एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 6: विक्रम का पहला कदम

 अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 5: जड़ें और जद्दोजहद पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 6: विक्रम का पहला कदम

जहाँ हालात हताशा में भी एक उम्मीद का रास्ता खोलते हैं।
बोझ उठाने की उम्र नहीं है फिर भी…

उसी रात, जब घर नींद में डूबा है, सभी लोग सो रहे हैं, विक्रम अपनी चारपाई से उठा और बिना आवाज़ किए बाहर निकल गया। स्कूल की तरफ जाते रास्ते में उसके  मास्टरजी का घर आता है। वह दरवाज़े पर पहुँचा और हल्की दस्तक दी।

कुछ देर बाद मास्टरजी ने दरवाज़ा खोला।
“विक्रम तुम! इतनी रात गए? आओ-आओ अंदर चलो!”

विक्रम की आँखों में संकल्प था, “मास्टरजी, मुझे कुछ काम चाहिए। मैं ट्यूशन पढ़ा सकता हूँ… बच्चों को… बस कुछ पैसे चाहिए…”
इतना बोलते हुए ही विक्रम की आँखें भर आईं। 

मास्टरजी को सब कुछ बताने का साहस उसने पहली बार किया। किताबें-कॉपी, घर का राशन, मौली की तबीयत और पिता का बदलता व्यवहार… मास्टरजी ने लंबी गहरी साँस ली।

“मैंने पहले ही कहा था कि सपनों की राह सीधी नहीं होती, बेटा,” उन्होंने कहा, “लेकिन तुमने अपना पहला कदम उठा लिया है यकीन मानो सब सही हो जायेगा। यह पहला कदम जब सही समय पर उठाया जाता है तब  वो सबसे मज़बूत साबित होता है।”

मास्टरजी ने स्कूल के पास के मोहल्ले में एक बुज़ुर्ग परिवार के बच्चों को ट्यूशन देने की बात की। 

विक्रम ने हाँ कर दी। मास्टरजी ने कहा कि वह कल उस परिवार से बात कर लेंगे और उसे कल  स्कूल में बता देंगे। इसके बाद उन्होंने  विक्रम को घर वापस भेज दिया। 

अगले दिन विक्रम दोपहर देर से घर लौटा। घर में घुसते ही रमा ने पूछा , “इतनी देर कहाँ रह गया था?”

“पढ़ाने गया था, माँ… ट्यूशन…” विक्रम ने मुस्कुरा कर कहा, “हर महीना पांच सौ रुपए मिलेंगे…  उससे दवा और थोड़े चावल तो आ ही जाएँगे। कल से मैं  शाम को चार बजे जाया करूँगा आज पहला दिन था गुरुजी ने घरवालों से मिलवा दिया और कुछ देर बच्चों को पढ़ा भी दिया।  दो बच्चे हैं, माँ जिन्हे मैं पढ़ाऊँगा । ”

रमा ने कुछ पल उसे देखा, उसकी छोटी सी पीठ जो अब ज़िम्मेदारियों से झुकने लगी है...  उन आँखों की चमक जो अब भी उतनी मासूम है ... परन्तु उस रात पहली बार रमा की आँखों में आँसू राहत के हैं ।

उसके अगले दिन से विक्रम दो छोटे बच्चों को घर पर ट्यूशन देने लगा। शाम को जब गाँव के बाकी बच्चे गलियों में खेलते, वह किताबें खोलकर दो मासूमों को गिनती और वर्णमाला सिखा रहा होता।

घर लौटकर माँ की गोद में सिर रखकर विक्रम लेता तो रमा ने विक्रम के बालों में उंगलियाँ फेर दीं।
“तू बस अपनी पढ़ाई मत छोड़ना, बेटा…”

विक्रम मुस्कराया, “माँ, मैं कुछ भी कर लूँगा… पर आपको रोते नहीं देख सकता।”

उस रात जब रमा रोटी बेल रही थी, विक्रम मौली के पास बिठा है.... मौली की हँसी अंदर से आई—वह अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रही है। रमा के चेहरे पर थोड़ी रोशनी लौटी....

मोहनलाल ये सब देख रहा है। वो कुछ नहीं कहता, लेकिन उसे अब ये एहसास होने लगा है कि ज़िम्मेदारी उठाना उम्र नहीं, इरादे की बात होती है।

हफ़्ता बीतते बीतते मौली की तबीयत थोड़ी ठीक हुई पर घर में चुप्पी का साया अभी भी है । मोहनलाल अब कभी-कभी ही खेत पर जाता है  और लौटते हुए फिर वहीं बैठ जाता — पुलिया की पुरानी बेंच पर , पुराने दोस्त और शराब की पुरानी लत... तब उसकी सारी आत्मग्लानि कहीं पीछे रह जाती और हाथ में रह जाता बस गिलास... 

नई शुरुआत की आहट

धीरे-धीरे, मास्टरजी के प्रयासों और मार्गदर्शन से विक्रम अब दो और बच्चों को पढ़ाने लगा है । पहले वह बच्चों के घर जाकर पढ़ाता था पर अब अपने घर में पढ़ाने लगा। 

शाम होते ही चार बच्चे उसकी छोटी-सी बैठकी में आकर बैठ जाते। एक पुराना सा टेबलफैन, दीवार पर टँगी घंटी और टूटी कुर्सी , एक दरी — ये सब मिलकर एक छोटी सी कक्षा बन गई है  जिसमें विक्रम अब सिर्फ छात्र नहीं, शिक्षक भी बन गया है । शुरुआत सिर्फ दो  बच्चे से हुई थी, लेकिन देखते देखते सात बच्चे उससे पढ़ने आने लगे हैं। घर में थोड़ी रहत की लहर आने लगी। 

मास्टरजी कभी-कभी आते और दूर खड़े हो कर मुस्कुरा देते — “देखो, कैसे जिम्मेदारी ने इस लड़के को उम्र से पहले बड़ा बना दिया।”

विक्रम के पास अब कुछ पैसे आने लगे हैं  — बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन इतने तो हो ही जाते हैं कि रमा अब राशन  की दुकान पर जाते हुए आँखें चुराने की ज़रूरत महसूस नहीं करती है।  

जब पहली बार विक्रम ने रमा की हथेली में पंद्रह सौ  रुपये रखकर पैर छुऐ  तो उसकी आँखें भर आईं।

रमा ने उसका माथा चूमा। वह कुछ बोल नहीं सकी, लेकिन उसकी चुप्पी में एक गहरा आशीर्वाद था।

अब हर शाम रमा चाय के साथ विक्रम के लिए एक रोटी ज़रूर रखती — पहले वो अक्सर यह कहते हुए टाल देता था  कि “मुझे भूख नहीं”, लेकिन अब रमा जबरदस्ती खिला देती है उसे पता है  — बेटा सिर्फ किताबें नहीं, ज़िम्मेदारियाँ भी संभाल रहा है।

एक दिन मौली ने धीमे से पूछा — “भैया, आप थकते नहीं क्या?”

विक्रम मुस्कुराया — “थकता हूँ, लेकिन जब माँ बिना रोए सोती है, तो नींद अपने आप आ जाती है।”

गाँव के कुछ लोग अब रमा की तारीफ करने लगे थे — “देखो, बेटे को कैसे सँवारा है… अब वो पढ़ाई भी करता है और बच्चों को पढ़ाता भी है। मोहनलाल कुछ नहीं करता, फिर भी घर में रोशनी है तो उसी लड़के की वजह से।”

रमा ये सब सुनती और भीतर से मजबूत होती जाती। उसे पता है  कि अभी राह आसान नहीं है लेकिन अब जो बीज विक्रम ने बोया है, वह सिर्फ घर की रसोई नहीं, पूरे परिवार के भविष्य को सींचेगा।

खेत की मेड़ पर एक वादा

एक दिन शाम को आसमान में बादल उमड़-घुमड़ कर आने लगे और साथ में हल्की ठंडी हवा चल रही है ऐसे में   विक्रम खेत की मेड़ पर बैठा हुआ है । उसके पास उसकी किताबें हैं  लेकिन वो पढ़ नहीं रहा है। उसकी नज़र सामने फैले खेत पर है —वही खेत जो अब बोझ बनते जा रहे हैं उसके पिता के लिए और उम्मीद है उसके लिए।

रमा खेत की मेड़ पर अकेली बैठी हुई है । हाथ में बीजों की पोटली है  पर मन उलझा हुआ है—इन बीजों से फसल उगेगी या नहीं और ज़िंदगी फिर से संवरेगी  या नहीं।

विक्रम चुपचाप आया और उसके पास बैठ गया।  कुछ देर दोनों चुप रहे। 

“आप बस आशीर्वाद दो माँ… सब ठीक कर दूँगा।”

रमा ने बेटे को देखा — आँखों में ठहराव, ललाट पर पसीने की चमक और चेहरे पर बालपन से अधिक उम्मीद की रेखाएं  हैं। जैसे वो बच्चा नहीं, खेत का कोई बीज हो जो संघर्ष की मिट्टी में जिद से उग आया हो।

“माँ… एक दिन मैं अफसर बनूँगा। और तब… तब हम किसी से उधार नहीं लेंगे। खेत भी हमारा होगा… और इज़्ज़त भी।”

रमा की आँखें छलक आईं पर इस बार उसमें आभार और विश्वास था। रमा ने कुछ नहीं कहा। वो बस उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देती रही और आसमान में चलते-फिरते  बादलों की ओर देखती रही… शायद वहाँ कहीं उसकी दुआ जा रही है अपनी फसल बोने।

दूर कहीं से हल्के सुर में मंदिर की घंटियाँ बज रही हैं  .... और उस क्षण खेत की मेड़ पर बैठा बेटा अपनी माँ के आँसू पोंछ रहा है  मानो वो अपने हिस्से की दुनिया को फिर से बुन रहा हो — कतरा-कतरा  समेटकर।

क्रमशः 

✍️ लेखिका की कलम से

प्रिय पाठकों,

"एक एकड़ से शिखर तक" का छठा अध्याय  “विक्रम का पहला कदम” आपको एक बेटे के पहले संघर्ष, माँ के मौन आंसुओं और एक पिता की खोती चेतना की गहराई तक ले गया।
इस भाग में विक्रम के पहले कदम ने न केवल कहानी की दिशा बदली, बल्कि घर की टूटी दीवारों में एक उम्मीद का दिया भी जलाया।
परन्तु कहानी यहीं थमती नहीं है।

भाग  7 में दृश्य पूरी तरह बदल जाएगा —
यह आप पाठकों के लिए भी एक अप्रत्याशित मोड़ लेकर आएगा।
आपके लिए एक सरप्राइज़  है ! 
पढ़ते रहिए… क्योंकि अगला अध्याय — भाग  7 
आपको बिलकुल ही अलग दुनिया में ले जायेगा

💬 आपको यह कहानी कैसी लगी? आपकी प्रतिक्रिया/ समीक्षा का मुझे इंतज़ार रहेगा। आपकी प्रतिक्रिया, विचार और सुझाव मेरे लिए ऊर्जा का काम करते हैं।
कहानी से जुड़े रहिए, जुड़ाव ही इस यात्रा को सार्थक बनाता है। 
👉 आगे–पीछे के सभी भाग एक साथ यहाँ मिलेंगे - एक एकड़ से शिखर तक
धन्यवाद 🙏
आपकी अपनी 
प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय पोस्ट

हिंदी साहित्य का महत्व: इतिहास, काल विभाजन और आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता