एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 44: आंधी और आशा
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 43 : मक़सद बनाम मुनाफ़ा पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 44: आंधी और आशा
बोझिल सन्नाटा और कागज़ी आंधी
एकांश टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के ऑफिस में हलचल नहीं, सन्नाटा है। वो ऑफिस जो कभी कीबोर्ड की टक-टक, डिस्कशन की आवाज़ों और इनोवेटिव आइडियाज़ की गूंज से ज़िंदा रहता था, आज जैसे ठहर गया है। स्टाफ़ की जगह खाली कुर्सियाँ दिख रही हैं, जिन पर अब न तो किसी मीटिंग का इंतज़ार है, न ही कोई प्रेजेंटेशन की तैयारी। एयर-कंडिशनर की लगातार चलती मद्धम आवाज़ भी जैसे इस खामोशी को तोड़ने में असमर्थ है।
कैफेटेरिया के कोने में रखी कॉफी मशीन अब भी चल रही है, पर उससे निकलती भाप में वो जोश नहीं रहा। वो भाप, जो कभी टीम के बीच विचारों को गर्माती थी, आज जैसे खुद ही ठंडी पड़ गई है। दो-चार कप ज़रूर पड़े हैं टेबल पर, पर उनमें वो पुराना 'ब्रेनस्टॉर्मिंग' नहीं, बस कुछ अधूरे घूंट हैं - चुप और थके हुए।
दीवारों पर टंगे मोटिवेशनल पोस्टर्स - "Dream Big", "Innovate to Lead", "Rural Minds, Global Reach" ("ड्रीम बिग", "इनोवेट टू लीड" , "रूरल माइंडस, ग्लोबल रीच" ) - अब सिर्फ़ दिखावे से लगते हैं। उनके पीछे छिपी उम्मीदें और मेहनतें, मानो इस समय में कहीं सिमट गई हैं।
एक कोने में बैठा पर्सनल असिस्टेंट उदास चेहरा लिए बिग स्क्रीन पर रॉनी मल्होत्रा की प्रेस कॉन्फ्रेंस देख रहा है, जिसमें वह खुलेआम दावा कर रहा है कि उसकी कंपनी "रॉनी कॉर्प एडुकोर" अब ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में ‘लीडर’ बनने जा रही है। और एकांश? उसे सरकारी टेंडर से बाहर कर दिया गया है - कारण बताया गया: "अपर्याप्त क्रेडिबिलिटी।"
इस खामोशी के बीच, हर टेबल, हर केबिन, और हर फाइल का पन्ना, एक ही सवाल पूछता है - "क्या सपना सच में हार गया?" ये झटका विक्रम के टीम को अंदर तक हिला देता है।
टीवी पर एकांश के सरकारी टेंडर से बाहर होते ही ऑफिस में फ़ोन कॉल्स की बाढ़ आ गई। आस्था और प्रिया लगातार फ़ोन अटेंड कर रही हैं और क्लाइंट्स के सवालों को अपने जवाबों से संतुष्ट करने की कोशिश में लगी हुई हैं।
विक्रम चौधरी का कमरा अभी भी रोशन है। सीईओ रूम में रोशनी मद्धम है परन्तु अंदर उसकी विशाल टेबल पर एक टेबल लैम्प जल रहा है, और उसकी आंखों में अब भी बुझती उम्मीद की जगह एक ठंडी पर गहरी आग है। सन्नाटा ज़रूर है, पर हार नहीं।
यह मौन किसी अंत का नहीं बल्कि एक बड़े मोड़ से पहले की गहराई है।
"We regret to inform you that your bid for the Digital Rural Education tender has been disqualified due to insufficient credibility and past performance benchmarks."
("हमें आपको यह बताते हुए खेद है कि डिजिटल ग्रामीण शिक्षा निविदा के लिए आपकी बोली को अपर्याप्त विश्वसनीयता और पिछले प्रदर्शन मानदंडों के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया है।")
और कारण बताया जाता है – "कम अनुभव" और "न्यूनतम आर्थिक स्थिरता"
विक्रम को झटका लगता है कि अचानक इतनी कठोर भाषा? और वो भी बिना सुनवाई के?
उसे शक होता है कि यह सब रॉनी मल्होत्रा का ही खेल है – जो अपनी पुरानी हार का बदला लेने और एकांश को खत्म करने की योजना बना रहा है।
“इंसाफ़ से नहीं, पहचान से मिलते हैं मौके,” उसने खुद से बुदबुदाया।
राघव – एकांश का एक डेवलपर – फाइल लेकर आया, “सर, ये रहा क्लाइंट ट्रैक रिकॉर्ड। हमने हर शर्त पूरी की है।”
विक्रम ने फाइल ली लेकिन दिमाग कहीं और है।
“राघव, क्या रॉनी कॉर्प भी इस टेंडर में था?”
“हां सर… और उन्हीं को मिला है।”
विक्रम की आंखों में चमकते आक्रोश ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह सिर्फ एक टेंडर नहीं, उसकी आत्मा पर वार है। उसे यकीन हो गया है कि रॉनी मल्होत्रा इसके पीछे है।
शाम को टीम मीटिंग में एक कर्मचारी कहता है – "सर, अगर सरकारी सपोर्ट नहीं होगा तो हम कैसे टिकेंगे?"
विक्रम उन्हें कंपनी की पालिसी पर भरोसा रखने को कहता है।
अतीत की लहर में भविष्य की आहट
तभी एक आवाज़ आई,
“मिस्टर विक्रम चौधरी ?”
विक्रम ने गर्दन घुमाई। सामने एक जिज्ञासु आंखों वाली महिला खड़ी थी, हाथ में रिकॉर्डर और एक डायरी।
“मैं वान्या मेहरा, प्रतिष्ठित न्यूज़ पोर्टल "राय आपकी " (काल्पनिक नाम) की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर हूँ। आपने पांच साल पहले मुझे एक इंटरव्यू दिया था - ‘गांव से गूगल तक’… याद है? आज आप सीईओ हो, लेकिन आपके अंदर वही जज़्बा है या नहीं, ये जानने आई हूँ। देश को आपकी जैसी सोच की ज़रूरत है - आपको चुप नहीं रहना चाहिए”
विक्रम मुस्कराया, “ जी याद है और याद क्यों वो तो मेरे रग रग में बसा हुआ है। पांच वर्ष पहले मैं पास आउट हुआ था इंजीनियरिंग कॉलेज से और मेरे हौंसलों की उड़ान असीमित थी। वो मेरा सिर्फ एक सपना नहीं था बल्कि उसे मैंने हर पल जिया है। ”
वान्या मुस्कराई, “अब भी है - फर्क बस इतना है कि अब आपका सपना कई बच्चों की आंखों में पल रहा है।”
वान्या ने बातचीत शुरू की। “ये बताइए, जब आपकी कंपनी को इस तरह पीछे धकेला जाता है, तो आप क्या महसूस करते हैं?”
विक्रम ने गहरी सांस ली।
“ये लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं है। ये लड़ाई सोच की है - हम अपने बच्चों को मशीन नहीं, मानवीय समझ देना चाहते हैं। रॉनी कॉर्प जैसे लोग मुनाफे के लिए काम करते हैं, हम मक़सद के लिए।”
वान्या ने तुरंत नोट किया - "मक़सद बनाम मुनाफ़ा - शायद यही इस कहानी का शीर्षक हो।"
वान्या जाने लगी तो विक्रम ने पूछा, “आपको मेरी कहानी में क्या खास दिखता है?”
वह रुकी, मुस्कराई और बोली, “एक नई शुरुआत की आहट ! यह भी कि आप अभी भी थके नहीं हैं।”
वान्या ने ठहरकर कहा ," मैं आपका फिर एक बार समय लेना चाहूंगी और बहुत कुछ पूछना है। "
"जी ज़रूर। " विक्रम ने अपनी संजीदा आवाज में स्वीकृति देते हुए कहा और हल्का सा मुस्कुरा दिया।
उसके जाने के बाद, विक्रम अपने ऑफिस लौटा और सबसे पहली चीज़ की।
एक वाइटबोर्ड पर लिखा:
"Plan B: Vision survives beyond walls."
(प्लान बी: दीवारों से परे भी ज़िंदा रहता है - दृष्टिकोण)
सच ही है कि सोच दीवारों में नहीं कैद होती।
“अगर सिस्टम हमारे रास्ते बंद करता है, तो हम नई पगडंडियां बनाएंगे। एकांश किसी एक टेंडर से नहीं रुकेगा। हम खुद ग्रामीण डिजिटल शिक्षा का मॉडल तैयार करेंगे - ओपन-सोर्स, कम लागत वाला और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित।”
"जब मकसद सच्चा हो, तो आंधी भी रास्ता देती है। चलो, लड़ाई अब शुरू हुई है।"
अंधेरे में आशा की लौ
“सर, हम आपके स्कूल में पायलट प्रोजेक्ट चलाना चाहते हैं - ‘मौली लर्निंग हब’ जैसा, लेकिन अब वर्चुअल प्लेटफॉर्म के साथ।”
मास्टरजी बोले, “हमेशा की तरह, हम आपके साथ हैं बेटा। गांव में जो आपने शुरू किया था, वह आज भी बच्चों के चेहरे पर उम्मीद बनकर चमकता है।”
विक्रम के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
तूफ़ान के बीच उम्मीद
“Ronnie Corp bags 200 Cr Government Tender for Digital Rural Education.”
(“रॉनी कॉर्प को डिजिटल ग्रामीण शिक्षा के लिए 200 करोड़ का सरकारी टेंडर मिला।”)
ठीक नीचे, एक और छोटी सी खबर प्रकाशित हुई -
“एकांश टेक्नोलॉजी, एक युवा स्टार्टअप, असफल टेंडर के बावजूद ग्रामीण शिक्षा का अपना स्वतंत्र डिजिटल मॉडल लॉन्च करेगा।
संस्थापक विक्रम चौधरी का कहना है:
हम अपने बच्चों को मशीन नहीं, मानवीय समझ देना चाहते हैं। ”
“अंत नहीं बस मोड़ है ये। ”
क्रमशः
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