शहर से गाँव तक - कविता

shahar se ganv tak kavita pic

शहर से गाँव तक

हिंदी कविता

बड़ी बड़ी बातें होती हैं,

कसमें वादे होते हैं,

बस

एक बार शहर जाकर

पैसा कमाकर लाने दो,

अपने गाँव को चमन बना देंगे।


गाँव  को आदत है, हर जाने वाले की —

ऐसी बातें सुन मुस्कुरा कर रह जाता है...


शहर जाकर सब

भुला दिया जाता है,

गाँव की मिट्टी, सीमेंट के 

कंक्रीट जाल में खो जाती है।

वो बात, वो लाइफ कहां गाँव में?

ऐसा कह गाँव को‌ सिरे से नकार दिया जाता है।


जाने की तो सोचो जनाब —

शहर से गाँव तक आज भी सीधा ही रास्ता है!


कभी लौटते भी हैं लोग,

पर खाली हाथ, खाली सपनों के साथ।

चेहरे पर शहर की धूल,

दिल में गाँव की याद,

और आंखों में बस एक सवाल,

क्या वही बचपन का घर अब भी वैसा ही रहेगा?


हर सवाल का जवाब सरल नहीं  —

हर रंग काला और सफ़ेद नहीं होता है। 


गाँव फिर भी अपने ढंग से स्वागत करता है,

बचपन की गलियाँ, पेड़ों की छाँव,

सब कुछ अभी भी वहीं इंतजार करता है।

पर लौट आने वाले अक्सर

अपने शहर के बंधनों में उलझे रहते हैं,

और गाँव की सादगी से दूर हो जाते हैं।


कृत्रिमता के आवरण तले  —

अनगिनत इच्छाएं सिर उठाती  हैं। 


रिश्तों की गर्माहट,

पड़ोसियों की अपनाहट,

बचपन के खेल, मिट्टी की खुशबू,

सब कुछ अभी भी वहीं है।

पर शहर की चमक और दौड़

इन्हें अक्सर नजरअंदाज कर देती है।


चमकने वाली हर वस्तु सोना नहीं —

परन्तु नज़रों से दूर गाँव मन से उतरता जाता  है। 


गाँव अभी भी हर लौटने वाले का

सबसे सच्चा, सुरक्षित आशियाना है।

गाँव की मिट्टी, अपनापन और यादें

इंतजार करती, ये  सिर्फ़ जमीन नहीं,

यह है बचपन, गहरी  जड़ें,

और है सही अर्थों में असली  पहचान।


मौसम आते और गुजर जाते —

पर गाँव का इंतज़ार अंतहीन ही रहता। 


-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

(मौलिक व स्वरचित)

२८  सितंबर, २०२५  

लेखिका की कलम से 

दोस्तों,

भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।

धन्यवाद 
🙏 आभार

प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट

हिंदी साहित्य का महत्व: इतिहास, काल विभाजन और आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता