एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 53: सवालों की गूंज
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 52: एलबम के साये पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 53: सवालों की गूंज
मानपुर की उस रात घर की हर ईंट जैसे चुप है। बाहर अँधेरे में किसी पेड़ की डाल हिलने पर खड़खड़ाहट सुनाई दे रही है मगर आँगन के भीतर एक और ही सन्नाटा पसरा हुआ है । स्टोर रूम में सावी की उँगलियाँ उस पुरानी एलबम पर टिक गईं। जैसे ही उसने एक और पन्ना पलटा, कमरे की हवा भारी हो गई। बल्ब की पीली रोशनी अचानक धुंधली लगने लगी। एलबम का पन्ना फड़फड़ाया और मानो उसके साथ ही कोई अनदेखा साया भी कमरे में उतर आया।
पन्नों के बीच दबे एक सफ़ेद लिफाफे पर उसकी उँगलियाँ ठहर गईं। हल्का-सा काँपते हाथों से उसने उसे बाहर निकाला। उस पल उसे लगा, तस्वीरें अब सिर्फ बीते लम्हों की यादें नहीं रह गईं बल्कि वे रहस्यों की खिड़कियां बन गई हैं। और ठीक तभी उसकी नज़र एक ऐसी तस्वीर पर अटक गई जिसने उसकी सांसें मानो थाम कर रोक दी।
धुंधली तस्वीर, गहरी सिहरन
सावी का दिल बेकाबू-सा धड़कने लगा। उसने तस्वीर को धीरे-धीरे लिफाफे से खींचकर बाहर निकाला। बारिश की सीलन से फोटो के कोनों पर फफूंदी जम चुकी थी, पर तस्वीर का असर वैसा ही था - तेज, चुभता हुआ।
धुंधली रोशनी में करीब बारह-तेरह साल की एक लड़की नदी किनारे अचेत पड़ी थी। उसके भीगे कपड़े देह से चिपके थे, बाल कीचड़ से लथपथ, चेहरा पीला पड़ा हुआ और आँखें कसकर बंद। पूरा दृश्य ऐसा लग रहा था, जैसे किसी ने उस भयानक पल को समय में स्थिर कर दिया हो और अब वह उसके सामने फिर से जीवित हो उठा हो।
तस्वीर देखते ही सावी के कानों में पानी की उफनती लहरों की आवाज़ गूँजने लगी। उसने पलकें झपकाईं, पर आवाज़ रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उसे लगा जैसे ये तस्वीर नहीं, नदी का कोई टुकड़ा है जो उस लिफाफे में बंद पड़ा था और अब खुलकर पूरे कमरे में फैल गया है।
तस्वीर पलटने पर पीछे धुंधली स्याही में कुछ शब्द लिखे थे -
“मानपुर, 20 अगस्त”।
सावी की आँखें चौड़ी हो गईं। यही तो वही साल और वही तारीख थी जिसका जिक्र उसके प्रोफेसर ने उस सुबह क्लास में किया था - सात साल पहले मानपुर की बाढ़, जिसने न जाने कितनी जिंदगियां निगल ली थीं।
उसकी रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई।
अचानक उसके पीछे से एक सख्त आवाज़ गूँजी,
“सावी!”
सावी चौंक पड़ी। तस्वीर उसके हाथ से लगभग छूट ही गई थी। उसने पलटकर देखा तो पाया कि दादी दरवाज़े पर खड़ी हैं। उनकी आँखों में गुस्से से ज्यादा डर झलक रहा है।
वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ीं और झपटकर एलबम उसके हाथ से छीन लिया।
“कितनी बार कहा है तुमसे - इन चीज़ों से दूर रहो। ये सब पुरानी बातें हैं, इन्हें मत कुरेदो।”
सावी ने हिम्मत करके कहा,
“लेकिन दादी, ये लड़की कौन है? मानपुर की बाढ़ में...”
“बस!” दादी की आवाज़ काँप गई।
“सवाल मत पूछो। तुम नहीं समझोगी।”
उन्होंने एलबम को जल्दी से बक्से में रखा और ज़ोर से ढक्कन बंद कर दिया। फिर बक्से को उठाकर स्टोररूम की अलमारी में ऐसे धकेला जैसे किसी ज़हरीले साँप को कैद कर रही हों।
बक्सा बंद करते ही उन्होंने साँस छोड़ मानो एक बोझ उतरा हो लेकिन उनकी आँखों में अब भी वही छिपा हुआ डर पसरा हुआ था । बिना और कुछ कहे वे अपने कमरे की ओर बढ़ गईं।
सावी वहीं ठिठकी रह गई अपने दिल में हज़ारों सवाल लिए।
कुछ देर बाद अपने को संयत कर वो अपने कमरे में लौटी। बंटी गहरी नींद में सो रहा था, उसका मासूम चेहरा तकिए में दबा हुआ मगर सावी की आँखों से नींद कोसों दूर हो चुकी है ।
उसके कानों में अब भी वही गड़गड़ाती लहरों की आवाज़ गूँज रही है । तस्वीर में पड़ी लड़की कौन थी? क्यों उसी तारीख का जिक्र प्रोफेसर ने किया था? और दादी उसे देखने से क्यों रोक रही थीं? बाढ़ से इस तस्वीर का कोई ताल्लुक है क्या? वो तारीख मन में क्यों चुभ रही है?
उसे लगा जैसे उसके कमरे की दीवारों पर भी उस तस्वीर का साया फैल गया हो। फिर ऐसे ही सोचते-विचारते वो कब नींद की अथाह गहराइयों में डूबती चली गई उसे पता ही ना चला।
अगली सुबह घर में सामान्य दिनचर्या शुरू हुई। माँ रसोई में पराठे सेंक रही है पापा अख़बार पढ़ रहे हैं और दादी बरामदे में तुलसी को पानी दे रही हैं । सब कुछ सामान्य दिख रहा है पर सावी के भीतर उथल-पुथल मची हुई है।
नाश्ते की मेज पर उसने हिम्मत जुटाई।
“माँ, क्या आपको मानपुर की बाढ़ याद है? दादी के बक्से में जो फोटो है उस फोटो में जो लड़की....”
माँ ने तुरंत उसकी बात काट दी। उन्होंने चाय का प्याला मेज पर रखते हुए सहज स्वर में कहा, “तुम्हारे कॉलेज का काम कैसा चल रहा है? कोई नया प्रोजेक्ट शुरू किया?”
सवाल ऐसे मोड़ा गया जैसे वो कभी पूछा ही न गया हो।
सावी कुछ पल के लिए चुप रह गई लेकिन उसके चेहरे पर सवालों की छाया साफ़ दिख रही है।
पापा ने अख़बार से नज़र हटाए बिना कहा,
“तुम्हें अपने रिसर्च के लिए अगले महीने फील्ड विज़िट करनी चाहिए। वहाँ जाकर डेटा इकट्ठा करोगी तो तुम्हारा काम और मजबूत होगा।”
बात फिर से कॉलेज और रिसर्च पर आकर टिक गई।
सावी का ध्यान अब बंटी की ओर गया। वो पराठा खा रहा था लेकिन उसकी हरकतों में कुछ अलग सा है । जैसे ही उसने पानी का गिलास उठाया उसका हाथ हल्का-सा काँप गया।
सावी ने गौर किया कि बंटी उसकी ओर देखने से बच रहा है। उसकी नज़रें या तो थाली में गड़ी हुई हैं या दीवार पर जबरन देखने का दिखावा कर रहा है।
उसकी आँखों में एक अजीब-सा बोझ झलक रहा है।
सावी का दिल और तेजी से धड़कने लगा। क्या बंटी उस लड़की को पहचानता है? अगर हाँ, तो वो क्यों चुप है? और सबसे बड़ा सवाल कि पूरा परिवार इस तस्वीर और इस तारीख से इतना क्यों डर रहा है?
सवालों का जाल
दिन भर कॉलेज में क्लासेस चलती रही मगर सावी का ध्यान बार-बार उस तस्वीर पर अटक जाता। नदियों, बहाव और मिट्टी पर रिसर्च करने वाली वह लड़की अब अपने ही घर के बहाव में फँस गई है - रहस्यों के बहाव में।
उसे महसूस हुआकि ये तस्वीर सिर्फ एक अजनबी की नहीं, बल्कि उसके अपने अतीत का हिस्सा है। ऐसा हिस्सा जिसे जानबूझकर उससे छुपाया जा रहा है।
उसके कदम चाहे जहाँ भी जाएँ, उसके मन में वही सवाल गूँज रहे हैं -
▪️वो लड़की कौन थी?
▪️क्यों उसका फोटो एलबम में छिपाकर रखा गया था?
▪️और दादी की आँखों में इतना डर क्यों है?
शाम को जब वो वापस लौटी तब बंटी आँगन में बैठा पेंसिल से कुछ ड्रॉ कर रहा था। उसने कागज़ को जल्दी से पलट दिया जैसे कुछ छुपा रहा हो।
सावी ने धीमे स्वर में पूछा,
“बंटी… तुम जानते हो न, उस फोटो में जो लड़की है वो कौन है ?”
बंटी का चेहरा पीला पड़ गया। उसने होंठ भींच लिए और नज़रें झुका लीं।
एक लम्हें के लिए लगा जैसे वो कुछ कहने ही वाला है लेकिन अगले ही पल वो उठकर भागता हुआ बाहर निकल गया।
सावी वहीं खड़ी रह गई। अब उसके भीतर सवालों का जाल और भी कस गया था।
उसने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो हो, वो इस राज़ को जानकर रहेगी क्योंकि अब ये सिर्फ एक फोटो की बात नहीं रही है । ये उसके अपने परिवार, अपने शहर और शायद उसकी अपनी कहानी का हिस्सा है।
क्रमशः
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