एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 27: सुपर 8 - पुराने पन्नों की आवाज़
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 26: कॉर्पोरेट की चौखट, देसी दिल पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 27: सुपर 8 - पुराने पन्नों की आवाज़
मार्गदर्शन और मिशन
एडूवर्स ग्लोबल की सामाजिक समाधान इकाई में काम करते हुए विक्रम को तकनीक की दुनिया में एक नया दृष्टिकोण मिला और वो था सिर्फ़ कोडिंग या ऐप बनाना ही नहीं, बल्कि उससे समाज के सबसे ज़रूरी हिस्सों तक पहुँचना।
रीमा मैम, जो उसकी मार्गदर्शक हैं , केवल एक सीनियर नहीं, बल्कि एक प्रेरक व्यक्तित्व हैं । उन्होंने विक्रम को तकनीक के मानवीय पक्ष से जोड़ा। रीमा मैम के साथ काम करते हुए विक्रम ने जाना कि कैसे तकनीक को सही दिशा में प्रयोग कर समाज में ठोस बदलाव लाया जा सकता है।
एक दिन वह उसे एक वर्कशॉप में ले गईं, जहाँ देशभर से आए सरकारी स्कूलों के प्रधानाचार्य, कंपनी की "स्मार्ट विश्लेषण डैशबोर्ड" प्रणाली को देखने पहुँचे हुए हैं । यह प्रणाली छात्रों की उपस्थिति, प्रदर्शन, शिक्षक इंटरवेंशन और संसाधनों की उपलब्धता को मापने वाली अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी है ।
“अपनी जड़ों को मत भूलना विक्रम। कंपनी तुम्हें प्रोफेशनलिज़्म सिखाएगी, लेकिन तुम्हारा गांव तुम्हें उद्देश्य दे चुका है। वही तुम्हारी असली ताक़त है।”
विक्रम को जैसे भीतर से झटका सा लगा। उसे समझ में आ गया कि अब उसका काम सिर्फ नौकरी नहीं, एक मिशन है... गांव के उन बच्चों तक रोशनी पहुँचाना, जो अब भी अंधेरे में पढ़ने को मजबूर हैं।
“तकनीक जो हृदय को न छू सके, वह केवल मशीन होती है। जो दिलों को छूती है, वही मिशन बनती है।”
हर शनिवार, विक्रम अपने लैपटॉप के कैमरे के सामने बैठता और वीडियो कॉल के ज़रिए ‘मौली क्लास’ के बच्चों से जुड़ता।
कोई विज्ञान का सवाल पूछता, कोई नई कविता सुनाता, कोई मौली की कहानी दोहराने को कहता।
विक्रम मुस्कुराकर कहता,
“मौली ने कहा था कि चाहे स्कूल की छत ना हो, लेकिन सपनों की उड़ान होनी चाहिए।”
इन बच्चों की मुस्कान में, वह मौली को फिर से ज़िंदा देखता है।
एक शाम – पुणे की ऊँचाई और गांव की छाया
‘भैया, एक दिन हमें भी ऐसा स्कूल चाहिए जहाँ सबके लिए लाइट जलती हो...भैया, हमें भी एक दिन ऐसा स्कूल चाहिए जहाँ हर बच्चे की आँखों में बिजली की चमक हो।”
उसकी डायरी में अब भी मौली की वो राखी रखी हुई है जो उसने उसके शहर पहली बार जाने के समय बाँधी थी... हर दिन उसे याद दिलाती है,
“भैया आप अकेले नहीं हैं और कभी होंगे भी नहीं।”
“तुम अब भी दिल से सोचते हो, यही तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त है।”
“हाँ मैम, क्योंकि गांव में हम दिल से सोचते है , यहां हम दिमाग़ से काम करते हैं और शायद इन्हीं दोनों के बीच मेरा सपना पलता है।”
पीछे तेज़ रफ्तार शहर, पीछे चमकता पुणे शहर लेकिन विक्रम की आँखों में बस गांव की वो धूल भरी दोपहर और मौली की चमकती आँखें हैं और उसकी आँखों में केवल एक सपना... गांव में पढ़ने वाले बच्चों की मुस्कुराहट।
सपनों का भार और रिश्तों की गूंज
“मंज़िल की रोशनी में अगर जड़ें मिट्टी से जुड़ी रहें, तो राहें कभी खोती नहीं।”
डायरी की आख़िरी लाइन लिखकर उसने कलम रख दी। वह बालकनी में आ खड़ा हुआ, जहाँ हल्की हवा चल रही है... एक ऐसी हवा जो अतीत के किसी कोने से आई लगती है ।
रात के अंधेरे में भी वो फोटो जैसे चमक रही है... आकाश की हँसी, प्रिया की सादगीपूर्ण मुस्कान, रागिनी की गंभीर आँखें, शशांक का कंधे पर हाथ रखना, विवेक का हमेशा उत्साहित चेहरा, राशि और हर्षिता की हँसी से भरी चहक… और बीच में खड़ा विक्रम, अब से कुछ समय पहले का, उस वक्त का जब जीवन बिल्कुल सीधा लगता था।
वह फोटो देखने के बाद उसने फोन उठाया....एक ग्रुप चैट खोली… नाम है "Super 8 – Hostel to Horizon" (सुपर 8 –हॉस्टल टु होराइजन)
उसने कुछ लिखा…शब्दों को टाइप किया… फिर मिटा दिया।
कभी कभी सुपर 8 के दोस्तों की बातें हो जाया करती हैं। सभी अलग अलग शहर में काम कर रहे हैं।
पुराने पन्नों की आवाज़
इसी तरह काम करते करते विक्रम को एक साल पूरा हो गया। माँ बाबा अभी भी भी गांव में हैं उनके पास एक ना एक बहाना मौजूद रहता है शहर नहीं आने का।
विक्रम के मन में आज एक लहर चल चुकी है... रिश्तों की विरासत, जो अब शायद फिर से पुकार रही है।पुणे की सुबह अपनी तेज़ रफ्तार में आँखें खोल रही है। लोग काम पर निकल चुके हैं, कॉर्पोरेट टॉवर्स के नीचे की सड़कें व्यस्त हैं, कैब्स की लाइनें चल रही हैं। मगर एक खिड़की है, जहां सुबह की रोशनी कुछ अलग ढंग से दस्तक देती है... विक्रम चौधरी के कमरे की खिड़की।
और तस्वीर में वो आठ चेहरे...सुपर 8, वो मुस्कराहटें जो किसी परीक्षा के बाद ली गई फोटो में नहीं थीं, बल्कि उन रातों की थीं जब दोस्ती बिना शर्त हुआ करती थी।
विक्रम कुछ देर उस तस्वीर को देखता रहा।
फिर मोबाइल उठाया, व्हाट्सएप खोला....ग्रुप चैट: “सुपर 8 –हॉस्टल टु होराइजन”
फिर उसने टाइप किया....
“आज शाम 8 बजे वीडियो कॉल, सब जुड़ो ना यार…?”
कुछ ही सेकंड्स में सबकी प्रतिक्रियाएं आने लगीं.....
“Finally! चलो बहुत दिन हो गए।”, आकाश
“8 बजे तक सब काम खत्म करके जुड़ती हूँ।”, प्रिया
“मैं ऑफिस से जल्दी निकल लूंगा।”, विवेक
“दिल्ली की गर्मी में भी यह खबर ठंडी हवा जैसी है।”, राशि
“मैं भी जुड़ता हूँ शाम आठ बजे पक्का !”, शशांक
“हमेशा की तरह मैं सबके लिए चाय बना लूंगी।”, रागिनी
“वर्चुअल चाय ! हाहाहा ”, हर्षिता
पढ़कर विक्रम मुस्कुराया.... प्रसन्नचित्त वह काम पर निकल पड़ा। आज शुक्रवार की शाम वापस से कुछ अद्भुत होने वाली है। सुबह से ही शाम का इंतज़ार होने लगा है।
क्रमशः
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 28: सुपर 8 – अलग शहर, एक दिल
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