एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 56 : सवालों से घिरी सावी
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 55: अनकही कहानियाँ पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 56 : सवालों से घिरी सावी
सवालों से घिरी सावी
मानपुर के पुराने मोहल्ले की वह संकरी गली जैसे समय के बोझ से दब गई हो। दो मंज़िला जर्जर मकान की दीवारें कुछ झुकी हुई-सी लगतीं और आँगन के बीचों-बीच खड़ा पीपल का पेड़ अपनी छाया से घर की खामोशी को और गाढ़ा बना देता। बाहर से सब सामान्य दिखता पर भीतर सावी के मन में सवालों का अँधेरा घिरा रहता।
रात देर तक वह अपने नोट्स के बीच उलझी रही... कभी नक्शों में नदियों का बहाव देखती तो कभी पुराने भूगर्भीय आँकड़ों को समझने की कोशिश करती। लेकिन हर बार पढ़ते-पढ़ते उसका ध्यान भटककर उसी सवाल पर अटक जाता.... वो चेहरा, जो पुरानी तस्वीर में था, क्यों बार-बार उसकी आँखों के सामने तैर आता है?
अगले दिन कॉलेज में प्रोजेक्टर पर रिसर्च प्रेजेंटेशन का सत्र है । सुबह समय पर सावी नीला के साथ कॉलेज पहुँची। मानपुर कॉलेज का वह पुराना कैंपस अपनी अलग ही दुनिया में बसा हुआ है - लाल ईंटों से बने लंबे बरामदे, दीवारों पर चिपके नोटिस बोर्ड जिन पर आधी स्याही धुंधली पड़ चुकी है और पेड़ों के बीच से छनकर आती धूप जो जमीन पर तितलियों की तरह बिखर जाती है।
वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाती हुई जियोलॉजी विभाग की ओर गई। रास्ते में कुछ छात्र अपनी नोटबुक थामे समूहों में चर्चा कर रहे हैं । सावी के मन में आज असामान्य सी बेचैनी है। उसे पता है कि क्लास में प्रोजेक्ट पर चर्चा होनी है और यह प्रोजेक्ट अब उसके लिए महज़ शैक्षणिक काम नहीं रहा है बल्कि उसके अचेतन मन में यह कहीं न कहीं उसकी अपनी कहानी से भी जुड़ चुका है ।
इसी के साथ प्रोजेक्टर पर एक-एक करके छात्र अपनी रिसर्च के विषय बताते गए।
किसी ने खनिज संरचना (Mineral Composition) पर काम चुना है।
किसी ने चट्टानों की उम्र का अध्ययन (Rock Dating Methods)
कोई नदी घाटियों में भूस्खलन के पैटर्न (Landslide Patterns) पर रिसर्च कर रहा था
और एक साथी ने जलवायु परिवर्तन का नदी प्रवाह पर असर (Impact of Climate Change on River Flow) विषय रखा।
नीला ने अपने प्रोजेक्ट के लिए “नदी घाटियों में अवसादों (sediments) के जमाव और उनकी परतों का अध्ययन” विषय चुना
क्लास के कई चेहरे उसकी ओर मुड़े। कक्षा में अचानक सन्नाटा छा गया। कुछ छात्रों ने सिर घुमाकर उसे देखा। शायद ‘बाढ़’ का नाम अब भी लोगों के मन में एक पुरानी चोट की तरह दर्ज है।
सावी की आवाज़ धीमी है मगर शब्दों में गहराई है। जैसे वो सिर्फ प्रोजेक्ट की बात नहीं कर रही हो बल्कि अपने भीतर किसी दबी हुई गुत्थी को भी सुलझाना चाहती हो।
“जी मैम, मेरा प्रोजेक्ट नदी के प्रवाह और उसके बदलते नक्शों पर है। खासकर उस बाढ़ पर, जिसने सात साल पहले पूरे इलाके को प्रभावित किया था।”
कहते हुए सावी ने अपनी नोटबुक खोली और वर्मा मैडम का कहा हर शब्द दर्ज कर लिया। उसकी उँगलियाँ पेन थामे काँप रही हैं। यह काँपना केवल अकादमिक दबाव का नहीं है बल्कि उसके भीतर गहराई में कोई और खिंचाव भी काम कर रहा है।
वह सोच रही है कि क्या यह संयोग है कि वही नदी, जिसकी परतें वह पढ़ने जा रही है, वही बाढ़, जिसे वह डेटा की तरह समझना चाहती है, उसी से जुड़ा कोई रहस्य उसके अपने घर में भी दबा पड़ा है? वही तस्वीर… वही लड़की… और सबका चुप हो जाना। एकदम सभी का चुप्पी ओड़ लेना....
पुस्तकालय की ओर
क्लास ख़त्म होते ही सावी ने अपना बैग उठाया और नीला के साथ सीधे विश्वविद्यालय के पास बने स्थानीय पुस्तकालय का रुख किया। नीला को भी पुस्तकालय से अपने रिसर्च के लिए किताबें देखनी हैं।
मानपुर का यह पुस्तकालय वर्षों पुराना है। बाहर की दीवारों पर काई जम चुकी है और छत से बेलें लटक रही हैं। मुख्य दरवाज़ा इतना भारी और जंग लगा हुआ है कि उसे खोलने पर जोर लगाना पड़ता।
जैसे ही उसने दरवाज़ा धकेला, वह चरमराकर खुला और भीतर से एक ठंडी हवा का झोंका आया। कमरे के अंदर पुरानी किताबों की गंध फैली हुई है.... वह गंध जिसमें धूल, नमी और बीते ज़माने की स्मृतियाँ घुली रहती हैं।
लंबे-लंबे रैक कतार में खड़े हैं , हर रैक पर रखी हुई है मोटी किताबें और फाइलें। लकड़ी की अलमारियों में बंद नक्शे और पीले पड़ चुके दस्तावेज़ मानो अपनी साँस रोके बैठे हैं कि कोई उन्हें फिर से खोले और उनकी कहानी सुने।
काउंटर के पीछे एक बूढ़ा आदमी बैठा हुआ है। झुर्रियों से भरा चेहरा, धँसी हुई आँखें और मोटे चश्मे का शीशा, जिसके पीछे से उसकी आँखें किसी पुराने ज़माने की खिड़की जैसी लग रही हैं । उसकी धीमी साँसें भी जैसे इस शांत माहौल का हिस्सा बन चुकी हैं।
इधर नीला ने पुस्तकालय में अंदर आते ही अपनी प्रोजेक्ट के लिए किताबों को ढूँढना शुरु कर दिया। वो स्वयं आगे बढ़कर रैक में पुस्तकें देखने लगी।
फिर उसने अपनी कुर्सी से उठकर बगल की अलमारी खोली। अलमारी के दरवाज़े चरमराए, और उनके पीछे से फटे हुए कागज़, किनारों पर धब्बे और आधी मिट चुकी स्याही से भरे नक्शे बाहर निकले। उसने उन्हें बड़े सलीके से मेज़ पर रखा।
क्रमशः
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