वंशबेल !
“मीना जल्दी से तैयार हो जाओ।दो घंटे का रास्ता है और कार्यवाही होते होते समय लगेगा। लौटना भी आज ही है।”आलोक बेडरूम के दरवाजे से बोलता हुआ किचन तक पहुँच चुका था।
सुबह की सैर से आते हुए शर्मा दम्पत्ति मुख्यद्वार पर ठिठककर रुक गए। आलोक से मुखातिब होकर पूछा, "सवेरे सवेरे कहाँ जा रहे हो, बेटा?"
"पापा,कल बताया था ना कि मैं और मीना अनाथालय जाकर आएंगे। संचालक ने सूचना भिजवाई थी। तीन चार प्यारे प्यारे बच्चे हैं। अब हमारा नम्बर आ गया है।"
"हाँ बेटा, भगवान ने बहुत इंतजार कराया इस घड़ी का।"
"पापा, प्रतीक्षा सूची काफी लम्बी थी और बच्चे कम।"
मीना,आलोक, मिस्टर शर्मा एवम् मिसेज़ शर्मा साथ बैठ कर नाश्ता करते हैं।
नाश्ते के बाद मीना सासु माँ- ससुरजी के पैर छूकर कहती है,“पापा-माँ आशीर्वाद दीजिए कि हम एक प्यारा सा बच्चा लेकर घर लौटे।”
मिसेज़ शर्मा बीच में ही टोककर कहती हैं, “कोशिश करना कि बेटा ही गोद लो तुम लोग।”
आलोक माँ को प्यार से कंधे पकड़ कर कहता है, “माँ हम अपने सूने घर के लिए किलकारी लेने जा रहे हैं और वो बच्चा बेटा हो या बेटी,हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है।”
"पर फिर भी सोच ले आलोक , वंश बेटा ही बढ़ाता है।"
"माँ,तुम आज की नारी होकर ऐसी सोच ना रखो।मेरे और मीना के लिए दोनों ही बराबर हैं।"
मिस्टर शर्मा जो चुपचाप खड़े अपनी पत्नी और बेटे का वार्तालाप सुन रहे थे, अचानक बोले,“आलोक सही कह रहा है, सुभद्रा। क्या मीना, हमारी बहू और रेखा, हमारी बेटी कम हैं किसी से? तुमने स्वयं बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं किया। बेटा-बेटी दोनों इंजीनियर हैं और बहू चार्टेड अकाउंटेंट है। तो ऐसी सोच तुम्हारे दिमाग में क्यों कर उत्पन्न हुई?"
मिसेज़ शर्मा लज्जित होते हुए बोली,"१३२ नम्बर वाली मिसेज़ टण्डन कह रही थीं बेटा ही वंश चलाने वाला होता है। पर अब मैं समझ गई हूँ, समाज की इसी मानसिकता को बदलने की जरूरत है। मेरे लिए कल भी लड़का-लड़की बराबर थे और हमेशा रहेंगे। जाओ बेटा, जाकर ले आओ घर की किलकारी को।"
आलोक-मीना अनाथालय में बच्ची से नज़रें हटा ही नहीं पा रहे थे।बेटी का अपलक निहारना मन को भा गया था। वे दोनों बेटी घर ले आए।
शाम को मिसेज़ शर्मा ने पोती का स्वागत आरती उतारकर किया। पोती के आने से घर में बहार आ गई।
अगले दिन पार्क में १३२ नम्बर वाली पड़ोसिन ने उलाहना दिया, “क्या मिसेज़ शर्मा बेटे-बहू को नहीं समझाया लड़का गोद लेने के लिए। लाए भी तो क्या लड़की?"
मिसेज़ शर्मा ने पूर्ण आत्मविश्वास से पड़ोसिन को उत्तर दिया, “आप किस ज़माने की बात कर रही हैं मिसेज़ टण्डन? दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी और आपकी सोच कुएँ के मेंढक की भांति पिछड़ी है! सोच बदलिए, हमारी दुनिया बराबरी वाली है, जहाँ हम लड़का हो या लड़की, कोई भेदभाव अथवा फर्क नहीं करते हैं।”
ऐसा कहकर उन्होंने अपने घर का रुख किया।
दोस्तों,इस कहानी में सासु मां की सोच को परिष्कृत किया गया है। पड़ोसियों की बातों में न आकर अपने घर की खुशी देखें।
लड़का-लड़की में भेदभाव ना करें, दोनों को ही सामान प्यार व अधिकार दें । दिल से लिखी है ये कहानी,अगर आपके दिल तक पहुँची हो तो कृपया लाइक , कमेंट व शेयर करें अपनी अमूल्य राय भी साझा करिए।
ऐसी ही दिल को भाने वाली रचनाओं के लिए आप मुझे फाॅलो भी कर सकते हैं।
धन्यवाद।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें