एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 23: वो लौट कर न आई

 अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 22: रक्षाबंधन की राह पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 23: वो लौट कर न आई

ट्रेन की खिड़की से बाहर देखता हुआ विक्रम एक पत्थर-सा हो गया है । ना आँखें झपक रही हैं, होंठ बिल्कुल सिले हुए हैं।  हर स्टेशन पर ट्रेन रुकती, सीटी देती, आगे बढ़ जातीजैसे समय आगे चल रहा हो लेकिन उसका मन वहीं ठहरा हुआ हो।

उसकी जेब में एक कपड़े के  रूमाल में बंधी मौली की घडी अब भी सुरक्षित है... सजधज कर बाँधने के लिए, सहेज कर रखने के लिए… पर अब बाँधने को कलाई नहीं है। किताब है पर पढ़ने वाली जा चुकी है.... अब मुझे घर में मेरी प्यारी बहन नहीं मिलेगी, कभी भी नहीं देख पाउँगा... सोच-सोचकर विक्रम की आँखों में आंसू भरे जा रहे हैं।  बस कैसे ना कैसे जल्दी से मेरा गांव मेरा घर आ जाए। 

गांव का स्टेशन आ गया.... ट्रेन के डिब्बे से निकलते हुए विक्रम के पांव मानो मनो टन भरी हो गए हैं... घिसट-घिसटकर ही वो उतरा।  आगे वही स्टेशन वो ही  पुरानी बेंच दिखाई दी जहां जब वो पहली बार शहर पढ़ाई करने गया था सबने मौली, बाबा, रमा और उसने चाय पी थी।  मौली छोटी थी उसका मुँह जल्दी-जल्दी चाय पीने से जल भी गया था।  

विक्रम से और देखा ना गया।  वह सीधा ही अपने घर की ओर चल पड़ा। 

घर पहुँचते ही विक्रम के बढ़ते कदम सहसा रुक गए। 

माँ सीढ़ियों पर बैठी है , आँखें सूनी, बाल बिखरे, माथे पर लगी बिंदी भी टेढ़ी मेड़ी हुई पड़ी है।  माँ को अपना कुछ भी होश नहीं है। 

मोहनलाल खाट पर चुपचाप पड़ा है आँखें खोले हुए वो शून्य में ताक रहा है। 

विक्रम तेजी से दौड़कर अपनी माँ के पैरों में बैठ गया ,"माँ ये क्या हो गया ? कैसे हो गया ? मेरी मौली कहाँ चली गई?" बोलते-बोलते वो जोर जोर से रोने लगा 

माँ ने विक्रम को अपने सीने से लगा लिया और उसकी भी रुलाई फूट पड़ी। 

मोहनलाल खाट से उठाकर ज़मीन पर उनके पास बैठ गया।  तीनों रोने लगे.... देर तक रोते रहे... 

तभी मास्साब की आवाज़ से उनके रोने का क्रम टूटा...."मोहनलाल सम्भालो खुद को और सबको... "

मास्साब घर से खाना लेकर आए हैं।  विक्रम ने उनको देखा तो उन्होंने उसे गले से लगाकर सांत्वना देने की कोशिश की और इस प्रयास में उनकी आँखों से भी आंसू बह निकले। 

 मास्साब ने जबरदस्ती उन लोगों को खाना खिलाया।  तब तक कुछ और पडोसी लोग भी आ गए।  उन्होंने भी परिवार को ढांढस बँधाया।  

पड़ोसियों ने जो बताया, वह विक्रम के भीतर एक तूफ़ान ले आया।  
“वो रोज़ स्कूल जाने से पहले  नदी किनारे उगे फूल लेकर आती थी और आज  भी वही लेने गई थी।  कई दिनों से मूसलाधार बारिश हो रही थी, माँ ने मना  भी किया तो उसने कहा कि बस अभी लेकर आती हूॅं। आज भैया आ रहा है उसके लिए गुलदस्ता बनाऊँगी। बारिश ज़्यादा हो गई आज... वही पुरानी पत्थर की चट्टान पर मौली खड़ी थी। अचानक पानी का बहाव तेज़ हुआ, मौली का पैर फिसला...और देखते ही देखते वो नदी बह गई।  नदी किनारे के कुछ तैराक कूदे भी पानी में और बाद में पुलिस ने भी नदी के पानी में जगह जगह तैराक उतरवाए पर मौली का कुछ पता नहीं चला।”

पड़ोसियों ने आगे बताया,
“हमने नाव से भी तलाश किया , पुलिस भी आई... लेकिन जो मिला वो सिर्फ़ उसका दुपट्टा एक बहते पेड़ की टहनी से उलझा हुआ मिला  ... और एक चप्पल किनारे पर पड़ी हुई मिली।”

विक्रम कुछ नहीं बोला। उसका चेहरा बिलकुल शांत है लेकिन उस शांति में समंदर की लहरें लहराने लगी हैं। 

रात आई और परिवार में किसी की आँखों में नींद का सवाल ही नहीं है।  आँखें दरवाज़े पर लगी है की कही से बस मौली की कोई खबर आ जाए या मौली ही भागती आ जाए। पर कहाँ ऐसा हुआ ... रात आँखों ही आँखों में काट गई।

अगले दिन भी ऐसे ही बीता मौली की कोई खबर नहीं आई।  इंस्पेक्टर साहब ने आकर कहा," मौली जिस समय नदी में गिरी और बह गई उस समय नदी का बहाव बहुत तेज था। हमने सभी संभावित तरीकों से उसकी तलाश की परन्तु  उसका कहीं  पता नहीं चला।  हमें लगता है वह अब बहकर आगे चली गई और इतने वक़्त में हमें आगे से भी कोई खबर नहीं मिली है तो इतने समय तक पानी में रहने पर उसके जीवित बचने की सम्भावना नहीं के बराबर है।"

घर में सभी शोक पीड़ित हैं इंस्पेक्टर की बातों से रही-सही आशा भी जाती रही। 

अगले दिन रक्षाबंधन है। गांव के हर घर में बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बाँध रहीं हैं हालाँकि मौली के बह जाने की वजह से सभी बिना किसी ख़ुशी या उत्साह के यह त्योहार मना रहे हैं पर रिवाज़ के लिए  मिठाई बन रही है लोगों के आँगन सजे हैं।  दूर-दराज़ की बेटियां अपने ससुराल से भाइयों के राखी बाँधने आई हैं परन्तु जिसे भी मौली के बारे में पता चलता वो ठंडी सांस भरकर दुखी हो जाती।  

आज विक्रम के घर में कोई दीपक नहीं जला।  कोई पूजा नहीं हुई। 

उसने अपनी जेब से वो घड़ी, किताब और स्कूल बैग  निकाला, वही जो बाजार से लाया था अपनी प्यारी बहन के लिए और मौली के बॉक्स पर रख दिया।  थोड़ी देर बाद  उठाकर वो यह सब कुछ फेंकने चला तो रमा ने उसका हाथ पकड़ लिया। 

रमा ने उसकी ओर देखा नहीं। बस धीमे से एक राखी बांधते हुए कहा, “वो तुझसे बहुत प्यार करती थी, विक्रम... बहुत प्यार।  ये वाली राखी वो चुनकर ले थी तेरे लिए। "

 बड़े बड़े फूल वाली जिसमे बीच में एक कलश बना है बहुत ही सुंदर रेशम की डोरी की राखी अब विक्रम के हाथों में बंधी है। विक्रम राखी को सहलाते हुए रो पड़ा मानो मौली को ही छू रहा हो। वह जानता है ये बंधन अब मौली की स्मृति का संकल्प है।

रमा ने विक्रम के लाये सभी उपहारों को मौली के बक्से में संभल कर रख दिया। 

अगले दिन  गांव के मंदिर में एक दीप जलाया गया। नदी के तट पर लोग फूल लेकर पहुँचे। पुजारी ने मौन प्रार्थना करवाई।
“जहां कहीं हो, मौली की आत्मा को शांति मिले।”

विक्रम ने नदी की ओर देखा....वही चट्टान, वही बहाव।.... लेकिन अब चट्टान खाली है.... और नदी अभी भी शांत नहीं है.... उसके भीतर मौली की एक अधूरी कविता गूंज रही है जो वह ठुमकठुमक कर सुनाया करती थी। ।

रात को विक्रम ने अपनी डायरी खोली और लिखा,
“रक्षाबंधन पर तू चली गई हम सबसे दूर हमेशा के लिए... माँ ने तेरी राखी बाँधी है वो राखी नहीं मेरा वादा है तुझसे मौली.....अब तू मुझे दिखाई नहीं देगी लेकिन तेरी बातों में मैं तुझसे मिलता रहूँगा। तेरे लिए पढ़ रहा हूँ अब तेरे नाम से पढ़ाऊँगा। तू बह गई, पर तेरा सपना अभी भी मेरी आँखों में जिंदा है।”

कमरे की टेबल पर मौली की एक तस्वीर रखी है। उसके सामने जली एक बाती की लौ और उसके बगल में राखी।

बाहर बारिश अभी भी धीमे-धीमे गिर रही है.....

क्रमशः 

आगे क्या होता है, क्या विक्रम मौली को ढूंढ पाने में सफल होता है ?
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 24: मौन में मिशन की शुरुआत
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