एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) –भाग 55: अनकही कहानियाँ
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 54: नदी किनारे का रहस्य पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 55: अनकही कहानियाँ
कल सावी को संयोग से वही पुराना एलबम हाथ लगा जिसकी तस्वीरें पलटते-पलटते अचानक वह धुंधली फोटो सामने आई जिसमें एक लड़की नदी किनारे पड़ी थी। उसका चेहरा उस तस्वीर में कैद था।
दिन भर सावी का दिमाग पढ़ाई में और दिल उस अचेत लड़की की तस्वीर के बारे में सोचता रहा। फोटो के पीछे धुंधले अक्षरों में लिखा था - “मानपुर, 20 अगस्त। यह तारीख भी दिलोंदिमाग में हलचल मचाती रही।
तारीख पढ़ते ही उसके कानों में गूंज उठा प्रोफेसर का कल का व्याख्यान - “सालों पहले मानपुर में आई भीषण बाढ़…” उस वक़्त की ये कैसी तस्वीर दादी के बक्से में है ? यह सभी प्रश्न मस्तिष्क में उमड़ते घुमड़ते रहे।
नीला ने उसका अनमनापन देखकर पूछा." सावी क्या बात है आज कहाँ खोई हुई है ?"
सावी ने मुस्कुराकर कहा ," कल रात नींद कम आई थी तो थोड़ा सिर में दर्द है और कोई खास बात नहीं है। "
नीला ने कहा," चल चाय पिलाती हूँ , ननका काका की कड़क चाय से अच्छे-अच्छे सिरदर्द भाग खड़े होते हैं। "
दोनों सहेलियां क्लास के बाद चाय पीने कॉलेज कैंटीन में चली गई। चाय पीने के बाद नीला चली गई उसे अपनी बड़ी बहन के घर जाना था..... उसके भांजे का जन्मदिन है तो वो कॉलेज से सीधे वहां चली गई।
शाम को कॉलेज से अकेले लौटते हुए सावी इत्तफाक से उसी जगह पहुँची जहाँ से उसे कभी पाया गया था। बारिश के बाद की मिट्टी की गंध हवा में घुली हुई थी। नदी शांत लग रही है पर उसकी सतह पर अजीब-सी बेचैनी झलक रही है।
वह किनारे पर खड़ी रही। आँखें मूँदकर सांस ली और अचानक एक झलक सामने आ गई - वही दृश्य, वही बाढ़ की रात। बहाव में बहती लकड़ियाँ, चीखते लोग, और बीच में वह खुद… पानी में डूबी हुई।
सावी ने चीखकर आँखें खोलीं। पसीना उसकी गर्दन तक भिगो गया था। पर इस बार झलक सिर्फ सपना नहीं थी। शायद यह उसकी याद का टुकड़ा है जो लौट आया था।
सावी वहीं किनारे पर बैठ गई। उसका दिल कह रहा था, “मैं सावी हूँ या मैं ही वो लड़की हूँ… मैं कौन हूँ? ये चेहरा, ये तस्वीर, ये नदी का पानी मुझे क्यों परशान कर रहा है … सच क्या है?”
दूर से दादी आती दिखीं। उनकी आँखों में वही डर चमक रहा है जो उनके दिलोंदिमाग में एलबम देखते हुए था।
सावी ने दादी से एक ही बात बोली," दादी मैं कौन हूँ ? वो लड़की कौन है? क्या मैं आपकी पोती नहीं हूँ ? दादी, ये नदी के पानी का शोर मुझे क्यों परेशान करता है?"
दादी ने सावी को सीने से लगा लिया। इसके बाद उन्होंने धीरे से कहा — “सावी, तू हमारी बच्ची है और इसके आलावा तुम्हें कुछ जानने की ज़रूरत नहीं है। तू ज्यादा मत सोच। वैसे भी कुछ बातें वक्त से पहले जानना ठीक नहीं।”
"चल बेटी अब घर चलें।"
मानपुर के पुराने मोहल्ले की उस संकरी गली में वो दो मंज़िला मकान बाहर से देखने पर मकान साधारण लगता। छिली हुई चूने की दीवारें, जंग खाया लोहे का फाटक और ऊपर की मंज़िल की खिड़की पर आधी टूटी हुई झरोखा-जाली मानो इस घर के लोगों को बुरी नज़र से बचाने का टोटका है पर उसके आँगन में खड़ा पीपल का पेड़ जैसे उस घर की आत्मा है। उसकी गहरी जड़ें ज़मीन को चीरकर चारों ओर फैल चुकी हैं और उसकी शाखों पर बैठे पक्षियों का शोर उस घर के सन्नाटे को ढकने की कोशिश करता।
गली से गुजरने वाले अक्सर ठिठककर उस पेड़ को देखते जैसे वह पेड़ अनगिनत रहस्यों और अधूरी कहानियों का साक्षी रहा हो। आँगन की मिट्टी में उसकी छाँव फैली रहती और ऐसा लगता है जैसे किसी ने वहां हँसी, आँसू और गुप्त राज़ एक साथ गाड़ दिए हों।
घर का दरवाज़ा चरमराकर खुलता तो भीतर से एक ठंडी हवा का झोंका चेहरे से टकराता। दीवारों की दरारों में जैसे बीते वक्त की परछाइयां अब भी सांस लेती हैं ।
नदी से दादी के साथ घर लौटती सावी ने ठान लिया है । अब वह हर हाल में ये गुत्थी सुलझाएगी। चाहे उसे किसी तस्वीर के साये में उतरना पड़े या बाढ़ की उस रात की छाया में लौटना पड़े। तभी उसके दिमाग में एक नाम क्लिक किया और वो जान गई कि उसकी मंज़िल कौन है- बंटी ही है वो जो जानता है बहुत कुछ, अब बंटी से ही पूछूंगी मैं ! ऐसा सोचकर वो भी दादी के साथ अंदर चलती चली गई.....अंदर प्रवेश करते ही दादी हाथ पैर धोकर संध्या पूजा के लिए रुई की बाती को बंटने लगी। सावी भी फ्रेश होकर कपड़े बदलकर दूसरी मंज़िल से नीचे आँगन में आई।
आँगन में पीपल का पेड़ इस वक़्त कुछ खामोश खड़ा है। हवा बंद है इस वजह से पेड़ की पत्तियां हिल भी नहीं रही हैं। सूरज देवता भी अपने घर जाने के लिए अग्रसर हो चले हैं। सूर्यास्त की लालिमा छाई हुई है। आँगन में रखी पुरानी चौकी पर आज बंटी बैठा हुआ है । वही चौकी, जिस पर कभी पतंगों का रंगीन आसमान सजता था। उसकी नज़रें मिट्टी पर है जहाँ वह लकड़ी की डंडी से लकीरें खींच रहा है।
सावी ने अपनी कॉपी और कलम मेज़ पर रखी और अचानक एक सवाल उछाल दिया -
“बंटी… वो लड़की कौन थी… जिसकी तस्वीर दादी इतना छुपा रही हैं?”
बंटी के हाथ ठिठक गए। मिट्टी की रेखा अधूरी रह गई। उसके चेहरे पर हल्की घबराहट तैर गई। उसने सिर उठाया लेकिन सीधे सावी की आँखों में देखने से बचा।
“वो तो बहुत पहले…”, उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई और वहीं रुक गई।
सावी को लगा जैसे हवा का बहाव भी थम गया हो। उसके भीतर एक अनकहा सवाल और गहराई तक उतर गया। लेकिन बंटी अब तक चुप्पी ओढ़ चुका था।
"दादी बुला रही हैं।" कहता हुआ वो दादी के पास चला गया
रात को जब माँ रसोई में रोटी बेल रही थीं, सावी ने धीरे से वही बात छेड़ दी।
“माँ… वो लड़की कौन थी, जिसकी तस्वीर दादी छुपा रही थीं?”
माँ का हाथ बेलन पर थम गया। उनकी आँखों में अचानक नमी तैर आई। कुछ क्षणों के लिए लगा जैसे पुराना कोई दर्द फिर जाग उठा हो।
“सावी…” माँ की आवाज़ थोड़ी काँपी, “ये सवाल दोबारा मत करना।”
उसके बाद उन्होंने पलकें झुका लीं और रोटी सीधी तवे पर डाल दीं। उनकी आवाज़ सख़्त थी पर भीतर छुपा दर्द सावी साफ़ पढ़ पा रही है।
वो और कुछ पूछना चाहती थी लेकिन घर का माहौल ऐसा हो गया कि हर सवाल उसके गले में अटक गया। दीवारों पर फैला सन्नाटा और गहरा हो गया।
क्रमशः
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