धुआँ धुआँ ज़िंदगी - कविता

Dhuan Dhuan Zindagi kavita pic

धुआँ धुआँ ज़िंदगी 

हिंदी कविता

सिगरेट के शौक ने उसके
कर दिया अपनों को भी रोगी।
घर में उसके छा चुकी है,
मौन मरघट सी ख़ामोशी।

माता-पिता निपट गए,
गुबार में कश के उसके।
बेटे से प्यार की सजा पा,
वे दोनों तो फ़ना हुए।

पत्नी हमसाया, हमदम है,
पास रहने का खामियाज़ा।
हर पल हर क्षण भुगतती है,
रह-रहकर अब वो भी खांसा करती है।

बच्चे भी तो बच न पाए,
ध्रूमपान के ज़हरीले धुएँ से।
फेफड़े काले स्याह हो गए,
नन्हे-मुन्ने नौनिहालों के।

स्वयं भी काल कवलित हुआ वो,
धुआँ सब तरफ़ फैला फिर।
लील गया हँसी-ख़ुशी, बुढ़ापा,
बचपन और जवानी सब।

मोहल्ले वाले कहते हैं अब,
“कभी घर ये हँसता गाता था।”
अब टूटी कुर्सी, बुझी राख,
बस अतीत का साया मंडराता है।

दीवारों पर पीले निशान,
छतों पर स्याही की लकीरें।
हर कोने में गंध है धुएँ की,
हर याद में हैं टूटी हुई तस्वीरें।

अस्पतालों की राहें, दवाइयाँ,
बाकी बचों की है बन गईं आदत।
साँसें भी अब खिंचती जातीं बस ,
जैसे टूटी डोर की आख़िरी हो जिद।

सिगरेट की लपटों ने यूँ,
एक पूरा संसार निगल लिया।
जिसे वो शौक समझता था,
उस मौत ने अपना जाल बुन लिया।

साँसों ने मांगी अब पनाह,
जली उम्मीदें, बुझी हर आह।
धुंए में सुलगती, खो गई हर चाह।
एक कश और कई ज़िन्दगियाँ राख। 

ऐ इंसान! अब भी संभल जा,
ये धुआँ तुझे अंतत: खा जाएगा।
तेरे अपनों की आँखों से,
हर सुख का रंग चुरा ले जाएगा।

आग जो तू होठों से लगाता,
वो तेरा जीवन शनैः शनैः जलाती है।
हर कश में तेरा कल सुलगता,
तेरा घरबार, तेरी हस्ती मिटती जाती है।

-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

(मौलिक व स्वरचित)

१२ अगस्त, २०२३   

लेखिका की कलम से 

दोस्तों,

भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।

धन्यवाद 
🙏 आभार

प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

टिप्पणियाँ