एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) बोनस चैप्टर 1 - अँधेरे से उजाले तक – मोहनलाल का मोड़
एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) बोनस चैप्टर 1 को पढ़ने से पहले भाग 34: गुमनाम नेटवर्क, गूंजती आवाज़ पढ़कर शुरुआत करें।
बोनस चैप्टर 1 - अँधेरे से उजाले तक – मोहनलाल का मोड़
इस अध्याय में जहाँ एक ओर एक पिता (मोहनलाल) अंतर्द्वंद की शुरुआत है वहीं एक बेटे (विक्रम)के भीतर जागता संघर्ष भी है और वहीं एक अन्य बेटे (सूरज) का गुस्सा भी है।
इसके साथ ही इसमें एक सामाजिक सन्देश भी निहित है धारावाहिक के सन्दर्भ में कि
पुलिया पर जो बोतलें खुलती थीं, वे सिर्फ शराब की नहीं थीं…
वे ज़िंदगियां तोड़ती थीं।
अँधेरे से उजाले तक – मोहनलाल का मोड़
मोहनलाल… एक ऐसा आदमी जिसने कभी अपने जीवन को अँधेरे के हवाले कर दिया था। उन अँधेरों में सिर्फ शराब की गंध नहीं थी, बल्कि टूटी उम्मीदों, घुटती जिम्मेदारियों और अपने ही परिवार से दूर होते कदमों की टीस भी थी। उसने गलतियाँ कीं वो भी इतनी कि वह खुद भी उनसे भागता फिरने लगा पर हर आदमी के भीतर कहीं न कहीं एक दीपक छिपा होता है, जो ठीक तब जल उठता है जब दुनिया उसे बुझा हुआ मान लेती है।
यह अध्याय उसी दीपक की लौ की कहानी है - मोहनलाल के जीवन के उस मोड़ की, जहाँ वह पहली बार अपनी ही छाया से सामना करता है। यह वह रात है जब अतीत की अपराधबोध भरी आहें उसे जगाती हैं और भविष्य की धीमी-सी उम्मीद उसका हाथ थाम लेती है। एक शराबी पिता की छवि में कैद हो चुके मोहनलाल के भीतर से अचानक एक ऐसा पिता जाग उठता है जो अपने बेटे के रास्ते का काँटा नहीं, उसकी ताकत बनना चाहता है। यही वह क्षण था जब अँधेरा थोड़ा पीछे हटने लगा और एक आदमी अपने भीतर जन्म ले रहे उजाले को पहली बार सच में महसूस करने लगा।
मोहनलाल उस दिन खेत से लौट रहा था जब सारा गाँव विक्रम की उपलब्धि की चर्चा में डूबा था। कक्षा आठवीं में जिला स्तर पर पहला स्थान और यह कोई छोटी बात नहीं थी। जिस गरीब किसान के घर चूल्हा कई बार मुश्किल से जलता था उसी घर के लड़के ने जिले का नाम रोशन कर दिया था। रास्ते में उसे रोककर बधाइयाँ देने वाले मिल रहे थे। कोई पीठ थपथपा देता, कोई मुस्कुरा देता। उसके भीतर भी गर्व की एक लहर उठ रही थी पर उसी गर्व ने जैसे किसी पुराने, धुँधले तहखाने का दरवाज़ा खोल दिया था जहाँ उसके दबे हुए ज़ख्म, अधूरे सपने और पुराने साथियों की यादें वर्षों से धूल खा रही थीं।
पुलिया पर पहुँचते ही उसे वही तीन चेहरे दिख गए । उसके बचपन के साथी -दिनेश, प्रकाश और कैलाश। तीनों ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए ताश खेल रहे थे और उनके पास रखी देसी शराब की बोतल लगभग खाली थी। कभी ये चारों एक ही डोरी के मोती-से थे। समय सबके रास्ते तोड़ता चला गया पर दोस्ती की पुरानी यादें उन्हें अब भी बाँधे रखती थीं।
और बस वही दो मिनट, वही एक पैग… मोहनलाल की जिंदगी को धीरे-धीरे ऐसी ढलान पर ले गया जहाँ उसे पता ही नहीं चला कि कब वह शराब का आदी बन गया। खुशी के नाम पर खोला गया जाम धीरे-धीरे आदत बनता गया-पहले हफ्ते में एक बार, फिर हर दो दिन और फिर रोज़।
रमा लाख समझाती, “ये रास्ता ठीक नहीं है जी …” पर शराब धीरे-धीरे उसके मन, उसकी जिम्मेदारियों और उसके निर्णयों पर कब्ज़ा जमाती गई। खेत की मिट्टी उससे दूर हो रही थी, पगडंडियाँ अनजान होती जा रही थीं। और पैसों की तंगी में उसने नशे-नशे में कर्ज़ उठाए, खेत के कागज़ गिरवी रख दिए।
विक्रम और रमा ने घर सँभाला, खेत सँभाला पर मोहनलाल की डगमगाई हुई दुनिया और बिखरती जा रही थी। इसी अँधेरे में एक और अँधेरा पनप रहा था और वो थी कैलाश की बिगड़ती हालत। पहले ही वह शराब में डूबा हुआ था पर कुछ सालों में वह पूरी तरह टूट गया था। उसकी पत्नी सालों पहले ईश्वरके पास चली गई थी, बेटा सूरज मजदूरी कर किसी तरह गुजर-बसर करता। कैलाश की हँसी कभी भी रोने में बदल जाती, “काश मैं भी अपने बेटे को कुछ अच्छा दे पाता…” लेकिन कैलाश होश में रहता ही कितनी देर के लिए था बस रोना शुरू और फिर पीना शुरू कर देता।
दोस्त समझाते, पर कैलाश सुनने की हालत में नहीं रहता।
वह अक्सर कहता, “पीना छोड़ दूँ तो मर जाऊँगा!”
और विडंबना यही हुई कि वह सचमुच शराब की वजह से ही मर गया।
वो एक कड़कड़ाती सर्द रात थी। गाँव में कोहरा इतना था कि दो कदम दूर का आदमी भी न दिखे। मोहनलाल भी उस दिन नशे में था, पर सांसें भरकर घर की ओर लौट रहा था।
रास्ते में देखा- कैलाश पुलिया पर पड़ा है। बोतल हाथ से गिर चुकी थी। होंठ नीले पड़े हुए थे,साँसों की आवाज़ काँपती हुई, कमजोर… कैलाश की साँसें धीमी, शरीर ढीला, आँखें आधी खुली और काँपते होंठ कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे।
पर कैलाश हँसा-
एक दर्द भरी, थकी हुई हँसी…
“मोहन… तू मत हारना…”
“तेरा लड़का… बहुत बड़ा बनेगा…”
“उसे… मेरे सूरज की तरह… रोता मत देखना… शराब छोड़ देना मेरे भाई ”
और फिर उसकी साँसें टूटने लगीं।
धीरे … धीरे … धीरे…
और अगले ही पल उसका शरीर शांत हो गया। वह मोहनलाल की बाँहों में ही चला गया।
उस रात उसने घर नहीं लौटने का फैसला किया। वह पूरी रात कैलाश के पास बैठा रहा। सूरज, कैलाश का बेटा भी उसके साथ सुबकियां भरता रहा।
रमा कई बार बुलाने आई, पर उसने कहा, “आज मुझे यहीं रहने दे। मुझे खुद को देखना है… मैं कहाँ जा रहा हूँ।”
सुबह तक उसकी आँखें लाल थीं पर शराब की वजह से नहीं, जागने, पछतावे और दर्द की वजह से।
उस दिन के बाद उसके जीवन की दिशा बदल गई। शुरुआत कठिन थी... हाथ काँपते, सिर दुखता, शरीर तड़पता पर वह हर कष्ट सह गया। खेतों में पहले से ज्यादा मेहनत करने लगा। बरसों बाद रमा ने उसे सुबह जल्दी उठते, नहा-धोकर पूजा करते और खेत सँभालते देखा। विक्रम को पहले विश्वास नहीं हुआ पर कुछ ही हफ्तों में उसने महसूस किया कि पिता सच में बदल रहे हैं। वह अब घर के काम में हाथ बँटाता, पानी भरता और पहले की तरह तो नहीं परन्तु कुछ हँस-बोल लेता। सबसे ज्यादा ख़ुशी मौली को बाबा का बदला स्वरूप देखकर हुई थी। वो मासूम चार वर्षों से बाबा को पीते देख रही थी और अब बाबा को पहले जैसा देख बहुत ही प्रसन्न रहने लगी थी। ।
धीरे-धीरे घर की टूटी दीवारों में फिर से जीवन की गरमाहट लौटने लगी। हालाँकि रमा और विक्रम क संघर्ष जारी रहा। वे पूर्ववत खेत में मेहनत करते परन्तु अब मोहनलाल ने खेती में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था और सबसे सही बात ये हुई कि उसने पीना बिलकुल छोड़ दिया था। वह डर जो वह सालों से खुद में दबाए घूम रहा था पहली बार उसे बदलने की ताकत दे रहा था। वह हर सुबह खेत के रास्ते से गुजरता तो लगता जैसे ज़मीन उससे सवाल पूछ रही हो—“कब तक?”
धीरे-धीरे उसने खुद को संभालना शुरू किया। शराब का दिमाग में ख्याल आने से पहले ही वह कैलाश के बच्चों का चेहरा याद कर लेता और यह याद उसे वापस लौटा लाती। घर की टूटी हुई चीज़ें, बिखरता चूल्हा और रमा के चुपचाप बहते आँसू और विक्रम व रमा की मेहनत, यह सब मोहनलाल को धीरे-धीरे उस अंधेरे से बाहर निकाल रहा था जिसमें वह वर्षों से कैद था। गाँव वाले भी हैरान थे; वही मोहनलाल जो कभी पाई-पाई का हिसाब भूल जाता था, अब दिन भर मेहनत करता और शाम होते ही अपने हिस्से का काम निपटा कर शांत बैठ जाता। वह बदला था... इस बार सच में बदला था।
समय बीता, विक्रम ने बारहवीं की परीक्षा दी और जिला स्तर पर टॉप किया। मोहनलाल की आँखों में वह खुशी थी जो नशे के धुंध से नहीं, बल्कि परिवार की मेहनत, एकता और पुनर्जन्म से आती है।
विक्रम के कॉलेज चले जाने के कुछ ही महीनों बाद मोहनलाल का भीतर का संघर्ष और गहरा हो गया था। शराब ने उसे तोड़ा भी था और फिर उसी टूटन ने उसे बदलने की दिशा में धकेला। कैलाश की मौत ने जैसे उसके भीतर की आख़िरी दीवार भी गिरा दी। अब वह समझ चुका था कि किसी की लापरवाही सिर्फ उसकी अपनी बर्बादी नहीं होती बल्कि पूरे परिवार का भविष्य निगल जाती है। फिर मौली भी एक दिन चली गई.... कहाँ कहाँ नहीं ढूँढा उसे पर वो नहीं मिली। किस्मत के मारे मोहनलाल और रमा जैसे तैसे अपनी ज़िदगी गुजर-बसर करने लगे। मौली की याद दिल में एक गहरा ज़ख़्म दे चुकी थी अब उन्हें विक्रम के लिए ही ज़िंदा रहना था।
चार साल बीते... और फिर विक्रम की पहला नौकरी का पत्र आया। मोहनलाल ने वह चिट्ठी कई बार पढ़ी, जैसे हर बार पढ़कर वह यकीन को और गहरा करना चाहता हो कि उसका बच्चा सच में इस अंधेरे से बहुत दूर निकल आया है। विक्रम ने नौकरी शुरू की ही थी कि उसने गाँव आकर सबसे पहला काम किया - अपनी जमीन के गिरवी कागज़ छुड़ाना। मोहनलाल उस दिन उसे देखकर बस मुस्कुराया, आँखों में गर्व और ग्लानि दोनों का गहरा मिश्रण था।
मोहनलाल के गले में जैसे कुछ अटक गया। वह बोल नहीं पाया बस सिर हिलाकर रह गया।
सूरज की आँखें भर आईं। वह कुछ कहना चाहता था पर शब्द साथ नहीं दे रहे थे।
उस क्षण मोहनलाल की आँखों में वह साफ़ उजाला था जिसे देखते हुए सूरज ने पहली बार उसे “काका” कहकर पुकारा - एक ऐसा संबोधन जिसमें आरोप नहीं, स्नेह और स्वीकृति थी।
मोहनलाल की जिंदगी की लंबी, अँधेरी सुरंग यहीं समाप्त हुई। वह अपने अतीत की गलतियों के बोझ से नहीं, बल्कि उन्हें सुधारने के साहस के साथ आगे बढ़ा। कैलाश की मौत दुखद थी पर उसने मोहनलाल को दूसरा जन्म दे दिया। एक ऐसा जन्म जिसमें वह अपना परिवार, अपना बेटा और अपना उजाला साफ-साफ देख पा रहा था। उसके भीतर का अँधेरा अब सिर्फ एक याद था और वह याद उसे हर दिन बेहतर बनने की राह दिखा रही थी।
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 35: गांव की चुप्पी और एक लिंक का राज़
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