बेटी और बहु के लिए अलग मापदंड क्यों?
"मीनू, खाना बन गया है। खाकर ही जाना।" माला ने अपनी छोटी बहन मीनू से कहा
"ठीक है, दीदी।" मीनू लाड़ से माला के गले में हाथ डाल कर बोली
दिव्या की आवाज़ आई," मौसी ढूंढो मुझे।।"मीनू दिव्या को पलंग के नीचे से ढूंढ़ कर लाई। मीनू और दिव्या को खेलता देख माला मुस्करा कर रसोई में चली गई। सलाद काटकर मीनू और माला ने मिलकर खाना लगा दिया। माला की सास रमा देवी , मीनू , दिव्या और माला सब एक साथ खाने बैठे। खाना खाकर मीनू अपने एक साल के बेटे प्रतीक के साथ घर चली गई।
मीनू के जाते ही रमा देवी माला से बोली," आजकल कुछ ज्यादा नहीं हो गया तुम्हारी बहन का आना?"
माला ने कहा," मम्मी जी , शैलेश दफ्तर के काम से बाहर गए हैं तो मैंने ही मीनू को बुला लिया।"
"अच्छा-अच्छा , ठीक है । पर महंगाई के इस जमाने में हर रोज़ किसी को खाना नहीं खिलाया जाता।" रमा देवी ने मुंह बिचकाते हुए कहा
"जी मम्मी जी।” माला रसोई में जाकर बचा खाना फ्रिज में रखने लगी।
रमा देवी अपने कमरे में आराम करने लगीं। तीन साल की दिव्या भी आज मौसी के साथ खेली कूदी थी तो बेड पर लेटते ही सो गई।
दोपहर का काम निबटा कर जरा अपनी कमर सीधी करने माला बेड पर लेटी ही थी कि पंद्रह मिनट बाद ही काॅलबेल बज उठी। घड़ी पर नज़र घुमाई तो देखा चार बजा था। सोचा इस समय तो रोहित के आने का समय भी नहीं हुआ है तो फिर कौन आया इस समय।
सोचते सोचते माला ने दरवाजा खोला तो देखा राखी दीदी, उसकी बड़ी ननद आई हैं। साथ में उनके बच्चे रोली और अमित हैं जो क्रमशः चार और आठ साल के हैं।
घुसते ही राखी बोली," माला, फटाफट चाय पिलाओ। आज मेरा सिर दर्द कर रहा है। "
बच्चे बोले," मामी, हम तो मैंगो शेक पिएंगे।"
माला ने हंसते हुए कहा, "जी दीदी। अभी लाई। आप मम्मी जी के साथ बैठिए।"
बातचीत सुन कर रमा देवी अपने रूम से बाहर आ गईं। माला से बोली," पकौड़ियां भी तल लेना।"
"जी, मम्मी जी।"
माला ने फटाफट आलू, प्याज और गोभी काटा। बेसन फेंटा। आम काट कर मिक्सी में मैंगो शेक बनाकर बच्चों को दिया। दिव्या भी जग गई। अमित और रोली के साथ खेलने लगी।
पकौड़ियां और चाय बनाकर रमा देवी और राखी को उनके रूम में देकर माला वापस जाने लगी।
राखी बोली," माला, पकौड़ी तो खा लो।"
माला रुकी ही थी कि पीछे से रमा देवी बोली," जल्दी से चाय पीकर शाम के खाने की तैयारी कर लो। दामाद जी ऑफिस से सीधे यहां आएंगे। कुछ अच्छा बना लो। मीठे में कस्टर्ड या पोस्त की खीर बना लेना। बच्चों को भी पसंद है।"
माला ने कहा," ठीक है मम्मी जी।"
वह अपना चाय का कप लेकर रसोई में आ गई।
जल्दी जल्दी हाथ चलाते हुए माला ने शाही पनीर और भरवां बैंगन की तैयारी कर छौंक दिए। बूंदी का रायता बना कर सलाद भी काट कर फ्रिज में रख दिया। आटा गूंथ कर मटर के पुलाव की तैयारी कर ली। इन सब में साढ़े छः बज गया।
रोहित और आलोक जीजाजी सात बजे के आस-पास आ गए। दोनों को मैंगो शेक दिया। उन लोगों ने पकौड़ियों के लिए मना कर दिया।
साढ़े नौ तक सबको माला ने खाना खिला दिया। कस्टर्ड की सबने तारीफ़ की।
जीजाजी ने तो कह भी दिया," राखी, देखो माला कितने अच्छे से खातिरदारी करती है।"
जिस पर रमा देवी ने कहा," ऐसा कोई विशेष नहीं करती है। वो तो मैं बता देती हूॅ॑ तो आपकी पसंद का बना देती है। मेरी बेटी राखी कम अच्छा खाना बनाती है, क्या?"
जीजाजी कुछ बोले नहीं। बस मुस्कुरा कर रह गए।
ये हमेशा की रमा देवी की आदत है। बहू की बड़ाई कोई करें तो उन्हें सहन नहीं होती। फौरन ही बेटी की तारीफ करने लग जाती हैं।
साढ़े दस बजे सबके जाने के बाद रसोई समेटने के बाद करीब ग्यारह बजे माला अपने रूम में पहुंची तो देखा दिव्या सो गई थी।
रोहित ने कहा," आज काफ़ी थक गई हो, लगता है।"
माला ने कहा," नहीं ऐसा कुछ नहीं है। दिन में मीनू आ गई थी।"
रोहित ने पूछा," वो लोग सैट हो गए, अब?"
दरअसल मीनू को यहां आए अभी एक महीना हुआ है। उसके पति का स्थानांतरण माला के शहर में हो गया है। शुरू के दो तीन दिन माला ने रोहित के हाथ खाना भिजवा दिया था। फिर मीनू की किचन सैट हो गई तो उसने मना कर दिया। उसके बाद वह आज दूसरी बार अपनी बहन से मिलने आ गई थी। जो रमा देवी को नहीं भाया था और उन्होंने माला को सुना दिया था।
माला ने कहा," हां। आपका बहुत आभार प्रकट कर रही थी। कह रही थी कि आपने उसको यहां के सभी रास्ते और बाजार वगैरह बताएं और खाना पहुंचाने के लिए भी धन्यवाद कह रही थी।"
रोहित बोला," अरे! इसमें आभार की क्या बात है। मीनू तुम्हारी बहन है तो वैसे ही मेरा भी तो कुछ रिश्ता है मीनू से।"
कुछ रुक कर रोहित बोला," तुम तो तब थीं नहीं जब छह साल पहले राखी दीदी का स्थानांतरण यहां हुआ था। हमारी शादी नहीं हुई थी तब। मैं करीब महीने भर तक दीदी को सुबह शाम खाना देकर आता था। घर सैट करवाने में भी मदद की थी। अमित तब दो साल का था तो मम्मी ही संभाल लेती थीं। सुबह से शाम तक यहीं रखते थे अमित को, ताकि दीदी घर सैट कर सकें।"
माला ने कहा," ये तो बहुत अच्छा किया आप लोगों ने। दीदी को आसानी रही होगी इससे।""
रोहित बोला," हां, छोटे बच्चे के साथ मैनेज करना कठिन होता है मैं तो मीनू के बारे में सोच रहा हू॑। उसने एक साल के बच्चे के साथ घर को तीन चार दिन में ही सैट कर लिया।"
बातचीत होते होते साढ़े ग्यारह बज गए। माला और रोहित सो गए।
सुबह रोज़ की तरह पांच बजे उठकर माला ने नहा-धोकर पूजा करके रमा देवी को चाय दी। अपनी और रोहित की चाय भी बनाकर साथ पी।
नौ बजे तक रोहित का टिफिन पैक कर तीनों का नाश्ता करवा कर घर में जरूरी सामानों की लिस्ट बनाने चली।
रमा देवी ने आवाज़ लगाई," माला, इन सामानों को जोड़ लेना लिस्ट में। राखी का कुछ सामान भी मंगा लेना। वो कल बाजार जाने वाली थी, सामान लेने। मैंने कहा कि हम ऑनलाइन मंगा देंगे। राखी कल आकर ले जाएगी।"
माला ने चुपचाप लिस्ट ली और सामान ऑनलाइन आर्डर कर दिया।
आज दोपहर का काम निबटा कर वह कुछ सोचने पर विवश हो गई।
माला की शादी हुए चार साल हो गए। शादी के बाद से ही वह देख रही है कि राखी दीदी अपनी फैमिली के साथ हफ़्ते में दो से तीन बार तो आ ही जाती हैं। कभी दोपहर से रात तक तो कभी शाम से रात तक के लिए। फिर खाना तो खाकर ही जाती हैं। महीने में एक दो बार रसोई के सामान की लिस्ट भी उनकी जाती है। जीजाजी के बार बार मना करने पर भी राखी दीदी ऐसा ही करती हैं। मम्मी जी भी कहती हैं बेटी को तो जितना करो कम है। माला सब खुशी-खुशी करती है। आगे से आगे बढ़ कर सभी काम करती है।
इधर एक महीने हुआ, स्थानांतरण के कारण माला की बहन मीनू इसी शहर में रहने लगी है। आज जब मीनू महीने में दूसरी बार मिलने आई तो मम्मी जी ने सुना दिया कि महंगाई के जमाने में खाना खिलाना भारी पड़ता है। वो भी तब जब मम्मी जी ,स्वर्गीय पापाजी की पेंशन अपने हिसाब से खर्च करती हैं। घर खर्च वगैरह सब रोहित करता है। बेटी और बहू के लिए दोहरा मापदंड क्यों? क्या यह घर इतना भी मेरा नहीं कि मैं अपनी बहन को दो बार खाना भी न खिला सकूं?
यह सब सोचकर माला का सिर भारी हो आया। शाम हो चली थी। वह चाय बनाने लगी।
इतने में रमा देवी की आवाज़ आई," माला, कल राखी आएगी तो दोपहर के लिए छोले भिगो देना आज रात में। शाम को भी कुछ अच्छा बना देना, कोफ्ते, दम आलू और सेवइयें। रोहित से सबकी मनपसंद आइसक्रीम मंगा लेना।"
माला बोली," जी मम्मी जी।"
वह रोहित को फोन कर आइसक्रीम के फ्लेवर लिखाने लगी।
माला जिस तरह आज सुन रही है और फिर भी काम कर रही है, हो सकता है कि आगे पलट पर रमा देवी को जवाब देने लगे। बहू के कभी भी 'न' नहीं बोलने का अर्थ यह नहीं निकलता है कि उसे कुछ समझ में नहीं आता है। या वो जवाब देना नहीं जानती।अगर यही महंगाई की बात राखी के लिए माला कर दे तो उससे बुरी भाभी दुनिया में कोई नहीं होगी। रमा देवी को संतुलन बनाए रखते हुए चलना चाहिए। पुत्री मोह में ऐसा न हो जाए कि बहू या बेटा के ऊपर अनावश्यक भार डालती जाएं। अभी बेटा बहू कर रहें हैं। कल को उनके बच्चे बड़े होंगे तब वे उतना नहीं कर पाएंगे। फिर अगर बहू बेटा कुछ कह दें तो सास दिल पर लेकर बैठ जाएं। दूसरी बात, बहू के घरवालों को भी सम्मान दें। बहू को भी अच्छा लगेगा। घर में सभी की भावनाओं का आदर करें। ये तो अच्छा है कि रोहित समझदार है, माला की बहन की भी उतनी परवाह करता है कि माला रमा देवी की बातों को दिल पर नहीं लेती है।
हर घर में बड़ों का एक दर्जा होता है, उनकी खास अहमियत होती है। आदर सम्मान मिलता है। बड़ों को आदर सम्मान बनाए रखने के लिए संतुलन बनाकर चलना चाहिए।
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बेटी और बहु के लिए अलग मापदंड क्यों ?
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