एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 52: एलबम के साये
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 51 – मानपुर: एक सुबह, एक शुरुआत पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 52: एलबम के साये
मानपुर की उस ठंडी सुबह में, आँगन के बीचों-बीच रखी पुरानी लकड़ी की चौकी पर एलबम का पन्ना खुला पड़ा है। हवा के झोंके से लिफाफा गिर पड़ा, उसमे से एक तस्वीर झांकने लगी जैसे उसमें कैद चेहरा बाहर निकलकर कुछ कहना चाहता हो। उसी पल ऐसा लगा मानो तस्वीर के पीछे कोई अनदेखा साया खड़ा हो। दादी की आँखों में अचानक ऐसा डर चमका, जैसे उन्होंने बरसों से दबा कोई नाम सुन लिया हो और स्कूल जाता बंटी ठिठक गया … वो दूर खड़ा बस होंठ भींचकर आसमान की ओर देखने लगा। दादी ने पलक झपकते ही तस्वीर को अपने लकड़ी के बक्से में कैद कर, बक्से को स्टोर रूम की अलमारी में बंद कर दिया। बंटी आँगन से बाहर की ओर खिसक गया। वो अपने स्कूल की ओर तेजी से चला गया।
क्लास में चर्चा
कॉलेज की चहल-पहल में सुबह का उजाला और भी चमकदार लग रहा है । कैंपस के लॉन में फैले हरे घास पर ओस की बूँदें सूरज की किरणों में मोती-सी चमक रही हैं । सावी और नीला, दोनों हाथों में फाइल और किताबें थामे, सीढ़ियों पर चढ़ते हुए क्लासरूम की ओर बढ़ रही हैं। सावी के चेहरे पर एक हल्की-सी उत्सुकता है। कल प्रोफेसर ने नदियों के बहाव पर स्पेशल लेक्चर का आज के लिए ऐलान किया था और यह वही विषय है जिसमें सावी की रुचि सबसे ज्यादा है।
नीला हंसते हुए बोली,
“देखना, आज फिर तुम इतनी बहस करोगी कि प्रोफेसर को अपना ही लेक्चर रोकना पड़ जाएगा।”
सावी ने मुस्कराकर जवाब दिया,
“जब तक सच और रिसर्च सामने न आए, बहस जारी रहेगी।”
कुछ पलों में दोनों क्लासरूम के भीतर आ पहुँची। दो मिनट बाद ही प्रोफेसर क्लास में आकर पढ़ाने लगे। क्लासरूम में प्रोफेसर शुक्ला ब्लैकबोर्ड पर नक्शा बनाते हुए नदियों की धारा और उनके समय के साथ बदलते रास्तों के बारे में बताने लगे।
“नदी स्थिर नहीं रहती,” उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “वो अपना रास्ता बदलती रहती है। कभी-कभी ये बदलाव विनाशकारी भी हो जाता है।”
उन्होंने नक्शे पर लाल निशान खींचते हुए जोड़ा,
“जैसे मानपुर की बाढ़ - सात साल पहले। उस वक्त की बाढ़ ने पूरा गाँव बहा दिया था। मिट्टी के साथ यादें भी बह गईं। कई लोग... हमेशा के लिए खो गए।”
सावी ने ध्यान से नक्शे की ओर देखा। उसकी पेंसिल कागज पर तेजी से नोट्स उतार रही थी, लेकिन उसकी आंखों में हल्का-सा सवाल भी तैरने लगा।
उसने हाथ उठाया,
“सर, क्या उस बाढ़ के बारे में कोई विस्तृत रिसर्च मौजूद है? मेरा मतलब, केवल भौगोलिक डेटा नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों के अनुभव, उनकी कहानियां...?”
प्रोफेसर ने कुछ पल रुककर उसकी ओर देखा,
“कुछ बातें दर्ज नहीं होतीं, सावी। वो बस... उन लोगों के दिलों में रह जाती हैं, जिन्होंने उन्हें जिया है।”
ये कहकर उन्होंने विषय बदल दिया लेकिन सावी के मन में सवाल रह गया - आखिर क्यों?
इतने में ही पीरियड ओवर हो गया।
घर की चुप्पी
शाम को कॉलेज से लौटते वक्त सावी के कदम कुछ धीमे पड़ रहे हैं। घर का बरामदा सुनसान प्रतीत हो रहा है। माँ, पापा और बंटी किसी काम से बाज़ार गए हैं। दादी आंगन में एक पुराने लकड़ी के बक्से में से कुछ कपड़े निकाल रही हैं। उनकी झुर्रियों भरी आंखों में एक गहरी थकान है पर उनके हाथ तेज़ी से चल रहे हैं।
सावी ने पानी का गिलास उन्हें देते हुए पूछा , “दादी, आप ये बक्सा क्यों खोल रही हैं? लाइए मैं निकाल दूँ। ”
दादी ने नज़र उठाई और फिर बक्से के एक कोने में रखा एक पुराना फोटो एलबम जल्दी से कपड़ों की तह में खिसका दिया।
“कुछ नहीं सावी वो ही अपने पुराने कपडे देख रही हूँ। "
"दादी वो एलबम मुझे भी दिखाइए ना।" दादी के गले में लाड़ से बाहें डाल सावी बोली
"तुमसे मतलब नहीं। ये पुरानी बातें हैं, इनसे दूर रहो।” दादी ने झिडकते हुए कहा
उनका स्वर कठोर था पर आंखों में एक हल्की-सी घबराहट झलक रही है।
सावी अपना सा मुँह लेकर रह गई।
सावी चुप रह गई, लेकिन उसका मन वहीं अटक गया - आखिर इस एलबम में ऐसा क्या है, जिसे देखने से दादी रोक रही हैं?
इधर दादी ने बक्सा स्टोर रूम की अलमारी में रख दिया और स्टोररूम की कुण्डी लगा दी।
कुछ देर में ही माँ, पापा और बंटी बाज़ार से गरमागरम समोसे और पकोड़े लेकर आए। सावी ने झटपट चाय बनाई और पूरा परिवार साथ बैठकर हलकी फुकी बातें करता हुआ समोसे और पकौड़ों का तीखी खट्टी-मीठी चटनी के साथ लुत्फ़ उठाने लगे।
इसके तुरंत बाद ही माँ रात का खाना बनाने में जुट गई। सावी और बंटी ऊपरी मंज़िल पर स्थित अपने रूम में पढाई करने चले गए। नौ बजे के करीब माँ ने खाना खाने के लिए बुलाया। बंटी और सावी ने खाना डाइनिंग टेबल पर लगाया और खाना खाकर सभी अपने-अपने कमरों में चले गए।
बंटी और सावी का रूम एक ही है दोनों अपने रूम में पहुंचे। बंटी और सावी के लिए एक-एक सिंगल बेड और एक-एक स्टडी टेबल और कुर्सी है। दोनों के लिए एक-एक अलमारी कपडे रखने के लिए है और एक साझा अलमारी है जिसके ऊपरी खंड में सावी की किताबें और निचले भाग में बंटी का स्टडी मटेरियल रखा है।
"ठीक है पर सुबह जल्दी उठा दूँगी तुझे , अब से मन लगाकर पढ़ाई शुरु कर देना। अर्धवार्षिक परीक्षाएं आने वाली हैं, तैयारी होगी तो उस वक़्त बस रिवाइज़ करना रहेगा। "
"हाँ दीदी। याद से सुबह जल्दी उठा देना। "
और फिर तो बंटी ये जा वो जा....बिस्तर पर लेटते ही पांच मिनट में सो गया।
इधर नींद सावी की आंखों से कोसों दूर थी। बरामदे में स्टोर रूम रखा वो फोटो एलबम उसे जैसे बुला रहा था।
धीरे-धीरे कदम दबा-दबाकर रखती हुई वो आँगन में आ पहुंची। स्टोर रूम की कुण्डी आहिस्ता से खिसकाई। लाइट का स्विच दबाते ही बल्ब की हल्की पीली रोशनी में दादी का बक्सा खुली अलमारी के दुसरे खंड में रखा दिखाई दिया। पलक झपकते ही सावी ने बक्से को उतारा और बिना आवाज़ किए ज़मीन पर रखा। बक्से को खोला और उसमें से वो पुरानी एल्बम निकाली। एलबम के पुराने से कवर पर उंगलियां फिराते ही उसके भीतर एक अजीब-सी सनसनी दौड़ गई।
एलबम के पन्ने पलटते हुए उसने पुराने श्वेत-श्याम फोटो देखे - दादी की जवानी के फोटो, दादी-बाबा की शादी के फोटो, दादी-बाबा की गोद में पापा, खेतों में काम करते लोग, नदी किनारे के मेले...
और फिर -
एलबम का पन्ना जैसे ही पलटा, कमरे में एक साया-सा उतर आया। पन्ने पलटते हुए एक लिफाफे पर उसकी उंगलियां थम गईं। तस्वीरें अब सिर्फ यादें नहीं रहीं - वे रहस्यों की खिड़कियाँ बन गई। और सावी की नज़र एक ऐसी तस्वीर पर अटक गई, जिसने उसकी सांसें थाम दीं।
क्रमशः
👉 “एक एकड़ से शिखर तक” के सभी भाग यहाँ पढ़ें।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
रचना से जुड़े अपने विचार, प्रतिक्रिया या सुझाव नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें। ❤️