बच्चे को मोहरा न बनाएं - लघु कथा

बच्चों को मोहरा न बनाएं 

बच्चों की मासूमियत बहुत कोमल होती है। वे जो देखते और सुनते हैं वही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। लेकिन जब बड़े अपने स्वार्थ या छोटी-छोटी बातों के लिए बच्चों को मोहरा बनाने लगते हैं तो इसका असर उनके पूरे भविष्य पर पड़ता है। यह लघु कथा इसी कड़वे सच को उजागर करती है। बच्चों की मासूमियत को अपने स्वार्थ या परिस्थितियों का मोहरा बनाना उनके भविष्य के साथ अन्याय है।


बच्चे को मोहरा न बनाएं लघु कथा पोस्टर
बच्चों के बचपन को मोहरा न बनाएं — एक संवेदनशील लघु कथा

लघु कथा

बच्चों को मोहरा न बनाएं | एक सीख देने वाली लघु कथा 

“मम्मी, ताईजी दादी से आपके बनाए खाने की बुराई कर रही थीं।”
छह वर्षीय मीनू कामिनी से बोली।

“ऐसा! जा मीनू सुनकर आ दादी क्या कह रही हैं, तुझे चॉकलेट दूँगी।”

“ठीक है मम्मी।”

इस तरह से मीनू अपनी मम्मी की चॉकलेट के लालच में सबकी बातें बताती फिर कामिनी बात का बतंगड़ बनाकर लड़ती, पति के दिमाग में बातें भरकर घरवालों से अलग रहने लगी।

कुछ वर्षों बाद मीनू की शादी हुई।  उसने चार वर्षीय बेटे को लालच देकर सास-ननद की बातें सुननी चाहीं पर बेटे ने पति, सास-ससुर के सामने मीनू की पोल खोल दी। गुस्साए मीनू के पति ने सास को फोन कर कामिनी की परवरिश पर सवाल उठा दिए।

मन की बात

बच्चे बेहद मासूम होते हैं और वे सही-गलत का फर्क उतना नहीं समझ पाते जितना हम बड़े समझते हैं। जब हम उन्हें अपने स्वार्थ, झगड़ों या परिस्थितियों का हिस्सा बनाते हैं तो अनजाने में उनके मन में गलत आदतों के बीज बो देते हैं।
बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं इसलिए जरूरी है कि हम उन्हें सच्चाई, ईमानदारी और संवेदनशीलता का सही उदाहरण दें।
बचपन को सुरक्षित और निष्पक्ष रखना ही उनके उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।

❓प्रश्न 

क्या बच्चों को परिवारिक झगड़ों या बातों में शामिल करना सही है?
नहीं, इससे उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बच्चों को हमेशा सकारात्मक और सुरक्षित वातावरण देना चाहिए।

आपका क्या मानना है?

क्या बच्चों को कभी भी बड़े लोगों के विवादों में शामिल करना चाहिए?

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- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'  

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