हौसला व हिम्मत हों तो मुश्किलें घुटने टेक देती हैं!

चारों  तरफ अँधेरा ही अँधेरा था। भरी दोपहर में आभा को केवल गहन अन्धकार का आभास हो रहा था। रूम में जल रहा बल्ब मानों प्रकाशहीन हो चुका था। आभा का दिल बैठने लगा, सिर घूमने  लगा। अमित ने उसको सम्भाला। अभी-अभी  डॉक्टर कमल ने नैना के बारे में आखिरी फैसला बताया था।

नैना,अमित और आभा की आठ साल की प्यारी सी बेटी है। तीन महीने पहले स्कूल से आने के बाद नैना ने सिर दर्द,आँखों में जलन व दर्द की शिकायत की।अमित व आभा ने आँखों के डॉक्टर को दिखाया। नैना की आँखों की जांच के बाद चश्मा मिल गया। 

कुछ दिनो बाद वापस दर्द होने पर आँखों के टेस्ट हुए। पता चला कि नैना की आँखों की रोशनी तेजी से कम हो रही है।आई ड्राप्स डालकर देखा गया।चश्मे का नम्बर तेजी से बदलता गया।

एक दिन नैना ने बताया कि उसको कुछ नहीं दिख रहा है। तुरन्त हास्पिटल पहुँचे।आनन फानन में और कोई उपाय न देख कर डॉक्टर कमल के सुपरविजन में नैना की आँखों का ऑपरेशन किया।डॉक्टर कमल ने पहले ही ऑपरेशन के सफल होने के चांसेज कम बताए थे।

तीसरे दिन नैना कीआँखों की पट्टी खोली गई,नैना चिल्ला कर बोली,"मम्मी,मुझे कुछ नहीं दिख रहा है।"

अमित और आभा को रूम से बाहर भेज कर डॉक्टर ने नैना की आँखों की बहुत देर तक जांच की। फिर डॉक्टर ने अमित व आभा को अपने केबिन में बुलाकर बताया कि नैना की आँखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी है। उन दोनों को धीरज रखने को कहा और नैना को बहुत प्यार से उसकी आने वाली जिंदगी के लिए हौंसला देने के लिए उन दोनों को समझाया।

 नैना को दोनों घर ले आए,धीरे धीरे करके उसे नित्य कर्म के लिए ट्रेनिंग दी। नैना समझदार बच्ची निकली,माता पिता के कहे अनुसार पालन किया व नए सिरे से सब सीखती गई।

आभा के दिमाग में गहरी उलझन चल रही है।उसने अमित से बात कर शाम को अमित के ऑफिस से आने के बाद ब्रेल लिपि सीखने की क्लास में जाना शुरू कर दिया।ब्रेल लिपि के डॉट्स में उतरती गई।ऐसा लगता कि इन्हीं डॉट्स में उसकी बेटी का भविष्य छुपा है।

धीरे धीरे बेटी का परिचय ब्रेल लिपि से कराया।नेत्रहीन बच्चों के विधालय में नैना ने छात्रा के रूप में,आभा ने शिक्षिका के तौर पर ज्वाइन किया।

समाज के मिलने जुलने वाले लोगों ने आभा का मज़ाक उड़ाया,उसको बोला कि ऐसा करने से क्या होगा, नैना की रोशनी तो आने से रही। नैना को घर में रखो,बोझ है वो तुम लोगों पर।

लोगों की बातों से निराश होने की बजाय आभा दोगुने उत्साह से अपना काम करती रही।

आभा ने विधालय में नेत्रहीन बच्चों की मुश्किलों को देख समाधान के उपायों को ढूंढा।नैना की हर समस्या को वो व्यवहारिक एवम् मनोवैज्ञानिक तरीके से सुलझाने लगी।सभी बच्चों में आत्मविश्वास हिलोरें लेने लगा। 

समय का चक्का चलता रहा,हर पल अमित का साथ रहा।आभा अब उसी नेत्रहीन विधालय की प्रधानाचार्या है।नैना उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी है।नैना नेत्रहीन बच्चों के लिए संस्थान खोलना चाहती थी जिसमें हर नेत्रहीन बच्चे को शिक्षा व व्यवहारिक पाठ्यक्रम के जरिए अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके।आज उसका सपना हकीकत में परिवर्तित होने जा रहा है।

आभा से फीता कटवाकर नैना ने अमित व आभा के साथ अपनी कर्म भूमि में पूर्ण आत्मविश्वास से कदम रखा।

भीड़ में ताली बजाने वाले वो लोग भी थे जिन्होंने आभा को नैना एक बोझ बताते हुए हतोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

दोस्तों, आभा ने इतनी बड़ी विपत्ति पड़ने पर भी हिम्मत दिखाई और नैना के साथ हर पल खड़ी रही। नैना ने भी माँ पिता का साथ पाकर सफलता के शिखर को अथक परिश्रम से  हासिल किया।  चाहें लोगों ने क्या क्या न कर उनका हौंसला तोड़ने की भरपूर कोशिशें की। अपने मनोबल से नैना और आभा ने सब को सफल होकर दिखाया।

विपत्ति आने पर यदि सूझ-बूझ से काम लिया जाये और अपने इरादों को करने के लिए निरंतर प्रयास किये जाए तो बड़ी से बड़ी समस्या  हल हो जाती हैं और मुसीबत भी घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है।

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प्रियंका की कलम से 🖋

धन्यवाद। 


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