एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 10: चमक से पहले ज़मीन
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 9: आशा की इमारत पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 10: चमक से पहले ज़मीन
ऑफिस में खुशी का माहौल
मुंबई की शामें उस समय कुछ और ही रंग बिखेरती हैं जब कांच की ऊँचाइयों से नीचे देखते हुए इंसान अपने ज़मीर की गहराइयों में डूबा हो। चमचमाती सड़कें, रफ्तार से दौड़ती गाड़ियाँ, कॉर्पोरेट कॉरिडोर्स में गूंजती एलेवेटर की आवाजें और उस सबके बीच, “एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड” के टॉप फ्लोर पर बैठा विक्रम चौधरी।
अब वह किसी परिचय का मोहताज नहीं। देश के सबसे सफल युवाओं में उसका नाम लिया जाता है। ग्रामीण भारत को डिजिटल क्रांति से जोड़ने वाली इस कंपनी का नेतृत्व वही कर रहा है।
यह एक शांत डूबते हुए सूरज के साथ अंगड़ाई लेती हुई शाम है जब “एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड” के कॉर्पोरेट ऑफिस में अचानक हलचल मच गई। ऑपरेशन्स डायरेक्टर डेस्क पर एक मेल आया—विषय पंक्ति में लिखा था: "Keynote Speaker Invitation: Global Tech Confluence, New York".
जैसे ही मेल खुला, स्क्रीन पर एक नाम उभरा: विक्रम चौधरी।
अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित हो रही प्रतिष्ठित Global Tech Confluence कॉन्फ्रेंस में बतौर मुख्य वक्ता आमंत्रण। यह केवल किसी सीईओ के लिए बुलावा नहीं है बल्कि यह उस सपने की वैश्विक स्वीकृति थी, जो मिट्टी से उगा है।
ऑफिस के कम्युनिकेशन बोर्ड पर जब मेल प्रोजेक्ट किया गया, पूरा ऑफिस तालियों से गूंज उठा। आस्था जो विक्रम की ऑपरेशन्स डायरेक्टर और करीबी सहयोगी है, उसकी आँखों में गर्व की चमक है। एचआर टीम से लेकर ग्राफिक डिज़ाइनर तक हर कोई अपनी सीट से उठ खड़ा हो गया।
"हमारे विक्रम सर… अब ग्लोबल लेवल पर...", यह वाक्य हर कोने में गूंजने लगा।
कॉरिडोर में खड़े कुछ जूनियर इंटर्न्स ने कहा, “सर ने जिस मिट्टी से शुरुआत की, उसी की बात लेकर अब वो दुनिया के सबसे बड़े मंच पर जाने वाले हैं।”
“From Village Blackboard to Global Stage”
सोशल मीडिया टीम के पास कंटेंट की बाढ़ आ गई: विक्रम की पुरानी तस्वीरें, उनके गाँव के दौरे, लर्निंग हब की झलकियाँ, सभी एक कहानी बनने लगे।
ऑफिस में हलचल है। आस्था, जो अब उसकी सबसे भरोसेमंद सहयोगी बन चुकी है, पूरी टीम के साथ यात्रा की तैयारियों में जुटी है। पासपोर्ट चेक, मीडिया ब्रीफिंग्स, इंटरव्यू स्लॉट्स, इंटरनेशनल काउंसल, सब कुछ सटीक रूप से व्यवस्थित किया जा रहा है।
किचन स्टाफ तक को जब यह खबर मिली तो चाय के साथ एक मिठाई का डिब्बा जुड़ गया। कंपनी के कैफेटेरिया में भी उत्सव का माहौल है।
ग्लास वॉल्स के उस कॉन्फ्रेंस रूम में जहाँ आमतौर पर बिज़नेस चार्ट्स और प्रॉफिट रेशो की चर्चा होती थी, आज वहाँ चर्चा थी सपनों की, संघर्षों की और उस भरोसे की जिसने एक गाँव के लड़के को ग्लोबल मंच तक पहुँचा दिया।
"विक्रम सर कहाँ हैं?" ये सवाल कई बार पूछा गया, लेकिन विक्रम अपने केबिन में खामोश बैठा है। माँ की तस्वीर के सामने, मौली की कॉपी के पास, एक चुप मुस्कान के साथ.... शायद उसके मन-मस्तिष्क में कोई मंथन चल रहा है.... कुछ गहन सोच-विचार में डूबा हुआ है।
और कुछ दिन बाद ...
टॉप फ्लोर पर एक कोना है, सीईओ केबिन जहाँ आज भी एक पुरानी तस्वीर रखी है: विक्रम की माँ की। उसके ठीक बगल में मौली की लिखावट वाला फ्रेम। वहाँ समय मानो कुछ धीमा है।
विक्रम अपनी कुर्सी पर बैठा है, पर उसकी आँखें मॉनिटर स्क्रीन में नहीं, अपने भीतर के किसी पुराने खेत में भटक रही हैं। जहाँ धूल उड़ती है पर उम्मीद की मिट्टी गीली रहती है ।
“सर, वीज़ा अपॉइंटमेंट का टाइम आ गया है। उसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की टीम आपसे मिलेगी। इंटरनेशनल मीडिया इस बार काफ़ी उत्साहित है। आपको तैयार रहना होगा।”
“आस्था, वीज़ा प्रोसेस कम्पलीट कर लेता हूँ पर न्यूयॉर्क थोड़ा बाद में। मैं सोच रहा हूँ कि कॉन्फ्रेंस के दूसरे राउंड में जाऊँ। पहले मुझे गांव जाना है।”
आस्था की आँखों में हैरानी उभरती है, “सर? आप न्यूयॉर्क मिस करेंगे? इस बार तो ‘एकांश’ को वहाँ एक ग्लोबल अवॉर्ड भी मिल सकता है!”
मेरी बात समझो आस्था, वीज़ा पूरे तीन साल का मिलेगा और कांफ्रेंस का दूसरा राउंड चार महीने बाद है तो मैं दूसरा राउंड अटेंड करूँगा।
विक्रम अब सीधा खड़ा होता है। उसकी आँखों में सच्चाई की चमक है और शब्दों में वो ठहराव जो किसी अनुभवी जीवन से आता है।
“आस्था, पहचान वहाँ मिलती है जहाँ दुनिया देखती है... लेकिन जड़ें वहीं होती हैं जहाँ कोई देखता नहीं। 'एकांश' की जड़ें मेरे गाँव में हैं। उसी ज़मीन से उगा हूँ मैं। और अब वक़्त है उस ज़मीन को कुछ लौटाने का। रीजनल सेंटर वहीं खुलेगा और उद्घाटन भी मैं ही करूँगा।”
“चमक जरूरी है, पर उससे पहले ज़मीन ज़रूरी है… ताकि रोशनी सिर्फ ऊँचाई नहीं, गहराई भी दे।”
चमक हर किसी को आकर्षित करती है। आकाश की ऊँचाइयों पर दमकते सितारे, ऊँचे मंचों पर मिलती तालियाँ, और उन नामों की गूंज जो अख़बारों की सुर्खियाँ बनते हैं। लेकिन इन सारी चमक के पीछे एक सच्चाई छिपी होती हैवो ज़मीन, जहाँ एक सपना पहली बार बोया गया था।
ज़मीन वह आधार है, जहाँ संघर्ष की मिट्टी है, जहाँ मेहनत की बूंदें पसीने की तरह गिरती हैं और जहाँ असफलताओं की जड़ें गहरी होती हैं। कोई भी रोशनी तब तक संपूर्ण नहीं होती जब तक उसका एक सिरा उस ज़मीन से न जुड़ा हो जिसने उसे आकार दिया।
आस्था मेरे लिए यह सिर्फ़ एक सफ़र नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है। इस बात को याद रखना कि जिस प्लेटफ़ॉर्म से मैंने उड़ान भरी है वहां अब भी कई नन्हे सपनों की परछाइयाँ हैं जो किसी अपने की रोशनी की बाट जोह रही हैं। चमक तो आएगी, पर पहले ज़मीन चाहिए ताकि जब रोशनी फैले तो वह केवल सिर ऊँचा करने का साधन न बने बल्कि किसी झुकी हुई उम्मीद को भी उठा सके। वह रोशनी जो किसी गाँव के आख़िरी घर तक पहुँचे, किसी स्कूल की टूटी दीवारों पर उम्मीद की धूप बन जाए।
क्योंकि जब ऊँचाई ज़मीन से जुड़ती है… तभी असली उजाला होता है।
एक क्षण को आस्था चुप रहती है। वो जानती है कि विक्रम कोई भावुक निर्णय नहीं लेता। उसकी हर योजना में संवेदना और समझदारी दोनों होते हैं। अब उसका आगे का कार्य शुरु होता है वह ग्लोबल टेक न्यूयॉर्क को ईमेल करती है और विक्रम की तरफ से उसको सेक्यों राउंड में आने का कन्फर्मेशन देती है साथ ही इस कन्फेरेने के लिए क्षमा मांगते हुए यह लिखती है की सीईओ गांव के चतुर्दिक डिजिटल विकास की राह पर रीज़नल सेंटर खोल रहे हैं तो वह बहुत सारे नयी उपलब्धियों के साथ सेकंड राउंड में जुड़ेंगे।
विक्रम के ग्लोबल टेक न्यूयॉर्क में अभी नहीं जाने के निर्णय से क्या कुछ होगा?.... क्या इस निर्णय को भावुकतापूर्ण समझकर बोर्ड मेंबर्स आपत्ति दर्ज़ करेंगे? क्या विक्रम अपने गांव में रीजनल सेंटर स्थापित करने और उद्घाटन के लिए स्वयं जा पाएगा?
क्रमशः
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग - भाग 11: वापसी की ओर
nicely written part! waiting for the next part...
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