एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 22: रक्षाबंधन की राह

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग  21: तकनीकी दुनिया की दहलीज़ पर पढ़कर शुरुआत करें।

 भाग 22: रक्षाबंधन की राह

मोहनलाल के खेती में हाथ बटांने से घर के हालात बेहतर हो गए हैं।  पुराना  उधार तो विक्रम ने ही ट्यूशन पढ़ा कर उतार दिया था और मोहनलाल और रमा की मेहनत से गिरवी पड़े खेत का ब्याज समय से चला जाता है और फसल बेचकर वे थोड़ा कुछ बचाकर आराम से गुजारा कर रहे हैं।  विक्रम का सारा खर्चा उसकी छात्रवृत्ति के पैसों से और बाकी के लिए वह इंजीनियरिंग  कॉलेज के कर्मचारियों के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर निकाल लेता है।  कुल मिलकर स्थिति संतोषजनक कही जा सकती है।  मौली भी गांव के इकलौते सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़  रही है अब वह बारह वर्ष की हो चुकी है। 

रक्षाबंधन मंगलवार को पड़ रहा है तो कॉलेज  प्रशासन ने छात्रों की सुविधा के लिए  शनिवार से शुक्रवार तक की छुट्टियां घोषित कर दी हैं ताकि अपने घर जाने वाले सभी छात्र आराम से अपने घर जाकर लौट आ सके। इस तरह रक्षाबंधन की इस बार पूरे  एक हफ्ते की छुट्टियां हो रही हैं। रक्षाबंधन से दो दिन पहले विक्रम कॉलेज के पास वाले बाज़ार गया। उसने मौली के लिए एक स्कूल बैग लिया और साथ में एक किताब।  “ प्रेरणादायक कहानियां ” भी खरीदी। उसे मालूम है कि  उसकी प्यारी छोटी सी बहन की पसंद किताबें पढ़ना है। उसने मौली के लिए एक प्यारी सी गुलाबी रंग की मिक्की माउस वाली घडी भी खरीदी। 

बुक शॉप से लौटते वक्त वह मन ही मन मुस्कराया, "इस बार मौली खुश हो जाएगी।"

हॉस्टल में आकर उसने ले जाने वाले बैग में दोनों चीज़ें संभलकर रख दी। 

हॉस्टल के कॉमन लैंडलाइन टेलीफोन पर रात को माँ का फ़ोन आया। माँ किराने वाले मिश्रीलाल की दूकान से फ़ोन कर लेती है। अब वह पैसे चुकाकर फ़ोन करती है गांव में मोहनलाल और रमा का पूर्ववत सम्मान किया जाने लगा है। 

माँ से बात हुई। फोन पर रमा की आवाज़ में एक अलग सी ताजगी है,
“मौली तो रोज़ तेरा नाम लेती है, कहती है इस बार भैया के साथ बैठकर स्कूल की बातें बताऊँगी। तू जल्दी आ जाना, विक्रम। ट्रेन का टिकट तो ले लिया है ना बेटा ?”

विक्रम ने कहा, “माँ, टिकट ले  चुका है। कल सुबह की ट्रेन है। सुबह निकलूंगा, शाम तक गाँव आ जाऊँगा। इस बार मौली के लिए खास तोहफ़ा लाया हूँ।”

फोन कटने के बाद उसने अपनी टेबल पर रखी वो मिक्की माउस वाली गुलाबी रंग की घडी कपड़े के रूमाल में लपेट कर सावधानी से बैग में रख ली।

अगली सुबह विक्रम जल्दी उठ गया। उसकी ट्रेन ठीक आठ बजे है।  वह रोज़ाना की भांति सुबह  5:30 बजे उठा , नित्यकर्म से निवृत्त होकर तैयार हो गया।  हॉस्टल की मेस तो आठ बजे ब्रेकफास्ट देती है तो उसने कल ही कुछ बिस्कुट लेकर रख लिए थे जिनमे से कुछ उसने खा लिए और बाकी सफर के लिए रख लिए और अपने बैग में रख लिए।  बैग को फिर से चेक किया कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया है।  सब कुछ ठीक है टिकट, बैग, पानी की बोतल, और मौली की घडी, किताब, स्कूल बैग सब कुछ रखा हुआ है ।अब उसने बस सात बजे अपने हॉस्टल के गेट से ऑटो लेना है रेलवे स्टेशन जाने के लिए।  

सात बजे सब चेक कर वह अपने रूम में ताला लगाकर निकलने लगा। उसके दोनों रूममेट्स शशांक और विवेक कल रात ही अपने घर जा चुके हैं।  उसका दोस्त आकाश भी कल शाम अपनी दीदी के घर के लिए चला गया है। 

कॉमन हॉल से जब वह गुजर रहा था कि लैंडलाइन की घंटी बजती सुनाई दी।  मेस के एक लड़के रमेश ने लपककर फ़ोन उठाया उसकी ड्यूटी रहती है कि जिस किसी भी छात्र का फ़ोन आये उसे रूम में जाकर बताकर आये। 

रमेश ने चिल्लाकर कहा," विक्रम भैया !"
विक्रम जो अपना पैर कॉमन हॉल से बाहर निकल चूका है सुनकर रुक गया। 
रमेश पुन: बोला, "भैया आपका फ़ोन है। "
"मेरा!" आश्चर्य से कहते हुए विक्रम ने फ़ोन का रिसीवर कान से लगाया। 
कॉल गांव से आया है । उसकी साँस अटक गई।
“हैलो… विक्रम… सुन... मौली… मौली नहीं रही… नदी में… बारिश में बह गई…”
शब्द बिखर गए। फ़ोन का रिसीवर विक्रम के हाथ से गिर पड़ा। रमेश पीछे से आकर आवाज़ दे रहा है," क्या बात हो गयी भैया?"
मेस के कुक भी आकर खड़े हो गए। वो लोग भी विक्रम से पूछने लगे ,"क्या हुआ विक्रम?"

हॉस्टल में जो बचे हुए छात्र हैं वे भी शोर सुनकर इधर ही आ गए।  विक्रम के कानों में मानो आवाज़ें पड़ ही नहीं रही हैं।  एकदम से वो चक्कर खाकर गिरने को हुआ कि रमेश, कुक और अन्य छात्रों ने उसे संभल लिया। जल्दी से किचन से लेकर पानी पिलाया। 

टूटे-फूटे शब्दों में विक्रम ने बताया," मेरी बहन....  मौली...  नदी में बह गई..... " कहते-कहते वह फूट -फूट कर रो पड़ा। 

एक अधेड़ उम्र के कुक जिन्हे सभी छात्र काका कहते हैं उन्होंने उसे संभाला।  दुसरे कुक से कहकर गरम दूध  मांगकर पिलाया , जबरदस्ती करके पिलाया।  विक्रम पीने को तैयार नहीं था। 

काका ने पूछा," विक्रम बेटा ट्रेन कितने बजे की है?"
"आठ बजे की है काका।" सुबकते हुए विक्रम किसी तरह बोला 
काका ने समय देखा 7:20 हो गया है वह तुरंत ही बोले ," चलो मैं तुम्हे अपनी बाइक से छोड़कर आता हूँ। "
"मैं निकलता हूँ ऑटो से चला जाऊँगा काका। " घडी पर नज़र पडते ही विक्रम हड़बड़ाया 
"ऑटो तुम्हे अभी बुलाना पड़ेगा। मैं तुम्हे शॉटकट रास्ते से ले चलता हूँ। जल्दी करो वर्ना ट्रेन छूट जाएगी। "काका ने अधिकारपूर्वक कहा 

विक्रम को काका छोड़ने चले गए।  हॉस्टल में उदासी छ गई विक्रम की बहन मतलब उन सबकी भी बहन... रक्षाबंधन के पावन त्योहार , भाई-बहन के स्नेह बंधन के प्रतीक पर्व पर ऐसी अनहोनी ने सभी के होठों की मुस्कराहट छीन ली।

बरसात और शून्यता

स्टेशन पर विक्रम को ढांढस बँधाकर काका चले गए उन्हें मेस की ड्यूटी भी करनी है। तभी हल्की बारिश शुरु हो गई। विक्रम की आँखें सुन्न पड़ गई हैं।

बादलों से भरे आसमान में राखी का धागा दूर होते जा रहा है।  विक्रम की आंखों में मोती झिलमिलाने लगे हैं जैसे मौली की कोई अधूरी हँसी उसमें समाई हो।

स्टेशन की भीड़ में अकेला खड़ा विक्रम, आकाश की ओर नहीं देख रहा है , किताब को सीने से लगाकर बस एक बात बुदबुदा रहा है,
“मौली... मैं आ रहा हूँ... पर तू... अब कहाँ है?”

बारिश धीमे-धीमे ज़मीन पर गिर रही है... विक्रम की आँखों से आंसू भी बारिश की बूंदों संग नीचे गिरते जा रहे हैं। 

क्रमशः 

मौली के साथ क्या हुआ ? 

जानने के लिए पढ़िए अगला भाग...  भाग 23: वो लौट कर न आई

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