़ रही है  जिससे उसके चेहरे की एकाग्रता और साफ झलक रही थी। टेबल पर किताबों का एक छोटा-सा पहाड़ लगा हुआ है - एम.ए. पार्ट वन जियोलॉजी के नोट्स, मोटी प्रैक्टिकल फाइलें और किनारे पर रखी एक छोटी-सी स्केचबुक, जिसके पन्नों में सावी की सोच और सपनों की लकीरें दर्ज हैं। उसने स्केचबुक को बैग की आगे वाली पॉकेट में ऐसे रखा जैसे यह उसकी पहचान का एक अहम हिस्सा हो - किताबों जितना ही ज़रूरी।

कमरे के बाहर से माँ शांति की आवाज आई,
“सावी! जल्दी कर बेटा, कॉलेज जाने का समय हो गया है ।”
“हाँ माँ, बस पाँच मिनट!” सावी ने जल्दी-जल्दी बालों में रबर बांधा, बैग कंधे पर डाला और लपककर सीढियां उतरती चली गई। निचले हिस्से में रसोई घर, बैठक और दादी का कमरा है और पहली मंज़िल पर दोनों बच्चों, सावी और बंटी का और उनके माता-पिता का यानि दो कमरे ऊपर बने हैं। सावी बैठक की ओर बढ़ी।
रसोई में माँ गैस पर परांठे सेंक रही हैं  लेकिन हाथों की तेज़ रफ़्तार और चेहरे की हल्की झुंझलाहट साफ बता रही थी कि वो देर से निकलने वाली बेटी पर नाराज़ हैं। 
“सुबह से कह रही हूँ जल्दी कर पर तुझे तो अपने ही टाइम पर चलना है,” उन्होंने करछली से परांठा पलटते हुए कहा।
डाइनिंग टेबल पर पिता रामपाल जी चश्मा लगाए अख़बार में डूबे हैं। पहले पन्ने की मोटी सुर्खियों में किसी बड़े राजनीतिक घोटाले की खबर है । घर की हलचल से बेपरवाह, वो धीरे-धीरे पन्ना पलटते रहे।
तभी रसोई से बंटी की आवाज गूंजी,
“दीदी, आज स्कूल जाने का मन नहीं है… सर प्रोजेक्ट का काम देंगे।”
सावी ने चलते-चलते भौंहें चढ़ाईं,
“और कल का होमवर्क किया? कल भी यही बहाना था।”
बंटी ने होंठ भींचकर बड़बड़ाया,
“आपको क्या, आप तो अपनी पढ़ाई में ही लगी रहती हो।”
फिर कुर्सी खींचकर चुपचाप बैठ गया, जैसे मान गया हो कि आज भी स्कूल जाना ही पड़ेगा।
बरामदे में दादी सुलोचना जी ऊन का गोला लपेट रही हैं। उन्होंने सावी को देखा और हमेशा की तरह वही ताना कस दिया,
“लड़कियों को इतना पढ़ा-लिखा कर क्या करना, आखिर में तो रसोई ही संभालनी है।”
सावी ने हल्की-सी आह भरी, पर जवाब नहीं दिया। वो जानती है कि  दादी के ताने में भी  प्यार छुपा हुआ  है। 
कुछ ही पल बाद, जैसे अपनी ही बात को हल्का करने के लिए, दादी ने आंच से उतारा गरम-गरम परांठा उसके हाथ में देते हुए कहा, “ले, ये खाकर ही जाना।”

जैसे तैसे  सावी ने पराठे के कौर जल्दी-जल्दी निगले। आखिरी कौर मुँह में ही था कि इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई।
बाहर नीला खड़ी थी - सावी की पक्की सहेली, जिसकी आंखों में हमेशा शरारत तैरती रहती है.।
“चल, लेट हो रहा है। आज प्रोफेसर वर्मा का लेक्चर है,” नीला ने मुस्कुराते हुए कहा।
सावी ने बैग कंधे पर लटकाया और दोनों कॉलेज की ओर निकल पड़ीं। गली में फैली सुबह की हल्की ठंडक और सुनहरी धूप उनके साथ चल रही थी।

दोनों लड़कियां कॉलेज की ओर चल पड़ीं। रास्ता लंबा नहीं है  लेकिन उसमें मानपुर की गलियां, पुराने मकानों की पंक्तियां और बीच-बीच में चाय-नाश्ते की दुकानें आती हैं। सावी को इस रास्ते की सबसे प्यारी बात लगती है - वो पुराना पुल, जो नदी के ऊपर से गुजरता है।
जब वे पुल के बीच में पहुंचीं, तो सावी के कदम धीमे हो गए। नीला ने कहा,
"क्या हुआ? फिर वही नदी देखने का मन?"
सावी ने नीचे बहते पानी की ओर देखा। बहाव तेज़ नहीं था लेकिन उसमें एक अजीब-सी गहराई थी। मानपुर की यह नदी मौसम के साथ अपना रूप बदलती है - बरसात में उफान पर, गर्मियों में शांत और पतली धारा जैसी। लेकिन सावी के लिए इसमें कुछ और भी है - एक अनजाना खिंचाव जैसे कोई अदृश्य धागा उसे अपनी ओर बुला रहा हो।
नीला ने हंसते हुए कहा,
"तू तो ऐसे देखती है जैसे पानी तुझे जवाब दे देगा।"
सावी ने मुस्कुराकर कहा,
"पता नहीं क्यों, बस लगता है कि इसमें कई कहानियां छुपी हैं।"
नीला ने कंधे उचका दिए,
"तेरी जियोलॉजी पढ़ाई का असर है, तुझे पत्थर, पानी, सब में कहानी दिखती है।"
सावी ने नज़रें नदी से हटाईं, लेकिन मन वहीं अटका रहा। मानपुर की सुबह में दिल को भाने वाली सी ताजगी है लेकिन सावी के दिल में जैसे कोई अनकहा सवाल अटका हो। सूरज की पहली किरणें नदी पर सुनहरी लकीर खींच रही हैं और वह कॉलेज के रास्ते में जाते जाते फिर से एक पल को ठिठक गई जैसे पानी ने उसे अपने भीतर कुछ ढूँढने बुलाया हो।

पुल के दूसरी ओर कॉलेज का गेट दिखने लगा। कैंपस में दाखिल होते ही, चहचहाहट और हलचल का शोर चारों तरफ है - छात्र अपने ग्रुप में, कुछ कैन्टीन की ओर, कुछ लेक्चर हॉल की तरफ।
लेकिन सावी का मन अब भी पुल और उस बहते पानी में अटका है। उसे खुद नहीं पता है  कि क्यों, लेकिन जब भी वो नदी के पास से गुजरती, दिल में एक अनजानी-सी बेचैनी उठतीमानो कोई कहानी उसके भीतर दस्तक दे रही हो, जिसे वो अभी पहचान नहीं पा रही है। 

क्रमशः 

आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 52:  एलबम के साये

👉 “एक एकड़ से शिखर तक” के सभी भाग यहाँ पढ़ें। 

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट