एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 54: नदी किनारे का रहस्य
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 53: सवालों की गूंज पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 54: नदी किनारे का रहस्य
अगली सुबह नीला के आते ही सावी चुपचाप ही कॉलेज के लिए निकल गई। बंटी भी स्कूल जा चुका है। सोलह वर्षीय बंटी ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता है परन्तु घर में छोटा होने के कारण घर उसकी चुहलबाज़ी से गुलज़ार रहता है।आँगन में बंटी की खिलखिलाहट के थमते ही घर पर एक अजीब-सी ख़ामोशी उतर आई। रामपाल जी अपने ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे हैं। शांति ने रामपाल का टिफ़िन दिया और नाश्ता करने के बाद चाय का आखिरी घूंट पीकर वो भी ऑफिस के लिए रवाना हो गए। घर में रह गए दो जने - सावी की माँ, शांति और उसकी दादी, सुलोचना जी। दादी और माँ का भी नाश्ता पानी हो गया तो दादी आराम करने के लिए अपने कमरे में चली गई। माँ घर के बचे-खुचे काम निबटने लगी।
दादी अपने कमरे में अकेली बैठी हुई हैं। खिड़की से आती हल्की धूप उनके चेहरे पर ठहर गई है । उनके पास रखी पुरानी एलबम मानो खुद ही खुलने को बेचैन है । दादी ने काँपते हाथों से उसे छुआ और पल भर में उनका मन अतीत की गलियों में भटकने लगा। उनके सामने तस्वीरें नहीं, पूरे किस्से जीवित हो उठे - आवाज़ें, चेहरे, अधूरी बातें। पलक झपकते ही दादी ने तस्वीर को उठाया और लकड़ी के बक्से में कैद कर दिया। उस बक्से को उन्होंने स्टोर रूम की अंधेरी अलमारी में रख दिया। लेकिन उस धुंधली तस्वीर की लहरें मानो हवा में घुल गई हैं और हर साँस के साथ गाढ़ी होती जा रही हैं। लकड़ी की अलमारी के अंधेरे में बक्सा छिप गया पर यादों का दरवाज़ा खुल चुका है।
स्टोर रूम से वापस अपने कमरे में आ पहुँची दादी की आँखें कुछ पल बंद हुईं और मन सात साल पीछे लौट गया - उस बरसात की रात, जब नदी अपने पूरे उफान पर थी और गाँव का हर घर चिंता और दहशत में डूबा था।
मानपुर की मिट्टी हमेशा से बारिश को जल्दी सोख लेती थी, लेकिन उस साल का सावन अलग था। नदी में उफान था। हर गली, हर चौपाल पर बस एक ही चर्चा थी, “नदी का पानी बढ़ रहा है, शायद पुल भी डूब जाए। बाढ़ का खतरा बना हुआ है।”
नौ साल का बंटी अपने दोस्तों के साथ खेत के किनारे पतंग उड़ा रहा था। आकाश में रंग-बिरंगी डोरियाँ लहर रही थीं और हवा में बच्चों की किलकारियाँ घुली थीं। हवा इतनी तेज़ थी कि डोर संभालना मुश्किल हो रहा था। अचानक एक झोंका आया और पतंग फड़फड़ाती हुई नदी की तरफ खिंच गई। इस के साथ ही बंटी की पतंग अचानक टूटकर दूर नदी की तरफ़ बह गई। भागते-भागते वह किनारे तक पहुँचा।
नदी का जल सूरज की किरणों से चमक रहा था।
“भागो! पकड़ लो!”, बंटी चिल्लाया और दौड़ते-दौड़ते नदी के किनारे के समीप पहुँच गया।
किनारे की भीगी मिट्टी पर फिसलते हुए उसने डोर को पकड़ने की कोशिश की। तभी उसकी नज़र कुछ अजीब सी चीज पर पड़ी। मिट्टी और पानी से सना एक छोटा-सा शरीर वहाँ लेटा हुआ था। करीब बारह-चौदह साल की एक लड़की। कपड़े भीगे हुए, बालों में कीचड़, चेहरा पीला और आँखें बंद।
बंटी का गला सूख गया। उसके हाथ से बची-खुची डोर भी छूट गई और वह चीख पड़ा। बाकी बच्चे भी वहाँ आ गए। किसी ने डर से रोना शुरू कर दिया, किसी ने हिम्मत करके चिल्लाया, “रामपाल काका को बुलाओ!”
रामपाल खेत से लौट रहे थे जब बच्चों ने हाँफते हुए आकर बताया। वे तुरंत दौड़े और नदी किनारे पहुँचे। सामने नज़ारा देख उनका चेहरा सख्त हो गया।
“हे भगवान! ये कौन है?” उन्होंने झुककर लड़की की नब्ज़ टटोली। धड़कन धीमी थी लेकिन लड़की ज़िंदा थी।
रामपाल ने बिना देर किए लड़की को अपनी बाहों में उठाया और गाँव की ओर भागे। लोग इकट्ठा होने लगे। हर कोई अचरज में था - “कहाँ से आई? किसकी बेटी है?”
शाम तक गाँव का चौपाल गूंजने लगा। कुछ बोले - “शायद किसी बाढ़ में डूबे घर की लड़की है।”
कुछ ने शक जताया - “ऐसी हालत में… कहीं गुनाह का मामला न हो।”
रामपाल ने अगले दिन पुलिस चौकी जाकर सूचना दी। पर वहाँ से साफ जवाब मिला - “ऐसी किसी बच्ची की गुमशुदगी की शिकायत दर्ज नहीं है।”
थानेदार ने कंधे उचकाकर कहा - “आप चाहें तो कानूनी प्रक्रिया से इसे गोद ले सकते हैं। वरना बाल संरक्षण गृह भेज देंगे।”
रामपाल की आँखें भीग गईं। उनकी अपनी बेटी बबली दो बरस पहले तेज बुखार में चल बसी थी। एक बेटे के अलावा घर सूना लगता था। वे सोच में डूबे रहे और अंततः निर्णय लिया - “ये बच्ची मेरी बच्ची होगी, मैं पालूंगा इसे। इसका नाम रखूँगा - सावी। सावन में मिली है, तो यही नाम ठीक रहेगा।”
सावी को होश आने में कई दिन लगे। जब उसने आँखें खोलीं, तो चारों ओर अजनबी चेहरे थे। दादी ने सिर पर हाथ रखा और पूछा, “बेटी, तेरा नाम क्या है?”
सावी ने बहुत सोचा, होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उसका दिमाग खाली था। अतीत के सारे पन्ने जैसे बाढ़ में बह गए हों।
धीरे-धीरे वह रामपाल के घर में घुलने लगी। दादी उसे पूजा करवाती, बंटी उसके साथ खेलता। पर एक साया हमेशा उसके चेहरे पर रहता - अपनी पहचान ना जानने का दर्द। ऐसे में माँ की गोद में वो छिप जाती , माँ यानी रामपाल जी की पत्नी शांति उसे बहुत लाड़ दुलार से पालने लगीं उन्हें लगता था कि सावी के रूप में उन्हें अपनी मृत बेटी बबली वापिस मिल गई है।
सावी को कभी-कभी रात में सपने आते। आधे-अधूरे से किसी घर की झलक, लाल रंग की कोई चीज़, कोई धागा अपनी ओर खींचता, खेत का, एक चित्र फूलों का , एक धुंधला अक्स किसी लड़के का, एक नदी का और फिर पानी का शोर...पर सुबह उठते ही सब गायब।
वर्तमान में
सात वर्षों बाद, जब सावी बड़ी हो चुकी है करीब उन्नीस-बीस साल की... सही उम्र तो रामपाल जी को पता नहीं थी । उन्होंने सावी जब मिली थी अंदाज़ा लगाकर उसकी उम्र 13 साल स्कूल में लिखवाकर उसका एडमिशन नवीं कक्षा में करवा दिया था । आश्चर्यजनक रूप से सावी को पढ़ाई में कोई परेशानी नहीं आई , उसे सबकुछ समझ में आता गया मानो वो पहले से पढ़ती चली आ रही हों। ऐसा लगा सावी शायद आठवीं या सातवीं में ही पढ़ती होगी पहले परंतु ये सभी अनुमान ही तो था।
हाँ, बस याद नहीं आया तो सावी को तो वो था अपना नाम, अपने परिवार के बारे में कि वो कहां की रहने वाली है...सावी परेशान हो जाती जब उससे यह सब शुरुआत में पूछा जाता। फिर डाॅक्टर साहब के कहने पर कि इससे बच्ची को तकलीफ़ होगी। घर के लोगों ने उससे पूछना छोड़ दिया और धीरे धीरे सावी उन लोगों को ही अपना माता-पिता समझने लगी। उसके मस्तिष्क से पुरानी स्मृतियां विलुप्त हो चुकी थीं।
आज सावी को कुछ भी याद नहीं है और वह इस घर को ही अपना माता-पिता परिवार जानती है और एक सामान्य लड़की की माफिक अपने माता-पिता, दादी और छोटे भाई के साथ रहती है।
तभी दादी की तंद्रा टूट गई, शांति उन्हें दोपहर के भोजन के लिए बुला रही हैं।
क्रमशः
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