एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 26: कॉर्पोरेट की चौखट, देसी दिल

 अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 25: मुकाम और भविष्य पढ़कर शुरुआत करें। 

भाग 26: कॉर्पोरेट की चौखट, देसी दिल

इंजीनियरिंग कॉलेज का वो आख़िरी दिन...

वो दिन, जब कॉलेज का सभागार आखिरी बार सुपर 8  की साझा हँसी से गूंजा था, एक अजीब-सी खामोशी में बदल गया है। कैम्पस के पेड़ अब भी वहीं खड़े हैं  और दूर कहीं चिड़ियां भी चहचहा रही हैं  लेकिन हवा में विदाई की नमी घुली हुई है। एक-एक करके हॉस्टल के कमरे खाली हो रहे हैं लेकिन दिल भरे हुए हैं यादों, वादों और अधूरे सपनों से... 

विक्रम, एक ओर खड़ा है हाथ में कंपनी का ऑफर लेटर और दिल में मौली की राखी की गरमाहट।
आकाश ने उसके गले लगते हुए कहा, “अब बस बातों से नहीं, काम से गांव बदलेंगे।”
प्रिया की आँखों में नमी है  लेकिन मुस्कान में उम्मीद है।
रागिनी, जो आमतौर पर शांत रहती है , ने पहली बार सबके सामने कहा, “हम सब अब अलग पन्नों पर होंगे, पर एक ही किताब में रहेंगे।”
शशांक और विवेक ने फिर से वही पुराना डायलॉग दोहराया, “हम दोस्त हैं, ये तो केवल ब्रेक है, एंड नहीं।”
राशि और हर्षिता, जिन्होंने हमेशा साथ बैठकर प्रोजेक्ट्स बनाए, एक-दूसरे को गले लगाकर सिर्फ इतना कह पाईं, “दिल्ली आओगे ना सभी लोग ?”
उनका सुपर 8 ग्रुप, जो कभी साथ बैठकर चाय के कप के साथ दुनिया के प्लान बनाता था आज उसी दुनिया की ओर अपने-अपने रास्तों से निकल रहा है।

नया परचम: पहली नौकरी का प्रणबद्ध उद्घोष

सुबह की ठंडी हवा में पुणे की गलियाँ धीरे-धीरे जाग रही हैं । सड़कों पर तेज़ क़दमों की आहट है , कैब के हॉर्न और ऑफिस बैग्स में झाँकते लैपटॉप्स की भागती दुनिया में ऑफिस की ओर तेज़ क़दमों से बढ़ते लोगों के बीच कुछ धीमी गति से चलता हुआ  एक भावहीन  लेकिन आत्मविश्वासी चेहरा है विक्रम चौधरी का... पहली नौकरी का पहला दिन।

उसकी मंज़िल है एडूवर्स ग्लोबल, एक ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनी जो शिक्षा और तकनीक को जोड़ने का काम करती है। हालाँकि विक्रम ने अपनी इंटर्नशिप भी इसी कंपनी में की है परन्तु आज वह एक एम्प्लोयी की हैसियत से ज्वाइन करने जा रहा है। 

विक्रम के कंधे पर लैपटॉप बैग है लेकिन उसके भीतर एक और भार है.... एक सपना, जो अब वास्तविकता बन चुका था, और एक नाम जो अब भी दिल की गहराइयों में धड़क रहा है —मौली का इसकी प्यारी सी छोटी बहन जो बारह वर्ष की नन्ही सी उम्र में कही दूर बहुत दूर चली गई कभी वापस ना आने के लिए... मौली का नदी में बह जाना और फिर एक बड़ा शून्य , एक सन्नाटा उसके बाद का .... विक्रम को अंदर तक हिला डालता है अभी बारिश जब तेज होती है उसका मन उदास हो उठता है ... ऐसी ही एक तेज मूसलाधार बारिश में वह नदी में बह गई थी ... विक्रम का दिल आज भी अपनी बहन के लिए ज़ार-ज़ार रोता है।  प्रिया जो उसकी बैचमेट है अब उसकी राखी बहन बन चुकी है। माँ बाबा गांव में हैं जब कभी गांव जाना हुआ तब तब माँ बाबा की हालत मॉल के जाने के बाद देखकर विक्रम ने सोचा है कि एक बार नौकरी कुछ महीने करके सेटल हो जाये तो माँ बाबा को यही अपने पास बुला लेगा।  इन्ही सब विचारों से घिरा विक्रम कब एडूवर्स ग्लोबल आ पहुंचा उसे पता ही नहीं चला। 

एडूवर्स ग्लोबल का तकनीकी केंद्र पुणे के एक बड़े सूचना प्रौद्योगिकी परिसर में स्थित है। चारों तरफ़ शीशे की ऊँची इमारतें, कार्ड स्वाइप कर खुलते द्वार और भीतर तेज़, सधे हुए, प्रोफेशनल लहजे में बात करने वाले लोग। यह एक खूबसूरत दुनिया है काम में लगे लोगों की। 

पहले दिन परिचय सत्र में, एचआर अधिकारी ने कहा,
“हम केवल सॉफ़्टवेयर नहीं बनाते, हम भविष्य गढ़ते हैं।”

विक्रम को जिस विभाग में स्थान मिला वह है सामाजिक समाधान इकाई... और उसकी नियुक्ति हुई है - एसोसिएट इनोवेशन इंजीनियर की पोस्ट पर....यहाँ तकनीक को समाज के विकास के लिए प्रयोग में लाया जाता है ।

उसके मार्गदर्शन के लिए जो वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त हुईं, उनका नाम है  रीमा डिसूज़ा, एक आत्मविश्वासी, संवेदनशील और अनुभवशाली महिला

पहली ही मुलाक़ात में उन्होंने कहा,
“विक्रम, मैंने तुम्हारा सरकारी स्कूलों पर बना प्रोजेक्ट देखा है... बहुत प्रभावशाली काम है लेकिन यहाँ हम केवल मॉडल नहीं बनाते, हम ऐसे विचार गढ़ते हैं जो नीति में बदल जाएं।”

ये शब्द जैसे उसके भीतर एक नई ऊर्जा जगा गए।पहले दिन विक्रम ने रीमा मैम से अपने लिए निर्धारित कार्य समझा। 

रात को गांव में किराने वाले मिश्रीलाल काका की दूकान पर फ़ोन से माँ से बात की।  बाबा भी आ गए बात करने। 
"प्रणाम माँ , प्रणाम बाबा!"
"कैसे हो विक्रम , नौकरी पर पहला दिन कैसा रहा ?"
"माँ बाबा सब अच्छा रहा।  आज उन्होंने काम समझाया और सभी लोगों से मिलवाया है।  कल से काम शुरु हो जायेगा।"
"ठीक है बेटा। सब अच्छा होगा। मन लगाकर काम करना और अपने खाने-पीने का ध्यान रखना।"
"रखता हूँ माँ , अभी कुछ खाने के लिए  लेकर आऊँगा बाहर से। कल से सामान खरीदकर खुद बनाउँगा। "
"ध्यान रखना विक्रम। "

अगले दिन से विक्रम का कार्य द्रुत गति से प्रारम्भ हो गया। दिन भर प्रशिक्षण, मीटिंग्स , तकनीकी सेशन और योजनाओं की तैयारी चलती। हर काम समयबद्ध, हर प्रोजेक्ट लक्षित। साथ में काम करने वाले सहयोगी ज़रूर विनम्र थे, लेकिन संबंध सीमित थे जैसे भावना का स्थान वहाँ फॉर्मेट में होता हो। टीम में साथी अच्छे हैं , प्रोफेशनल हैं  लेकिन रिश्ते वहाँ एक्सेल शीट से आगे नहीं बढ़ते हैं।

शाम को जब वह अपने वन-रूम फ्लैट में लौटता, वहाँ बस सन्नाटा होता।
वो सन्नाटा जो मौन से नहीं, किसी की अनुपस्थिति से बना होता है।
विक्रम की मेज़ पर आज भी मौली की एक तस्वीर है जिसमें वह स्कूल यूनिफॉर्म में मुस्कुराते हुए विक्रम की ओर देख रही है।
माँ का फोन आता है। घंटी बजती है, विक्रम फ़ोन उठाकर बात करता है 
“हाँ माँ, सब ठीक है।”
“हाँ बेटा, यहाँ भी सब ठीक है…”
(इसके बाद दोनों तरफ़ चुप्पी...)
अब बातों में मौली नहीं आती।
अब बातों में वो मिठास नहीं आती।
अब फोन पर बस दो ‘ठीक’ मिलते हैं—जिनमें कुछ भी ठीक नहीं होता। 
हाँ एक चीज़ जो ठीक हो रही है वो है विक्रम की आर्थिक स्थिति और अब वो माँ बाबा से अपने साथ शहर रहने की बात कहने लगा है जिसपर उन्होंने अगले छह महीने बाद देखेंगे कहकर अभी बात टाल दी है। 

क्रमशः 

आगे क्या होता है?
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 27 सुपर 8- पुराने पन्नों की आवाज़

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