खुदगर्ज़ रेखा - लघु कथा

खुदगर्ज़ रेखा 

जीवन में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिन्हें लेने से पहले इंसान कई बार खुद से लड़ता है। खासकर तब, जब वह दूसरों के लिए जीते-जीते खुद को भूल चुका हो। यह कहानी है रेखा की...एक ऐसी बेटी की जिसने हमेशा अपने परिवार को प्राथमिकता दी लेकिन जब उसने अपने लिए एक कदम बढ़ाया तो उसे “खुदगर्ज़” कह दिया गया।

कभी कभी जब कोई सीधा व्यक्ति अपने लिए सोचने लगता है तब वो  स्वार्थी करार दिया जाता है उन्हीं अपनों के द्वारा जिनके लिए उसने अपनी ज़िंदगी होम कर दी। यह लघु कथा उन्हीं खोखले रिश्तों पर प्रहार करती है। 

लघु कथा खुदगर्ज़ रेखा का हिंदी पोस्टर
खुदगर्ज़ रेखा - पारिवारिक रिश्तों में छिपे स्वार्थ को उजागर करती लघु कथा 

लघु कथा - सामाजिक लघु कथा 

"रेखा, इस महीने खर्चा ज्यादा है। मोहिनी की शादी है, राहुल की इंजीनियरिंग की फीस जानी है।"
मोहिनी की शादी के लिए रेखा ने जीपीएफ से लोन ले लिया।
लोन की क़िस्त चुकाने में एक तिहाई तनख़्वाह चली जाती, बाक़ी राहुल की पढ़ाई, घर खर्च में। पिता की मृत्यु के बाद से ही रेखा अपने फ़र्ज़ निभा रही थी। 
राहुल की नौकरी लगते ही उसने सहपाठी सुधा से शादी के लिए कहा। माँ ने करवा दी। 
बालसखा सुमित का फ़ोन आया, "मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ। "
रेखा ने हाँ कर दी। 
शादी करते ही सबने रेखा को खुदगर्ज़ करार दिया। 

मन की बात 

एक बेटी, जो सालों तक अपने परिवार के लिए सब कुछ त्यागती रही…
क्या उसे अपने लिए एक फैसला लेने का अधिकार नहीं?
क्या अपने जीवन की खुशी चुनना “खुदगर्ज़ी” है या फिर समाज की सोच ही कहीं न कहीं स्वार्थी है?
एक बेटी और उसके इर्द-गिर्द स्वार्थी रिश्ते .... क्या रेखा ने अपने लिए कुछ सोचकर जुर्म किया?

आपकी राय

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- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'  

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