एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 34: गुमनाम नेटवर्क, गूंजती आवाज़

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग  33: अनजान कॉल, अनसुलझे सवाल पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 34: गुमनाम नेटवर्क, गूंजती आवाज़

“टॉर एक ऐसा ब्राउज़र जो किसी की लोकेशन या पहचान को छुपाने के लिए बनाया गया है । Tor ब्राउज़र - यह एक ऐसा ब्राउज़र है जिसमें  यूज़र की  लोकेशन, पहचान और ब्राउज़िंग पूरी तरह गोपनीय रहती है। डेटा कई लेयर से होकर गुजरता है, जैसे प्याज़ की परतें। इसलिए इसे "द ओनियन राउटर" (The Onion Router) कहा जाता है - संक्षेप में Tor... इसमें हर सर्वर अगले सर्वर की जानकारी नहीं रखता, जिससे असली पहचान छुपी रह जाती है।” प्रिया ने कहा

“मतलब जो भी कॉल कर रहा है, वो बहुत जानकार है।” विक्रम सोच में पड़ गया 
“या… बहुत कुछ छुपाना चाहता है।” आकाश बोला 
आस्था ने पूछा,
“तो अब हमारे पास कोई रास्ता है?

“मैंने एक टूल का इस्तेमाल किया है जिससे नेटवर्क रूट ट्रेस किया जा सकता है। लेकिन इसमें कई ब्लाइंड स्पॉट हैं - डेटा लॉग पूरी तरह क्लियर कर दिया गया है, शायद जानबूझकर। यानी जो भी था, वो बहुत सावधानी से आया था… और छुप गया। ये सिर्फ ब्लाइंड स्पॉट नहीं, ये एक सुनियोजित परतों की घेरा है।” प्रिया  ने बताया  

आकाश ने बीच में जोड़ा,“डीएनएस लीक्स भी देखें क्या?”
आस्था ने उसकी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा।
“डीएनएस (DNS) लीक – डोमेन नेम सिस्टम  लीक से जुड़ा डेटा अगर सही ढंग से एन्क्रिप्ट न हो, तो वो यूज़र की असली लोकेशन बता सकता है - अगर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) इस्तेमाल हो फिर भी डीएनएस लीक से लोकेशन मालूम चल सकती है। ”

प्रिया मुस्कुराई, “सही कहा आकाश। मैंने डीएनएस ट्रैफिक को मॉनिटर किया है, और एक बार... एक सिग्नल राजस्थान-मध्यप्रदेश बॉर्डर के पास  से पिंग हुआ था… लेकिन उसके बाद सब गायब।”

विक्रम चौंका, “राजस्थान?”

प्रिया ने सिस्टम खोलते हुए कहा, “मैंने नेटवर्क का ट्रेस फिर से खींचा। एक बार लोकेशन राजस्थान-मध्यप्रदेश बॉर्डर के पास पिंग हुई… लेकिन उसके बाद सब गायब।”

विक्रम सिहर गया... उसका मन उस पल में चला गया, जब मौली ने बचपन में कहा था, “भैया, एक बार मुझे भी राजस्थान की रेत में दौड़ लगानी है। देखना है कि मैं चल भी पाती  हूँ कि नहीं ?”
“क्या ये भी एक इत्तेफाक है?” विक्रम बुदबुदाया।

प्रिया ने आगे बताया, “विक्रम, मैं राजीव को फाइलें भेज दूँ ।”

“राजीव?” विक्रम चौंका।

“हाँ… हमारे कॉलेज सीनियर। अब साइबर एक्सपर्ट हैं। उनसे बात की है मैंने , उन्होंने कहा है कि अगर कॉल Tor ब्राउज़र से की गई हो, तो ट्रेसिंग लगभग नामुमकिन है। लेकिन अगर VPN इस्तेमाल हुआ है, तो कुछ DNS लीक और IP पुलिंग के जरिए उसकी दिशा पता चल सकती है। तुम भी बात कर लो उनसे। ”

विक्रम ने राजीव को फोन किया.... उनका कॉलेज सीनियर, अब एक साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ।
“राजीव, आपको कुछ रिकॉर्ड्स भेज रहा हूँ। देख सकते हो?”

“भेज दो प्रिया से पता चला मुझे। वैसे वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल (VoIP) कॉल्स को ट्रेस करना मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं। अगर Tor यूज़ किया गया है तो कम चांस, लेकिन VPN यूज़ किया गया हो तो IP पुलिंग और DNS लीक से कुछ निकाला जा सकता है।”

“आई पी (IP )पुलिंग?” आस्था ने पूछा।

विक्रम ने बताया,
“जब आप VoIP कॉल करते हैं,आई पी एड्रेस  बदलते हैं। लेकिन कुछ एडवांस्ड टूल्स  होते हैं जो हर इंटरमीडिएट आई पी को पकड़ सकते हैं इसे आई पी पुलिंग (IP Pulling) कहते हैं।”

प्रिया ने सभी फाइल्स राजीव को भेज दीं।
दिन में प्रिया और आस्था को छोड़कर बाकी सभी दोस्त अपने अपने शहर के लिए निकल गए। 

 पुरानी नोटबुक

रात को विक्रम मौली लर्निंग हब में अकेला बैठा है । सामने  प्रवेशद्वार पर मौली की मूर्ति , अंधेरे कमरे में कंप्यूटर स्क्रीन की नीली रोशनी विक्रम के चेहरे पर पड़ रही है। लैपटॉप स्क्रीन पर सिस्टम लॉग्स, सामने खुला है  एक कॉल लॉग - उस एक सेकंड की रिंग का रिकॉर्ड, जिसने सब कुछ बदल दिया है। 

माँ और बाबा अन्य दिनों के मुकाबले आज खाली थे तो उन्होंने सोचा कि घर देखकर आए।  माँ बाबा को विक्रम  ढाई साल पहले ही अपने साथ शहर ले गया था। गांव की गिरवी रखी ज़मीन और खेत विक्रम ने दो साल पहले ही छुड़वा लिए थे और अब वो फिर से बाबा के अपने हो गए हैं। उन खेत और ज़मीन को  उसको गांव के ही सूरज को बंटाई पर दे दिया है।  सूरज मोहनलाल के दोस्त कैलाश का बेटा है।  कैलाश की मृत्यु ज़्यादा नशा करने से हो गई थी और जिसके बाद ही मोहनलाल ने नशे और शराब से तौबा करली  थी और अपने परिवार पर पुन: ध्यान देना शुरु कर दिया था। 

माँ-बाबा दोपहर में गाँव के पुराने घर से मौली के बक्से में से मौली की एक पुरानी नोटबुक लाए हैं वो उन्होंने विक्रम को दे दी ।

विक्रम ने उस नोटबुक को खोला…पन्ने पलटे
एक पन्ना फड़फड़ाया -
“भैया, मुझे डर लगता है… पड़ोस के वो अंकल कुछ अजीब करते हैं…”
विक्रम की साँसें थम गईं।

दरवाज़े पर दस्तक हुई सामने प्रिया खड़ी थी।
“राजीव ने लोकेशन पिंग की है। हमें बात करनी होगी।”
इतने में खुद चलाकर राजीव का कॉल आ गया।
“विक्रम, मैंने तुम्हारे भेजे डेटा को स्कैन किया है। ये निश्चित रूप से VoIP कॉल है और इसके पीछे एक रूटिंग मैप है जो कई देशों से गुजरा है।”
“मतलब?” विक्रम ने पूछा।
“मतलब ये कि कॉल करने वाले ने अपने सिग्नल को कई सर्वरों के जरिए घुमाकर भेजा है। इससे उसकी असली पहचान छुप जाए। लेकिन एक DNS लीक मिला है जो शायद हमें एक दिशा दे सकता है।”
विक्रम की साँसें तेज़ चलने लगीं। “कौन-सी दिशा?”
“एक पुराना साइबर कैफे… राजस्थान के पास। वहाँ से अंतिम पिंग आया था। तुम चाहो तो मैं खुद भी वहाँ जा सकता हूँ।”
“नहीं,” विक्रम ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “मैं खुद जाऊँगा।”

शाम, सन्नाटा और संकल्प

अगले दिन शाम को जब बारिश की बूँदें खिड़कियों पर गिर रही हैं  विक्रम ने खिड़की के कांच से से गांव  की शाम को देखा। खेतों में चलती हवाएँ, बारिश में भीगते बच्चों की हँसने खेलने की आवाज़े … और स्मृति में दौड़ती मौली।
वो सिर्फ उसकी बहन नहीं थी… वो उसका वज़ूद थी।
उसकी आँखें नम हैं लेकिन चेहरे पर है एक निश्चय।
“अगर कोई अब भी मौली की याद को मिटाना चाहता है तो वो भूल गया है कि हम सुपर 8  अब सुपर 9 हो गए हैं, आस्था भी हमारे संग है। 
और अब…हम एकांश  है।”
पास ही मौली की एक पुरानी तस्वीर है - मुस्कुराती हुई, भोली मासूम स्कूल जाती हुई छोटी से बहन ।
विक्रम ने अपनी  डायरी में लिखा,
“अगर तुम कहीं हो, तो मैं तुम्हें ढूँढ़ निकालूँगा… चाहे रास्ता कितना भी जटिल हो।”
विक्रम कुछ पल चुपचाप बैठा  रहा। फिर खिड़की की ओर देखने लगा, जहाँ गाँव का शाम का सूनापन फैला था। उसे एक पुराना दृश्य याद आया... मौली के साथ स्कूल जाते बच्चे, उसका हाथ पकड़कर चलती वो मासूम लड़की, जो कभी डरती नहीं थी।
आज, वही मौली एक रहस्य बन गई है।
उसकी आँखें भर आईं, लेकिन होठों पर संकल्प की रेखा उभर आई।
अचानक खिड़की से एक धीमी हवा आई।
कागज़ सरसराए… और फिर वही आवाज़…
“भैया…”
विक्रम के चेहरे पर सदमे, आश्चर्य और दृढ़ता तीनों भाव साथ-साथ हैं।
कमरे में एक सन्नाटा फैल गया…

क्रमशः 
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आगे क्या होता है?
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 35: गांव की चुप्पी और एक लिंक का राज़
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