एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 57 : सवालों और परतों के बीच
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 56 : सवालों से घिरी सावी पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 57: सवालों और परतों के बीच
सावी की बेचैनी
बूढ़े लाइब्रेरियन के उस एक वाक्य ने सावी के भीतर जैसे घंटियाँ बजा दीं। वह वाक्य उसके कानों से सीधे दिल तक उतर गया।
बूढ़े लाइब्रेरियन जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया और रिकॉर्ड फाइल में कुछ एंट्री करने लगा।
सावी की आंतरिक बेचैनी मानो चरम पर पहुँच गई उस पल ...
उसने सावधानी से नक्शे खोले। कागज़ की तहों से मिट्टी और नमी की गंध निकली। हर रेखा, हर चिन्ह, हर मोड़ जैसे उससे कुछ कहना चाहता है।
उसकी आँखों के सामने बार-बार वही तस्वीर कौंध रही है - वही लड़की, जिसकी पहचान सब टाल रहे हैं । और अब ये बाढ़ का ज़िक्र… उसकी आँखें नक्शे पर टिक गईं लेकिन मन कहीं और भटक रहा है । बार-बार वही धुंधली तस्वीर उसके सामने कौंध जाती - वही लड़की, जिसे दादी ने छिपा लिया था और जिसके बारे में बंटी ने अधूरी बात कहकर चुप्पी साध ली थी।
अब जब बूढ़े ने “कहानियाँ बह गई थीं” कहा, सावी को लगा जैसे उस लड़की और इस बाढ़ के बीच कोई गहरा, अदृश्य संबंध है।
उसने मन ही मन सवाल किया -
▫️क्या उस लड़की और नदी के बीच कोई अदृश्य धागा है ?
▫️क्या यह संयोग है कि मेरे प्रोजेक्ट और मेरे घर का रहस्य दोनों एक ही नदी से जुड़े हैं?
▫️क्या यह वही नदी है, जो न सिर्फ़ ज़मीन के नक्शे बदलती है, बल्कि इंसानी रिश्तों के नक्शे भी मिटा देती है?
सावी की उँगलियाँ नक्शे पर ठहरी रहीं, मानो वे रेखाओं को नहीं, अपनी ही उलझनों को टटोल रही हों।
बाहर खिड़की से टप-टप पानी की आवाज़ आई। अचानक बारिश शुरू हो चुकी थी। बूंदों की टपकन कमरे में गूँज रही है। सावी को लगा जैसे ये बूंदें केवल पानी नहीं, बल्कि अतीत की आवाज़ें हैं जिन्हें कोई सुनना नहीं चाहता।
उसने नक्शे को और करीब खींच लिया।
“ये रेखाएँ… ये मोड़… ये सब तो बस नदी का रास्ता नहीं है जैसे किसी की अधूरी दास्तान हो,” उसने खुद से बुदबुदाया।
बूढ़ा रिकॉर्ड कीपर उसे ध्यान से देख रहा है । उसकी आँखों में जैसे अनकही समझ है लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।
नीला का भूविज्ञान प्रोजेक्ट
नीला ने अपने भूविज्ञान प्रोजेक्ट के लिए “नदी घाटियों में अवसादों (sediments) के जमाव और उनकी परतों का अध्ययन” विषय चुना है।
वह हमेशा से पानी की कहानियों में डूब जाती है। उसके लिए नदी सिर्फ बहता हुआ पानी नहीं है बल्कि समय की एक चुपचाप चलती हुई किताब है जो हर मोड़ पर अपनी यादें, अपनी परतें छोड़ जाती है । उसे हमेशा पानी और धरती के मेल-जोल की कहानियों में दिलचस्पी रही है कि कैसे एक नदी धीरे-धीरे मिट्टी, रेत और छोटे-छोटे कणों को अपने साथ बहाकर ले जाती है और सदियों में परत दर परत इतिहास लिख देती है।
जब वह पुस्तकालय में दाखिल हुई तो उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी और दुनिया में प्रवेश कर रही हो। पुराने लकड़ी के रैक पर सजी मोटी-मोटी किताबें उसके सामने मानो इंतज़ार कर रही हैं। हल्की-सी धूल और पन्नों की गंध ने उसके मन को और भी बेचैन कर दिया। उसने धीरे-धीरे उन अलमारियों को टटोला और उसकी आँखें वहीं टिक गईं, जहाँ भूविज्ञान की किताबें करीने से रखी थीं। उसकी आँखें चमक उठीं। नीला सीधा उस हिस्से की ओर बढ़ी जहाँ “Sedimentology”, “Geomorphology of Indian Rivers” और “Principles of Stratigraphy” जैसी किताबें रखी हैं।
उसके हाथों में सबसे पहले आई “Geomorphology of Indian Rivers” किताब खोलते ही नीला मानो गंगा-यमुना की घाटियों में उतर गई। रंगीन आरेखों में बाढ़ के समय मिट्टी के बहाव को देखकर उसकी कल्पना में गाँवों के खेत लहराने लगे। फिर उसने “Principles of Stratigraphy” उठाई। मोटे पन्नों के बीच तस्वीरें हैं... सदियों पुरानी परतों की, जिनमें समय के निशान कैद हैं । हर परत, हर रंग उसे कुछ कह रहा है।
नीला ने जल्दी से अपनी नोटबुक खोली। उसकी कलम तेज़ी से दौड़ने लगी।
कुछ तुलनात्मक ढंग से वह अपने नोट्स लिखने लगी।
🔹नदी की परतें = धरती की डायरी
🔹रेतीली बनावट = तेज़ बहाव का सबूत
🔹मिट्टी की महीन परतें = शांत बहाव और ठहराव
🔹फॉसिल अवशेष = जीवन की मौन गवाही
उसकी लिखाई में सिर्फ तथ्य नहीं हैं बल्कि उसके अपने सवाल, उसकी अपनी जिज्ञासाएं भी हैं। वह लिखते-लिखते बार-बार रुक जाती, आँखें बंद करती और सोचती कि क्या ये वही कहानियाँ हैं जिन्हें सदियाँ छुपाकर रखती आई हैं?
नीला के लिए यह प्रोजेक्ट महज़ अंक लाने का ज़रिया नहीं है। यह उसकी तलाश है - धरती और पानी के रिश्ते को समझने की और उन अनकही बातों को सुनने की जो सिर्फ खामोश परतें ही बता सकती हैं।
उसने एक-एक कर अन्य किताबों के पन्ने पलटने शुरू किए। चित्रों से भरे नक्शे, नदी घाटियों की रंगीन आरेख, और शताब्दियों पुरानी परतों के फोटो देखकर उसकी आँखें ठहर गईं। कुछ ठहरकर वह जल्दी-जल्दी नोटबुक खोलकर महत्वपूर्ण बातें अपने शब्दों में बिंदुवार तरीके से लिखने लगी।
🔹परतों की मोटाई से उम्र का अंदाज़ा
🔹रेतीली बनावट बनाम चिकनी मिट्टी की संरचना
🔹बाढ़ और सूखे के चक्र का असर
पन्नों पर कलम दौड़ाते हुए उसके चेहरे पर गहरी एकाग्रता झलक रही है। जैसे हर शब्द को वह अपने प्रोजेक्ट का हिस्सा ही नहीं, बल्कि अपने निजी ज्ञान की थाती बना रही हो।
नीला नोटबुक में तेज़ी से लिख रही है लेकिन तभी उसकी नज़र एक शब्द पर अटक गई, “परत”।
उस शब्द ने जैसे उसके भीतर कोई पुराना दरवाज़ा खोल दिया।
वह अचानक बचपन में लौट गई। गाँव की नदी का किनारा… जहाँ गर्मियों की दोपहरों में वह अकेली खेला करती थी। उसकी हथेलियाँ गीली मिट्टी खोद-खोदकर छोटे-छोटे टीले बनातीं। कभी अचानक उसे कोई चमकीला कंकड़, कोई सीपी या कभी-कभी मछली की सूखी हड्डी मिल जाती।
वह उन्हें हाथों में पकड़कर चुपचाप देखती और सोचती,“ये कहाँ से आए होंगे? कितने सालों से यहाँ छुपे होंगे?”
उसकी दादी अक्सर कहती,
“धरती सब याद रखती है, बस उसके लिए कान चाहिए सुनने वाले के और नज़रें होनी चाहिए पैनी, धारदार। "
दादी के कहने का तात्पर्य था कि धरती सब याद रखती है बस श्रोता चाहिए जो धरती की अनकही कहानियां को अपनी दृष्टि से देखकर सुन सकें, बुन सकें।”
नीला तब इन बातों पर मुस्कुरा देती, लेकिन अब, किताबों के बीच बैठे हुए उसे लग रहा है कि शायद दादी सच ही कहती थीं।
उस नदी किनारे की मिट्टी ही तो थी जिसने सबसे पहले नीला की ‘परतों की भाषा’ सुनाई थी। शायद इसी वजह से आज जब वह भूविज्ञान की किताबें खोल रही है तो उसे वे सब कुछ अपना-सा लग रहा है ।
नीला हौले से मुस्कुरा दी।
उसने नोटबुक में अंतिम पन्ने के साइड की जगह पर एक छोटा सा डायलॉग बॉक्स बनाया और उसमें लिखा,
“नदी मेरी पहली अध्यापक थी।”
क्रमशः
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