एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 28: सुपर 8 – अलग शहर, एक दिल
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भाग 28: सुपर 8 – अलग शहर, एक दिल
मुंबई – सपनों की भीड़ में तीन मुस्कराते चेहरे
मुंबई में सुबह जल्दी शुरु होती है और थमती नहीं है। आकाश, प्रिया और रागिनी, अब मुंबई की भीड़भाड़ वाली गलियों में हैं लेकिन वे भीड़ में खोए नहीं, अपनी-अपनी राहें बना रहे हैं।
आकाश एक प्रमुख एनजीओ में “कंटेंट एंड लर्निंग हेड” का पद संभालते हुए, आकाश गाँव के बच्चों के लिए डिजिटल शिक्षा के नए मॉड्यूल तैयार कर रहा था। वह अब भी यकीन करता है कि "ज्ञान बाँटना सबसे बड़ा धर्म है।" वह गाँवों के बच्चों के लिए शिक्षण सामग्री तैयार करता है... शब्दों में संवेदना भरता है। वह अब भी गाँव के बच्चों की आंखों में भविष्य ढूँढता है।
प्रिया, एक मल्टीनेशनल में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी सलाहकार (सीएसआर (CSR) कंसल्टेंट) बन चुकी है, कॉरपोरेट की चमक-दमक के पीछे समाज के गहराई में काम करने वाली योजनाओं की डिज़ाइनर लेकिन हर पॉलिसी के पीछे उसके मन में मौली की तस्वीर होती है, “क्या हर लड़की पढ़ पाएगी?” प्रिया सामाजिक बदलाव के नीतिगत प्रस्ताव बनती है। उसके लिए हर रिपोर्ट में मौली के सवालों की परछाई होती, "भैया, क्या सब पढ़ पाएँगे?" वो अभी भी सोचती है, “क्या मैं वो कर रही हूँ जो मौली को चाहिए था? जो गांव के बच्चों को चाहिए?”
मुंबई की ट्रेन में सफ़र करते हुए वे तीनों कभी एक ही स्टेशन से चढ़ते हैं अब ज़िंदगी की अलग-अलग पटरियों पर सफर कर रहे हैं लेकिन आज शाम 8 बजे वे फिर एक ही डिब्बे में मिलने वाले हैं... डिजिटल प्लेटफॉर्म पर
बैंगलोर – टेक्नोलॉजी की नगरी, दो दोस्त और एक विज़न
बैंगलोर में तकनीक और जज़्बात साथ चल रहे हैं।शशांक, अब एक टेक लीड है। बड़े डेटा प्रोजेक्ट्स पर काम करता है, अब ग्राहकों की सोच पढ़ने के लिए कोड की लाइनें लिखता है। लेकिन हर मीटिंग के बाद जब अकेला बैठता है, तो विक्रम की कॉफी पर दी गई सलाहें याद आती हैं। डेटा एनालिटिक्स का टेक लीड बनकर शशांक अब ग्राहकों के बिहेवियर की रिपोर्ट्स बनाता है लेकिन जब भी कोडिंग में थकता, वो बेमतलब की बातें करने वाला हॉस्टल का कोना याद आता।
विवेक, अब एक स्टार्टअप कोऑर्डिनेटर है। अभी भी अपने तेज़ आइडियाज़ और पॉज़िटिविटी के लिए जाना जाता है। स्टार्टअप कोऑर्डिनेटर बनकर नए इनोवेशन हब्स से जुड़ा है लेकिन हर पिच में कहीं न कहीं गांव की ज़रूरतें झलक जातीं। नए विचारों को व्यवसाय में बदलता है, लेकिन हर इनोवेशन के पीछे गांव ही प्रेरणा होती है। वह अक्सर रात को अपने ऑफिस से छत पर निकल आता है और आसमान देखकर मौली के स्कूल के लिए एक नई ऐप बनाने के सपने देखता है।
दिल्ली – शक्ति और सृजन की राजधानी
दिल्ली, जहां दौड़ है, पर दृष्टिकोण भी है।राशि और हर्षिता, दोनों अब महिला सशक्तिकरण के सरकारी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं।
वे अक्सर खुद को “डिजिटल दीदी” कहती हैं जो गाँव की लड़कियों को तकनीक से जोड़ने का काम कर रही हैं। वो गाँव की महिलाओं को डिजिटल दुनिया से जोड़ने में लगी हैं। वे केवल कोडिंग नहीं सिखा रहीं बल्कि आत्मनिर्भरता की भाषा पढ़ा रही हैं।
सरकारी योजनाओं के तहत महिला टेक्नोलॉजी ट्रेनिंग प्रोजेक्ट्स में लगी दोनों सहेलियाँ अब गाँव की महिलाओं को ऐप्स और डिजिटल लिटरेसी सिखा रही थीं। उनके पास फंडिंग, मीटिंग्स और प्रेजेंटेशंस का ढेर है लेकिन जब कभी फ़ोन की गैलरी में पुरानी तस्वीरें देखती हैं तो याद आता है हॉस्टल का वो कमरा जिसमें रिश्तों की कमी कभी नहीं रही।
और पुणे... एक कमरा, एक तस्वीर, और अनगिनत धड़कनें
विक्रम, अपने फ्लैट के उस शांत कोने में बैठा है, जहाँ एक दीवार पर दो फ्रेम टंगी हैं।
ऊपर वाली मौली की तस्वीर: मुस्कुराती, मासूम, और अब भी प्रेरणादायक।
नीचे वाली सुपर 8 की ग्रुप फोटो: सबके चेहरे खिलखिला रहे हैं, समय की धूल से थोड़े धुंधले, लेकिन आत्मीयता से चमकते हुए।
उस दीवार पर एक हाथ से बने पोस्टर में लिखा है,
“एक गाँव, एक सपना, एक मिशन”
उसकी आँखें जब भी थक जाती हैं, वो दीवार उसकी मानो रोशनी बन जाती है।
शाम 8 बजे – सुपर 8 की वर्चुअल मीटिंग
स्क्रीन पर आठ फ्रेम खुलते हैं। आठ चेहरों की अलग-अलग पृष्ठभूमियां , चार अलग-अलग शहर मुंबई, बैंगलोर, दिल्ली और पुणे लेकिन एक जैसा अपनापन।
मुस्कुराते, चमकते और आँखों में कुछ अधूरी बातें लिए उत्सुक सुपर 8
सबसे पहले हँसी की लहर उठती है।
रागिनी: “विवेक आज भी वैसा ही है बिना प्लानिंग के पूरी ज़िंदगी प्लान कर देता है!”
विवेक: “कम से कम मैं अब बिना पूछे सबका खाना नहीं खाता!”
आकाश: “और प्रिया… अब भी सबसे ज़्यादा सीरियस लगती है।”
सब हँस पड़ते हैं।
फिर थोड़ा रुककर एक चुप्पी ढलान से उतरती है इनके बीच सभी एक दूसरे को देखते हैं।
राशि पूछती है: “क्या हम सच में बदल गए हैं?”
कुछ सेकेंड का मौन… फिर विक्रम कहता है,
“हम बड़े हो गए हैं… पर बदलना और बड़ा होना दो अलग चीज़ें हैं।”
सब उसकी बात से सहमत होते हैं।
आकाश: "लगता है सच में बड़े हो गए हम सब..."
विवेक: "या शायद बड़े दिखने का ढोंग कर रहे हैं!"
प्रिया: "बड़े होने का पहला लक्षण यही तो है... भीतर से बच्चे रह जाना।"
हर्षिता:" वो तो हम सब में मौज़ूद है ही!:
यादों के पन्ने खुलते हैं....
शशांक बताता है, “बैंगलोर की सुबहें तो सन्नाटे जैसी होती हैं लेकिन कभी-कभी तुम्हारी शोर मचाती हँसी याद आती है, आकाश।”
रागिनी जोड़ती है, “यूआई डिज़ाइन बनाते वक्त अब भी वो हॉस्टल का नोटिस बोर्ड याद आता है जहाँ सबके शेड्यूल चिपकाए जाते थे।”
हर्षिता: “दिल्ली की दौड़ में जब थक जाते हैं, तो मौली की वो कविता की डायरी आँखों में उतर आती है।”
प्रिया कुछ पल शांत रहती है, फिर विक्रम की तरफ़ देखकर कहती है, “कभी लगता है, तुम अब भी उसी पुराने कमरे में बैठे हो... राखी को किताब में सहेजे, मौली की आवाज़ में खुद को ढूँढते हुए।
आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग...
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